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इन 11 सीटों पर पिछले 20 साल से चोट खा रही सपा-बसपा, इस बार बदलेगी किस्मत?

Tue, 16 Apr 2019 05:27 PM IST
Prachi Priyam चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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उत्तर प्रदेश की 11 सीटों पर क्या करेंगे अखिलेश-माया - फोटो : Amar Ujala
लखनऊ, वाराणसी के साथ ही कांग्रेस पार्टी के गढ़ अमेठी और रायबरेली समेत 11 संसदीय सीटें ऐसी हैं जहां पिछले दो दशकों में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी जीत का परचम नहीं लहरा पाई हैं। हालांकि जातिगत समीकरणों के आधार पर सपा और बसपा रालोद के साथ गठबंधन करके राज्य में अधिक से अधिक सीटें जीतने की जुगत लगा रही हैं। आगे की तस्वीरों में समझिए पूरा गणित।

 
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लखनऊ - फोटो : amar ujala

लखनऊ

लखनऊ लोकसभा सीट पर भाजपा की पकड़ मजबूत मानी जाती है। 1998, 1999 और 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी यहां से सांसद थे। उनके बाद यहां की जनता ने 2009 में लालजी टंडन और 2014 में राजनाथ सिंह को अपना प्रतिनिधि चुना। सपा-बसपा गठबंधन ने अब इस सीट से आज ही सपा में शामिल हुई पूनम सिन्हा को उतार दिया है।
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रामकुमार निषाद

कानपुर

कानपुर का हाल भी लखनऊ से मिलता जुलता है। 1999-2009 तक कांग्रेस के श्रीप्रकाश जायसवाल यहां से सांसद रहे, लेकिन 2014 में मुरली मनोहर जोशी ने इसे अपने नाम कर लिया। इस बार कानपुर में कांग्रेस की तरफ से श्रीप्रकाश जायसवाल, भाजपा के सत्यदेव पचौरी और सपा के राम कुमार निषाद के बीच मुकाबला होगा। 

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वाराणसी

वाराणसी

वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदा लोकसभा सीट है। साल 2009 में यहां भाजपा के मुरली मनोहर जोशी ने जीत हासिल की थी, जबकि 2004 में कांग्रेस उम्मीदवार राजेश कुमार मिश्रा चुने गए थे। वहीं 1999 में भी वाराणसी पर भाजपा का ही कब्जा था, शंकर प्रसाद जायसवाल यहां से सांसद चुने गए थे। इस बार भी नरेंद्र मोदी ने यहां से चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। हालांकि महागठबंधन ने अब तक यहां से अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है, लेकिन अटकलों के अनुसार अगर कांग्रेस प्रियंका गांधी को मैदान में उतार देती है तो महागठबंधन की तकलीफेें और बढ़ जाएंगी।
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जयंत चौधरी-सत्यपाल सिंह

बागपत 

यहां से चौधरी चरण सिंह ने सात साल (1977 से 1984 तक) में तीन चुनाव जीते और चौधरी अजित सिंह ने 25 साल (1989 से 2014 तक) में छह बार प्रतिनिधित्व किया। पिछले 42 साल में चौधरी परिवार की बनकर रही बागपत सीट की सियासत ने दो बार भाजपा के लिए भी करवट बदली है। 1998 में भाजपा के सोमपाल शास्त्री ने और 2014 में भाजपा के डॉ. सत्यपाल सिंह ने चौधरी अजित सिंह को हराया।
अटकलें लगाई जा रही हैं कि बागपत और मथुरा में भी सपा-बसपा का जीत पाना मुश्किल होगा, लेकिन रालोद के साथ गठबंधन का उन्हें फायदा मिल सकता है। बागपत में भाजपा के सत्यपाल सिंह के सामने रालोद प्रत्याशी जयंत चौधरी खड़े हैं।
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कुंवर नरेंद्र सिंह-हेमा मलिनी

मथुरा

मथुरा में 1991, 1996, 1998 और 1999 लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने लगातार जीत दर्ज की। 2004 में मानवेंद्र सिंह ने कांग्रेस का परचम फहराया। 2009 में भाजपा के साथ लड़ने वाले रालोद के जयंत चौधरी ने एकतरफा जीत हासिल की, लेकिन 2014 में चली मोदी लहर के कारण अभिनेत्री हेमा मालिनी को 50 फीसदी से अधिक वोट मिले। उस साल यहां के जाट और मुस्लिम वोटरों के अलग होने का नुकसान ही रालोद को भुगतना पड़ा था। अभी मथुरा में भाजपा के स्टार चेहरे हेमा मलिनी के सामने रालोद के कुंवर नरेंद्र सिंह हैं। यहां भी हर बार सपा-बसपा के हाथ खाली ही रहते हैं।
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मेनका गांधी

