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Dr. Manmohan Memories: जिनकी चुप्पी भी बोलती थी... पूर्व पीएम मनमोहन सिंह से जुड़े अनसुने किस्से

Sat, 28 Dec 2024 06:02 AM IST
शिव शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

आज जिन कानूनों को देश में क्रांतिकारी बदलाव का वाहक माना जाता है, उन सभी की शुरुआत मनमोहन सरकार ने की थी। फिर चाहे वह शिक्षा या सूचना का अधिकार हो, आधार, मनरेगा या ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन हो, सभी  मनमोहन सिंह की देन हैं। आज जबकि वह हमारे बीच नहीं हैं उनसे जुड़े तमाम किस्से-बातें हर कोई साझा कर रहा है। आइये जानते हैं उनसे जुडे कुछ अनसुने किस्से...
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पूर्व पीएम मनमोहन सिंह - फोटो : अमर उजाला
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भारतीय राजनीति की ऐसी शख्सियत थे जो बेहद कम बोलते थे। मगर जब बोलते, तो बेहद मजबूती से। अब वह शख्सियत हमेशा के लिए मौन हो गई। मनमोहन सिंह ने 92 वर्ष की आयु में दिल्ली एम्स में गुरुवार रात अंतिम सांस ली। हालात कैसे भी विषम हों, हालात कितने भी विकट हों, वे चुपचाप हल निकाल लेते थे। 1991 में देश आर्थिक संकटों से घिरा तो भारत की अर्थव्यवस्था को दुनिया के निवेशकों के लिए खोलकर आर्थिक क्रांति ला दी। 

आज जिन कानूनों को देश में क्रांतिकारी बदलाव का वाहक माना जाता है, उन सभी की शुरुआत मनमोहन सरकार ने की थी। फिर चाहे वह शिक्षा या सूचना का अधिकार हो, आधार, मनरेगा या ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन हो, सभी  मनमोहन सिंह की देन हैं। आज जबकि वह हमारे बीच नहीं हैं उनसे जुड़े तमाम किस्से-बातें हर कोई साझा कर रहा है। आइये जानते हैं उनसे जुडे कुछ अनसुने किस्से...
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पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह - फोटो : PTI
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान नहीं बचते थे पैसे तो चॉकलेट से चलाते थे काम 
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान वे आर्थिक तंगी से परेशान रहे। वहां उनका ट्यूशन और रहने का खर्च प्रति वर्ष लगभग 600 पाउंड था। पंजाब विश्वविद्यालय की छात्रवृत्ति से उन्हें लगभग 160 पाउंड मिलते थे। बाकी के लिए उन्हें अपने पिता पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे में मनमोहन वहां बहुत कंजूसी से रहते थे। पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की बेटी दमन सिंह ने अपनी स्ट्रिक्टली पर्सनल में इन किस्सों को साझा किया है। इसमें दमन ने लिखा है कि उनके पिता कभी बाहर खाना नहीं खाते थे। वे शायद ही कभी बीयर या वाइन पीते थे, फिर भी अगर घर से पैसे कम पड़ जाते या समय पर नहीं आते तो वह संकट में पड़ जाते। ऐसे में कभी अगर ऐसा होता था को वे भोजन छोड़ देते थे या चॉकलेट से काम चलाते थे।
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पूर्व पीएम मनमोहन सिंह - फोटो : एक्स@AmbRus_India
कैंब्रिज में मिली 'वो लड़की' और दोस्त से मांगा उधार
पूर्व पीएम की बेटी दमन सिंह स्ट्रिक्टली पर्सनल नाम से लिखी गई मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरशरण कौर की जीवनी में कहती हैं, उन्होंने एक दोस्त से दो साल के लिए 25 पाउंड उधार मांगे थे। दोस्त ने यह कहते हुए सिर्फ तीन पाउंड दिए थे कि इससे ज्यादा देने की उसकी हैसियत नहीं है। 

इसके साथ ही दमन सिंह ने किताब में कैंब्रिज के दिनों में मनमोहन के रोमांस का जिक्र भी किया है। तब डॉ. सिंह की शादी नहीं हुई थी। दमन ने एक इंटरव्यू में कहा था, मुझे यह जानकर खुशी हुई कि पढ़ाई के दौरान मेरे पिता किसी लड़की के बारे में भी सोचते थे। क्या वह रोमांस रहा होगा? मुझे लगता है।

