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दुनिया की 10 सबसे शक्तिशाली खुफिया एजेंसी, जिनसे डरते हैं बड़े से बड़े आतंकी संगठन

Wed, 27 Jul 2016 12:24 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : wikipedia
रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग), भारत
दुनिया की सबसे बड़ी खुफिया एजेंसियों में भारत की रॉ को शामिल किया गया है। वैसे तो भारत में कई सारी खूफिया एजेंसी हैं लेकिन रॉ का अपना अलग ही महत्व है। 1968 में गठित रॉ का हेडक्वॉर्टर नई दिल्ली में है। जैसे आंतरिक मामलों की देखरेख आईबी (इंटेलीजेंस ब्योरो) के हवाले है ठीक उसी तरह बाहरी या विदेशी मामलों का डील रॉ के हवाले है।

रॉ का मुख्य काम सरकार को पड़ोसी देशों की गतिविधियों से अवगत कराना है। विशेषकर चीन, पाकिस्तान के बारे में। बांग्लादेश के निर्माण में 1971 में रॉ ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यही नहीं रॉ की ही बदौलत भारत सरकार ने पूर्ण गोपनीयता से परमाणू परीक्षण किया था। रॉ ने ही पाकिस्तान के मुख्य परमाणु हथियार प्रयोगशाला, कहुटा के बारे में सबसे पहले भारत को अवगत कराया था। पाकिस्तानी सरकार और आर्मी के बीच होने वाली कॉल को रॉ के द्वार ही इटरसेप्ट किया जाता है।
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पाकिस्तानी नागरिक, आईएसआई को समर्थन देती हुई - फोटो : getty
आईएसआई (इंटर-सर्विसेस इंटेलीजेंस), पाकिस्तान
दुनिया की सबसे ताकतवर खूफिया एजेंसियों में पाकिस्तान की आईएसआई सबसे ऊपर आती है। इसका हेडक्वॉर्टर इस्लामाबाद में है और यह 1948 में गठित हुई थी। अफगानिस्तान में सोवियत संघ की हार के पीछे आईएसआई का हाथ माना जाता है। जो आईएसआई की सबसे बड़ी जीतों में से एक हैं। कहा जाता है कि पाकिस्तान में किसी की भी सरकार क्यों न हो उसे लेकिन उसे आईएसआई के आगे नतमस्तक रहना ही पड़ता है। वैसे तो यह एक तरह से सरकार की ही बॉडी है लेकिन सेना और सरकार सब आईएसआई के नीचे काम करते हैं। 
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- फोटो : idfblog
मोसाद, इजराइल
मोसाद सभी खुफिया एजेंसियों की गॉडफादर की तरह है। मोसाद को दुनिया की सबसे खतरनाक इंटेलीजेंस एजेंसी माना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि आज तक इसके सभी ऑपरेशन सफल हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि मोसाद के कारण ही इजराइल की धाक आज भी पूरी दुनिया में है। प्रसिद्ध एंतेब्बे रेस्क्यू के दौरान मोसाद के सभी एजेंट युगांडा आर्मी की ड्रेस पहने हुए थे, इनमें से इडली अमिन नाम का एजेंट तो युगांडाके प्रसीडेंट के भेष में था। दरअसल युगांडा ने कई इजराइलियों को बंदी बना लिया था जिन्हें छुड़ाने के लिए मोसाद मे यह ऑपरेशन चलाया था। 

युगांडा के राष्ट्रपति की नकल किए हुए अमीन के काफिले को उन्होंने बड़ी धूम-धाम से निकाला था। लोगों को लगा कि यह वाकई में युगांडा के राष्ट्रपति हैं लेकिन थोड़ी ही देर में उन्होंने सभी इजराइलियों को छुड़ा लिया और युगांडा के कई सारे विमान नष्ट कर दिए थे। यही नहीं जब 1972 के म्यूनिख ओलंपिक के दौरान इजराइल के 11 एथलीट्स को एक आतंकी समूह ने मारा था तब भी मोसाद ने उनका बदला लिया था और एक-एक आतंकी को चुन-चुनकर मारा।