पीलीभीत

पीलीभीत की गिनती भी उन्हीं सीटों में होती है जिसपर भाजपा का सिक्का जमा हुआ है। भाजपा नेता मेनका गांधी यहां से 1999, 2004 और 2014 में सांसद रहीं। इस बीच 2009 में उनके बेटे वरुण गांधी भी यहां से सांसद रहे। इस बार फिर पीलीभीत से वरुण गांधी रेस में हैं। उनका मुकाबला करने के लिए सपा ने हेमराज शर्मा को खड़ा किया है।

 

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बरेली

बरेली

बरेली सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार संतोष गंगवार 1999 से जीत हासिल करते आए हैं। उन्हें केवल 2009 में हार का सामना करना पड़ा था। उन्हें तब कांग्रेस उम्मीदवार प्रवीण सिंह ऐरन ने हराया था। इस बार फिर से भाजपा ने संतोष गंगवार को टिकट दिया है। वहीं सपा ने मंत्री रह चुके भागवत शरण गंगवार को यहां से उतारा है।

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रामजीलाल सुमन

हाथरस

1991 से यहां लगातार भाजपा जीत रही है। 2009 में गठबंधन के चलते भाजपा ने यह सीट रालोद को दे दी। तब रालोद की सारिका सिंह ने जीत दर्ज की थी। पिछली बार 2014 में मोदी लहर में भाजपा के राजेश दिवाकर ने 51.87 फीसदी वोट लेकर सभी उम्मीदवारों को चारों खाने चित कर दिया था। दूसरे स्थान पर बसपा और तीसरे स्थान पर सपा थी। इस बार भाजपा ने मौजूदा सांसद राजेश दिवाकर का टिकट काटकर चार बार भाजपा से सांसद रहे किशन लाल दिलेर के बेटे और इसी संसदीय क्षेत्र की इगलास विधानसभा सीट से विधायक राजवीर सिंह दिलेर को मैदान में उतारा है। सपा-बसपा-रालोद गठबंधन के समझौते में यह सीट सपा के खाते में है। गठबंधन ने इस सीट पर पूर्व केंद्रीय मंत्री रामजीलाल सुमन को प्रत्याशी बनाया है। सुमन पिछली बार भी सपा के टिकट पर लड़े थे, लेकिन तीसरे स्थान से संतोष करना पड़ा था।

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कुशीनगर

कुशीनगर

1977 को छोड़ दिया जाए तो 1984 तक हर बार कुशीनगर लोकसभा सीट पर कांग्रेस ने जीत हासिल की। 1989 में जनता दल ने चुनाव जीता। लेकिन इसके बाद 1991 से 1999 तक लगातार 4 बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर राम नगीना मिश्रा ने जीत हासिल की। 2004 में नेशनल लोकतांत्रिक पार्टी के बलेश्वर यादव ने जीत हासिल की थी, मगर 2014 में भाजपा फिर से जीतने में कामयाब रही। मतलब इस सीट पर सपा-बसपा का बहुत प्रभाव नहीं रहा है।
इस बार कुशीनगर की लड़ाई त्रिकोणीय होने वाली है, क्योंकि एक तरफ भाजपा अपनी सीट बचाने का हर संभव प्रयास करेगी, तो वहीं दूसरी तरफ सपा-बसपा एक दूसरे का साथ देगी। इसी बीच इस क्षेत्र में कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह की लोकप्रियता का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।

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राहुल गांधी-स्मृति ईरानी

अमेठी

अमेठी लोकसभा सीट को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी यहां से लगातार तीसरी बार सांसद हैं। 2014 में भाजपा की स्मृति ईरानी ने राहुल को कांटे की टक्कर दी थी, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा जीत नहीं पाई। इस बार भी इन दोनों के बीच महामुकाबला होना है। शायद यही वजह है कि महागठबंधन ने यहां प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला पहले ही ले लिया है।
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सोनिया गांधी - फोटो : PTI

रायबरेली

माना जाता है कि रायबरेली घोर कांग्रेसी सीट है। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक कांग्रेस के दिग्गजों ने यहां अपना परचम लहराया है। 2004 में सोनिया गांधी यहां से सांसद चुनी गईं और तब से लगातार जीत रही हैं। 2014 की मोदी लहर में भी यहां की जनता का मूड नहीं बदला। सपा और बसपा इस सीट पर अब तक खाता नहीं खोल सकी है और इस बार भी कोई प्रत्याशी खड़ा नहीं कर रही है।
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