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दो बार प्रधानमंत्री और RBI गर्वनर भी रहे मनमोहन सिंह - फोटो : अमर उजाला
कार्यकाल में पांच गुना बढ़ा था सेंसेक्स
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में 2004 से 2014 के बीच बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) सेंसेक्स करीब पांच गुना बढ़ा था। उस समय सेंसेक्स 4,961 से बढ़कर 24,693 तक पहुंच गया था। उनके 10 साल के कार्यकाल में सेंसेक्स 8 बार तेजी के साथ बंद हुआ था। डॉ. सिंह के नेतृत्व में सेंसेक्स ने सबसे ज्यादा 81 फीसदी का रिटर्न 2009 में दिया था। उसके बाद 2006 और 2007 में 47-47 फीसदी का फायदा दिया था। 2004, 2005, 2010, 2012 और 2013 में सेंसेक्स ने 33 फीसदी, 42 फीसदी, 17 फीसदी, 26 फीसदी और 9 फीसदी का मुनाफा दिया था। हालांकि, वैश्विक स्तर पर आई मंदी के चलते 2008 में सेंसेक्स ने भारी घाटा दिया था। इसके बाद, 2011 में भी इसने 27 प्रतिशत का भारी घाटा निवेशकों को दिया था।

 
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पूर्व पीएम मनमोहन सिंह - फोटो : एक्स@RahulGandhi
रुपये के अवमूल्यन से हुए लाभ को पीएम राहत कोष में जमा करवाया
ये किस्सा तब का है जब पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह 1991 में वित्त मंत्री थे। उस समय रुपये का अवमूल्यन हुआ था। डॉ. सिंह के पास एक विदेशी बैंक खाता था, जिसमें उनके विदेश में काम करने के दौरान अर्जित आय   जमा थी। रुपये का अवमूल्यन होने के बाद उनकी विदेशी  बैंक खाते में जमा रकम के  बढ़े हुए मूल्य को उन्होंने प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष में जमा करवा दिया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के निजी सचिव रहे रामू दामोदरन ने उस घटना को याद किया है। उन्होंने कहा, रुपये के अवमूल्यन के फैसले के तुरंत बाद डॉ. सिंह प्रधानमंत्री कार्यालय गए थे। वह अपनी कार से सीधे प्रधानमंत्री के कमरे में चले गए थे। बाहर निकलते समय उन्होंने मुझे एक छोटा लिफाफा दिया और मुझसे इसे प्रधानमंत्री के राष्ट्रीय राहत कोष में जमा करने के लिए कहा। उस लिफाफे में एक  बड़ी राशि का चेक था।
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पीएम मोदी और मनमोहन सिंह - फोटो : पीटीआई
विकास को हरित लक्ष्यों के साथ जोड़ा
दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक दशक लंबे कार्यकाल (2004-2014) के दौरान पर्यावरण संरक्षण और जलवायु कार्रवाई की भी वकालत की। उनके नेतृत्व में देश ने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना शुरू की, जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) पारित किया तथा त्वरित कानूनी कार्रवाई के जरिये पर्यावरण की रक्षा के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की स्थापना की।

सदियों से आदिवासी समुदायों को अपनी जमीन के बोर में फैसलों से दूर रखा जाता था। सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार ने 2006 में वन अधिकार अधिनियम पारित किया। इसके तहत वनों का नियंत्रण उन लोगों को सौंपा गया जो वहां रहते थे तथा उनकी रक्षा करते थे। उन्होंने जुलाई 2008 में सभी मुख्यमंत्रियों से आग्रह किया कि वे आदिवासियों को वन भूमि पर उनके अधिकार प्रदान करने के लिए तेजी से कार्य करें। उन्होंने पत्र में लिखा था कि यह सुनिश्चित करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि हमारे देश की आबादी के एक बहुत ही कमजोर वर्ग को उस भूमि पर अपने मूल अधिकार मिलें जो ऐतिहासिक रूप से उनके कब्जे में रही है।

मनमोहन सरकार ने 2008 में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ से निपटने के लिए आठ सूत्री रणनीति ‘जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना’ (एनएपीसीसी) पेश की। एनएपीसीसी के आठ प्रमुख मिशनों में राष्ट्रीय सौर मिशन शामिल है। इसने देश को वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा नेता के रूप में उभरने के लिए आधार तैयार किया। देश को हरित भारत मिशन दिया जो जैव विविधता में सुधार, बंजर भूमि को बहाल करने तथा जलवायु लचीलापन बढ़ाने पर केंद्रित है। सिंह ने जलवायु न्याय की पुरजोर वकालत की। ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ के वाशिंगटन कार्यालय में अपने भाषण में उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत अनुचित कार्बन पाबंदियों को स्वीकार नहीं करेगा। उनके नेतृत्व में भारत ने पर्यावरण न्याय में तेजी लाने के लिए 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की स्थापना की।
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