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Vice President Election : धनखड़ की जीत से ज्यादा मार्गरेट की हार के चर्चे, दो बिंदुओं में जानें कहां हुई चूक

Sun, 07 Aug 2022 11:34 AM IST
हिमांशु मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शनिवार को उपराष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार जगदीप धनखड़ ने विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को मात दे दी। लोकसभा और राज्यसभा के कुल 725 सांसदों ने वोट डाला था। इनमें 15 वोट रद्द कर दिए गए। कुल 710 वैध वोटों में 528 वोट जगदीप धनखड़ को मिले, वहीं अल्वा के पक्ष में 182 वोट पड़े।
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मार्गरेट अल्वा - फोटो : अमर उजाला
पश्चिम बंगाल के पूर्व राज्यपाल जगदीप धनखड़ देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे। शनिवार को हुए चुनाव में उन्होंने विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा को मात दे दी। लोकसभा और राज्यसभा के कुल 725 सांसदों ने वोट डाला था। इनमें 15 वोट रद्द कर दिए गए। कुल 710 वैध वोटों में 528 वोट जगदीप धनखड़ को मिले, वहीं अल्वा के पक्ष में 182 वोट पड़े।

इस तरह से धनखड़ ने चुनाव जीत लिया। नतीजे आते ही प्रधानमंत्री से लेकर सभी केंद्रीय मंत्री, विपक्ष के नेता, राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने धनखड़ को बधाई दी। हालांकि, कुछ समय बाद ही उनकी इस जीत से ज्यादा मार्गरेट अल्वा की हार के चर्चे होने लगे। आइए जानते हैं क्यों...?  
 
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मार्गरेट अल्वा - फोटो : अमर उजाला
पहले जानिए हार के बाद क्या बोलीं मार्गरेट? 
उपराष्ट्रपति चुनाव के नतीजे आने के चंद मिनट बाद विपक्ष की उम्मीदवार मार्गरेट अल्वा ने ट्विट किया। उन्होंने जगदीप धनखड़ को बधाई देते हुए लिखा, 'मैं विपक्ष के उन सभी नेताओं और सभी राजनीतिक दलों के सांसदों का शुक्रिया करती हूं, जिन्होंने इस चुनाव में मुझे वोट दिया। उन वॉलेंटियर्स का भी धन्यवाद जिन्होंने कम समय ही सही, लेकिन बिना स्वार्थ के मेरे चुनाव का प्रचार किया।'

आगे अल्वा ने कुछ राजनीतिक दलों पर निशाना भी साधा। लिखा, 'यह चुनाव विपक्ष के लिए एक साथ काम करने, अतीत को पीछे छोड़ एक दूसरे के बीच विश्वास बनाने का अवसर था। दुर्भाग्य से कुछ विपक्षी दलों ने एकजुट विपक्ष के विचार को पटरी से उतारने के प्रयास में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा का समर्थन करना चुना। मेरा मानना है कि ऐसा करके इन पार्टियों और उनके नेताओं ने अपनी साख को नुकसान पहुंचाया है।'

अल्वा ने आगे लिखा, 'यह चुनाव खत्म हो गया है। हमारे संविधान की रक्षा, हमारे लोकतंत्र को मजबूत करने और संसद की गरिमा बहाल करने की लड़ाई जारी रहेगी।'
 
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मार्गरेट अल्वा। - फोटो : Social Media
क्यों हो रहे अल्वा की हार के चर्चे?
ये समझने के लिए हमने राजनीतिक विश्लेषक प्रो. अजय सिंह से बात की। उन्होंने कहा, 'मार्गरेट अल्वा को कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाया था। अब ऐसा वक्त आ गया है जब कई क्षेत्रीय दल कांग्रेस का नेतृत्व पसंद नहीं करते हैं। इन दलों का मानना है कि कांग्रेस डूबती जहाज है और जो भी इसके साथ आएगा वो भी डूब जाएगा। यही कारण है कि क्षेत्रीय दल कांग्रेस से दूरी बनाने लगे हैं।'

प्रो. सिंह आगे बताते हैं, 'राष्ट्रपति और फिर उपराष्ट्रपति चुनाव में भी यही देखने को मिला। विपक्ष पूरी तरह से बिखरा नजर आया। उपराष्ट्रपति चुनाव में तो भाजपा की धुर विरोधी टीएमसी तक ने अल्वा का साथ नहीं दिया। नतीजे आने के बाद अल्वा ने जो ट्विट किया है, उसके जरिए उन्होंने टीएमसी, बसपा, वाईएसआर कांग्रेस जैसे विपक्षी दलों पर ही निशाना साधा। जिन्होंने प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर भाजपा उम्मीदवार को ही फायदा पहुंचाया।' 