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- फोटो : getty
सीआईए (सेंट्रल इंटेलीजेंस एजेंसी) अमेरिका
सीआईए दुनिया भर में अमेरिका के वर्चस्व के पीछे का कारण माना जाता है। दुनिया में अमेरिका के सुपरपॉवर बने रहने के पीछे सीआईए की महत्वपूर्ण भूमिका है। इशका हेडक्वॉर्टर फेयरफैक्स, वर्जीनिया में है। और इसका गठन 1947 में हुआ था। ऑपरेशन PBSUCCESS और ओसामा की हत्या इसकी सबसे बड़ी सफलता में से एक है। वैसे माना जाता है कि सीआईए के कई मिशन असफल रहे हैं, लेकिन फिर भी यह दुनिया की बेस्ट इंटेलीजेंस एजेंसी है।
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- फोटो : Getty
एमआई6 (मिलिट्री इंटेलीजेंस, सेक्शन 6) युनाइटेड किंगडम
1909 में गठित हुई एमआई6 का हेडक्वॉर्टर लंदन में है। एमआई6 दुनिया की सबसे पुरानी इंटेलीजेंस एजेंसियों में से एक है। एमआई6 ने प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान भी कई सारे मिशन को सफलता पूर्वक अंजाम दिया था। यह भी माना जाता है कि दोनों विश्व युद्धों में ब्रिटेन की जीत का कारण उसकी खूफिया एजेंसी एमआई6 ही है। इसी एजेंसी ने न केवल ब्रिटेन को जर्मनी के हांथो से दूर रखा बल्कि हिटलर को हराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यही नहीं एमआई6 आजकल दूसरी विदेशी खूफिया एजेंसियों जैसे सीआईए को भी उनके मिशन में मदद कर रही है। 
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जीआरयू हेडक्वॉर्टर - फोटो : getty images
जीआरयू (मेन इंटेलीजेंस एजेंसी), रूस
1918 में गठित इस एजेंसी का हेडक्वॉर्टर रूस की राजधानी मास्को में है। यह रूस की मुख्य इंटेलीजेंस एजेंसी है। सोवियत संघ के पतन से पहले देश की मुख्य खुफिया एजेंसी केजीबी थी। यह एजेंसी केवल विदेशी गतिविधियों पर काम करती है। यह माना जाता है कि सोवियत संघ के पतन के बाद इस एजेंसी ने ही रूस को एक बार फिर सुपरपॉवर देशों के लिए बड़ी चुनौती बना दिया। इसका महत्व उस वक्त और बढ़ गया जब बोरिस येल्तसिन ने वर्ष 1996 में केजीबी को बंद कर दिया था। 
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- फोटो : getty images
एमएसएस (मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी), चीन
राजधानी चीन में इसका हेडक्वॉर्टर है। और यह गठित हुई 1983 में। यह एजेंसी आंतरिक और बाहरी दोनों मामलों को देखती है। यह एजेंसी चीन को वैश्विक गतिविधियों से भी अवगत कराती रहती है। कम्युनिस्ट पार्टी की लोकप्रियता को बनाए रखने के लिए यह एजेंसी देश के आंतरिक मामलों में भी दखल देती है। 

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- फोटो : getty
बीएनडी ( Bundesnachrichtendienst), जर्मनी
पुल्लाक और बर्लिन दो जगह इसके ऑफिस हैं। यह एजेंसी 1956 में गठित हुई थी। तकनीकि मामलों में यह एजेंसी दुनिया की बेस्ट इंटेलीजेंस एजेंसी है। इसकी निगरानी प्रणाली को विश्व स्तर पर सबसे अच्छा माना जाता है। यह अपनी तकनीकि की विशेषता के कारण जर्मनी को या तो खतरे से पहले ही अवगत करा देती है या फिर उसे नष्ट कर देती है। जब मध्य पूर्व और लैटिन अमेरिका के बारे में जानकारी हासिल करनी हो तो शायद ही कोई ऐसी इंटेलीजेंस एजेंसी हो जिसे हरा पाए। 

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- फोटो : getty images
डीजीएसई (जनरल डॉक्टोरेट फॉर एक्सटर्नल सिक्योरिटी), फ्रांस
1982 में गठन हुआ, पेरिस में हेडक्वार्टर है। अन्य एजेंसियों की तरह यह एजेंसी भी बाहरी खतरों से देश को अवगत कराती है। अन्य देशों की एंजेसियों के मुकाबले यह बिल्कुल नई है। लेकिन इसके बाबजूद भी यह दुनिया की बेस्ट खूफिया एजेंसियों में से एक है। फ्रेंच राजस्व का बड़ा हिस्सा इस एजेंसी को जाता है। 5000 से ज्यादा कर्मचारी इसके अंतर्गत काम करते हैं। यह देश को विभिन्न आतंकी खतरों के बारे में सूचना देती है। खासकर आईएसआईएस के बारे में फ्रांस को सचेत रखने का काम करती है। अल्जीरिया और अरब आतंकवादियों के टार्गेट पर रहने वाले फ्रांस को इस एजेंसी ने कई मौकों पर सफलता दिलाई है। यह एजेंसी फ्रांसीसी पुलिस बल के साथ कदम से कदम मिलाकर काम करती है।
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- फोटो : wikipedia
एएसआईएस (अस्ट्रेलियन सीक्रेट इंटेलीजेस सर्विस), अस्ट्रेलिया
हेडक्वॉर्टर केनबरा में है और गठन 1952 में हुआ। अस्ट्रेलिया हमेशा ही अंतराष्ट्रीय संकटों से दूर रहा है। इसके पीछे की एक वजह है इसकी इंटेलीजेंस एजेंसी। यह सबसे कुशल खुफिया एजेंसियों में से एक है इसकी मुख्य कार्यक्षेत्र एशिया महाद्वीप और प्रशांत क्षेत्रहै। इसके एजेंट दुनियाभर में हैं। यह एजेंसी इतनी गोपनीयता से काम करती है कि इसकी ज्यादातर एक्टिविटी के बारे में खुद अस्ट्रेलियन नागरिक व सरकार को पता नहीं होता। इस एजेंसी का पहली बार वर्ष 1975 में ऑस्ट्रेलियाई संसद में उल्लेख किया गया था और सार्वजनिक रूप से वर्ष 1977 में ही स्वीकार कर लिया गया था।
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