कश्मीर में हो रही टारगेट किलिंग से घाटी में दहशत है। इन हत्याओं ने 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की याद दिला दी है। हर किसी के जुबां पर कश्मीरी पंडितों की कहानियां आने लगी हैं। कश्मीरी पंडित खुद इसे बयां कर रहे हैं।
1 of 8
कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की कहानी
- फोटो : अमर उजाला
कश्मीर में हो रही टारगेट किलिंग से घाटी में दहशत है। इन हत्याओं ने 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार की याद दिला दी है। हर किसी के जुबां पर कश्मीरी पंडितों की कहानियां आने लगी हैं। कश्मीरी पंडित खुद इसे बयां कर रहे हैं। आज हम आपको 1989 की उस घटना के बारे में भी बताएंगे, जहां से कश्मीरी हिंदुओं पर अत्याचार शुरू हुआ था। यह भी बताएंगे कि कैसे हिंदुओं का नरसंहार हुआ और वह कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर हुए...
2 of 8
कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की कहानी
- फोटो : अमर उजाला
प्रभावती, जिन्हें सबसे पहले मारा गया
कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार की शुरुआत 14 मार्च 1989 से शुरू हुई। तब पहली बार टारगेट किलिंग का मामला सामने आया। बडगाम जिले की रहने वाली प्रभावती हरि सिंह मार्ग से गुजर रहीं थीं। इसी दौरान कुछ आतंकियों ने उन पर फायरिंग शुरू कर दी। देखते ही देखते प्रभावती ने दम तोड़ दिया। ये टारगेट किलिंग का पहला मामला था। इसके बाद जो सिलसिला शुरू हुआ वो 2003 में जाकर ही थमा।
3 of 8
कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की कहानी
- फोटो : अमर उजाला
फिर बड़े लोगों को बनाया जाने लगा निशाना
प्रभावती की हत्या के बाद कुछ दिन माहौल शांत रहा, लेकिन 14 सितंबर 1989 को एक बार फिर से घाटी दहल गई। आतंकवादियों ने मशहूर कश्मीरी पंडित और वकील पं. टीका लाल टपलू को उनके घर में घुसकर गोलियों से भून दिया। इस हत्या ने कश्मीरी पंडितों के बीच खौफ भर दिया। इसके कुछ दिनों बाद ही जस्टिस नीलकंठ गंजू, शीला कौल टिक्कू को मार दिया गया। एक दिसंबर 1989 को श्रीनगर के महाराजगंज के रहने वाले अजय कपूर को भरे बाजार में आतंकियों ने गोलियों से झलनी कर दिया। 27 दिसंबर को एडवोकेट प्रेमनाथ भट्ट, सरकारी कर्मचारी बलदेव राज दत्ता का अपहरण करके बुरी तरह से मार दिया गया। बलदेव का शव चार दिन बाद क्षत-विक्षत अवस्था में मिला था। आतंकवादियों ने शरीर का एक-एक अंग काट दिया था।
4 of 8
कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की कहानी
- फोटो : अमर उजाला
वो दिन, जिसने दुनिया को हिला दिया
25 जनवरी 1990 की बात है। श्रीनगर में स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना अपने साथियों के साथ बस स्टैंड पर एयरफोर्स की बस का इंतजार कर रहे थे। इस बीच, मारुति जिप्सी से हथियारबंद आतंकी आए और एके-47 से गोलियां बरसानी शुरू कर दी। रवि समेत एयरफोर्स के चार जवानों ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, जबकि 10 अन्य घायल हो गए। हाल ही में टेरर फंडिंग मामले में उम्रकैद पाने वाला यासीन मलिक के भी हत्या में शामिल होने की बात सामने आई थी।
5 of 8
कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की कहानी
- फोटो : अमर उजाला
गोली मारकर लस्सी पीते रहे आतंकी, सामने तड़पता रहा युवक
23 जनवरी 1990 की बात है। आतंकवादियों ने कश्मीरी हिंदू अशोक काजी के दोनों घुटनों पर गोली मारी। अशोक बाजार गए थे। अशोक भाई मक्खन काजी बताते हैं कि आतंकी बिट्टा कराटे ने दूसरे आतंकियों के साथ मिलकर मेरे भाई पर तीन गोलियां चलाईं। वह जमीन पर गिर गया और तड़पता रहा। कोई भी उसकी मदद करने नहीं आया। लोग घर की खिड़कियों से देखते रहे। आतंकी पास की दुकान पर लस्सी पीते रहे। जब उन्होंने देखा कि वो अभी भी जिंदा है, तो उसके पास गए और उसे लातों से मारा। फिर उस पर गोलियां चलाईं, जब तक उसने दम न तोड़ दिया। इसके बाद छोटे भाई के शव को पास के नाले में फेंक कर चले गए।
विज्ञापन
6 of 8
सर्वानंद कौल और उनके बेटे वीरेंद्र
- फोटो : अमर उजाला
पिता-पुत्र का अपहरण किया, फिर हाथ-पैर काटकर पेड़ पर टांग दिया
ये 30 अप्रैल 1990 की घटना है। कश्मीर के रहने वाले सर्वानंद कौल और उनके बेटे वीरेंद्र कौल को आतंकवादी उनके घर से उठाकर ले गए। दो दिन बाद दोनों का शव एक पेड़ पर लटका मिला। दोनों के हाथ-पैर अलग थे। आंखें बाहर निकली हुईं थीं। शरीर का काफी हिस्सा जला भी था। ऐसा लग रहा था कि आतंकवादियों ने हाथ-पैर काटने के बाद उन्हें जिंदा जला दिया था।
7 of 8
प्रोफेसर केएल गंजू और एक अन्य कश्मीरी हिंदू महिला की हत्या कर दी थी।
- फोटो : अमर उजाला
प्रोफेसर को छह गोलियां मारी और फिर झेलम नदी में फेंक दिया
प्रोफेसर केएल गंजू को भी आतंकवादियों ने बुरी मौत दी। पहले उन्हें खूब पीटा और फिर नजदीक से उनके शरीर में छह गोलियां मार दी। सुबह शव नदी में फेंक दिए गए। इस मामले में पकड़े गए एक आरोपी ने पूरी कहानी पुलिस को बताई। उसने कहा कि प्रोफेसर को मारने के बाद उसके शव को पत्थर में बांधकर झेलन नदी में फेंक दिया। आज तक प्रोफेसर का शव बरामद नहीं हो पाया।
कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार की कहानी
- फोटो : अमर उजाला
एक रात में 60 हजार से ज्यादा लोग निकल गए
एक रिपोर्ट के अनुसार अकेले 19 जनवरी 1990 को ही 60 हजार से ज्यादा कश्मीरी पंडितों ने घाटी से पलायन कर दिया। घाटी में उस वक्त कश्मीरी पंडितों की आबादी करीब पांच लाख थी, लेकिन कश्मीर को इस्लामिक स्टेट बनाने की मजहबी सोच की वजह से साल 1990 के अंत तक 95 प्रतिशत कश्मीरी पंडित अपना घर-बार छोड़ कर वहां से चले गए।