प्रो. अजय सिंह ने अल्वा की हार को दो बिंदुओं में समझाया।
 

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विपक्ष - फोटो : अमर उजाला
1. विपक्ष एकजुट नहीं हो पाया : राष्ट्रपति चुनाव की तरह ही उपराष्ट्रपति चुनाव में भी विपक्ष बिखरा नजर आया। बल्कि पहले से ज्यादा बिखराव उपराष्ट्रपति चुनाव में दिखा। इस बार तो भारतीय जनता पार्टी की धुर विरोधी तृणमूल कांग्रेस तक ने विपक्ष की उम्मीदवार का साथ नहीं दिया। चुनाव हारने के बाद अल्वा के बयान में भी यही दर्द झलका। भाजपा ने बड़े आराम से दोनों चुनाव में विपक्ष को एकजुट होने से रोक दिया।
 
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कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के साथ मार्गरेट अल्वा - फोटो : अमर उजाला
2. कांग्रेस पर भी उठे सवाल :  आमतौर पर सत्ता से बाहर रहने के दौरान विपक्ष का नेतृत्व कांग्रेस ही करते आई है। हर बार उसे क्षेत्रीय दलों का साथ मिलता रहा है, लेकिन इस बार हालात अलग हैं। अब कांग्रेस के नेतृत्व पर ही क्षेत्रीय दल सवाल उठाने लगे हैं। इसके पीछे कारण भी है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस अब नेतृत्व नहीं कर पा रही है। इन दलों का ये भी कहना है कि अगर वह कांग्रेस के साथ आते हैं तो इसका उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है। यही कारण है कि तृणमूल कांग्रेस, सपा, टीआरएस, आम आदमी पार्टी समेत तमाम दल अलग मोर्चा ही बनाने में जुटे हैं। अल्वा की हार के बाद तीसरे मोर्चे के गठन की चर्चा और तेज हो गई है। 
 
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जगदीप धनखड़ होंगे अगले उपराष्ट्रपति। - फोटो : अमर उजाला
धनखड़ की जीत से भाजपा को क्या फायदा मिल सकता है? 
यही सवाल हमने वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद कुमार सिंह से किया। उन्होंने कहा, 'जगदीप धनखड़ राजस्थान के जाट परिवार से आते हैं। उनका पारिवारिक पेशा कृषि रहा है। मतलब एक तरह से वह किसान परिवार के हुए।'

प्रमोद आगे कहते हैं, 'पिछले दो साल में भाजपा को सबसे ज्यादा मुश्किल किसान और जाट समुदाय के लोगों से ही हुई है। ये सब हुआ कृषि बिल के खिलाफ खड़े हुए किसान आंदोलन के चलते। ऊपर से राज्यपाल सत्यपाल मलिक केंद्र सरकार और भाजपा के खिलाफ लगातार मुखर हैं। मलिक भी जाट समुदाय से ही आते हैं। ऐसे में अब भाजपा को कई तरह से फायदे मिलेंगे।'

प्रमोद धनखड़ की जीत से भाजपा को होने वाले फायदे को तीन बिंदुओं में बताते हैं। 
 
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देश के कई राज्यों में जाट वोटर्स की संख्या निर्णायक भूमिका में है। - फोटो : अमर उजाला
1. जाट समुदाय की नाराजगी दूर होगी : किसान आंदोलन के चलते पंजाब, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, राजस्थान में रहने वाले जाट समुदाय के लोग भाजपा सरकार के खिलाफ हो गए थे। अगले साल राजस्थान, मध्य प्रदेश और फिर 2024 में हरियाणा, झारखंड और महाराष्ट्र में चुनाव होने हैं। इनमें से राजस्थान, हरियाणा में जाट समुदाय के वोटर्स की अच्छी खासी संख्या है। इसके अलावा दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पंजाब में भी जाट वोटर्स की संख्या काफी अधिक हैं। 2024 लोकसभा चुनाव में अगर ये जाट वोटर्स साथ आ गए तो भाजपा की जीत की राह आसान हो सकती है।  
 

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किसान आंदोलन - फोटो : अमर उजाला
2. किसानों, वकीलों का साथ मिलेगा : धनखड़ किसान परिवार से आते हैं। ऐसे में उनके उपराष्ट्रपति बनने से किसानों में भी भाजपा के प्रति जो नाराजगी है वो दूर हो सकती है। इसके अलावा धनखड़ ने अपने कॅरियर की शुरुआत की वकालत से की है। देशभर में 10 लाख से ज्यादा लोग वकालत के पेशे में हैं। ऐसे में भाजपा को वकीलों का भी साथ मिल सकता है। धनखड़ को जब उपराष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया गया था, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर तमाम भाजपा नेताओं ने उन्हें किसान पुत्र कहकर ही बुलाया था। 
 
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक। (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
3. सत्यपाल मलिक को जवाब मिलेगा : मेघालय के राज्यपाल भी जाट समुदाय से आते हैं। वह केंद्र सरकार के खिलाफ मुखर होकर इन दिनों बोल रहे हैं। भाजपा के कुछ नेताओं का दबी जुबां ये भी आरोप था कि मलिक जाट समुदाय और किसानों को भड़का रहे हैं। ऐसे में धनखड़ के उपराष्ट्रपति बनने से मलिक को भी भाजपा जवाब दे सकती है।
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