'मतदान' मतदाता का अधिकार भी है और फर्ज भी। मतदान की प्रक्रिया के दौरान केवल एक मत पूरे सियासी खेल को पलट सकता है। लोकतंत्र में प्रत्येक वोट को समान अधिकार दिया गया है। जहां एक वोट देश को नई दिशा दे सकता है, वहीं एक ही वोट देश को पतन की ओर ले जाने की भी ताकत रखता है।
हमारे देश में 'एक वोट' का पुराना और दिलचस्प इतिहास रहा है। कई बार 'एक वोट' ने किसी को कुर्सी पर बैठा दिया तो कई बार कितनों को इसी 'एक वोट' ने हार का स्वाद भी चखाया है।
आईए जानते हैं देश में 'एक वोट' ने कब-कब बाजी पलटी है। किसे जिताया और किसे मुंह की खानी पड़ी है।
1999
देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से पहले किसी सरकार ने सिर्फ एक वोट से अविश्वास प्रस्ताव नहीं खोया था। 17 अप्रैल, 1999 को पहली बार कुछ ऐसा हुआ जब देश ने एक वोट की ताकत को पहचाना।
सत्तारूढ़ वाजपेयी सरकार पर विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। बीएसपी के सांसदों ने पहले तो सरकार को वोट देने का वादा किया था, लेकिन बाद में वे मुकर गए। बीएसपी के एक वोट की कमी वाजपेयी पर इतनी भारी पड़ी कि उनसे प्रधानमंत्री की कुर्सी छीन गई।