पीएम मोदी और मनमोहन सिंह
- फोटो : पीटीआई
विकास को हरित लक्ष्यों के साथ जोड़ा
दिवंगत पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक दशक लंबे कार्यकाल (2004-2014) के दौरान पर्यावरण संरक्षण और जलवायु कार्रवाई की भी वकालत की। उनके नेतृत्व में देश ने जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना शुरू की, जनजातीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा के लिए ऐतिहासिक वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) पारित किया तथा त्वरित कानूनी कार्रवाई के जरिये पर्यावरण की रक्षा के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की स्थापना की।
सदियों से आदिवासी समुदायों को अपनी जमीन के बोर में फैसलों से दूर रखा जाता था। सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) की सरकार ने 2006 में वन अधिकार अधिनियम पारित किया। इसके तहत वनों का नियंत्रण उन लोगों को सौंपा गया जो वहां रहते थे तथा उनकी रक्षा करते थे। उन्होंने जुलाई 2008 में सभी मुख्यमंत्रियों से आग्रह किया कि वे आदिवासियों को वन भूमि पर उनके अधिकार प्रदान करने के लिए तेजी से कार्य करें। उन्होंने पत्र में लिखा था कि यह सुनिश्चित करना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि हमारे देश की आबादी के एक बहुत ही कमजोर वर्ग को उस भूमि पर अपने मूल अधिकार मिलें जो ऐतिहासिक रूप से उनके कब्जे में रही है।
मनमोहन सरकार ने 2008 में ‘ग्लोबल वार्मिंग’ से निपटने के लिए आठ सूत्री रणनीति ‘जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना’ (एनएपीसीसी) पेश की। एनएपीसीसी के आठ प्रमुख मिशनों में राष्ट्रीय सौर मिशन शामिल है। इसने देश को वैश्विक स्वच्छ ऊर्जा नेता के रूप में उभरने के लिए आधार तैयार किया। देश को हरित भारत मिशन दिया जो जैव विविधता में सुधार, बंजर भूमि को बहाल करने तथा जलवायु लचीलापन बढ़ाने पर केंद्रित है। सिंह ने जलवायु न्याय की पुरजोर वकालत की। ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस’ के वाशिंगटन कार्यालय में अपने भाषण में उन्होंने स्पष्ट किया था कि भारत अनुचित कार्बन पाबंदियों को स्वीकार नहीं करेगा। उनके नेतृत्व में भारत ने पर्यावरण न्याय में तेजी लाने के लिए 2010 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) की स्थापना की।
संबंधित वीडियो