'जय जवान, जय किसान' का नारा देने वाले भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का आज जन्मदिन है। देशभक्ति और ईमानदारी का प्रतीक माने जाने वाले शास्त्री जी का जन्म 2 अक्टूबर 1901 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। शास्त्री जी ने अपने विचारों और सादगी के जरिए देशवासियों के मन में अमिट छाप छोड़ी। उन्हें आज भी देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है। 1966 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। आईए उनके 116वें जन्मदिन के अवसर पर जानते हैं उनसे जुड़ी कुछ खास बातें...
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शास्त्री जी B'DaySpecial: धरती के लाल ने दहेज में लिया था चरखा और खादी....
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लाल बहादुर शास्त्री
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गरीबी में बीता बचपन
शास्त्री जी के पिता एक स्कूल शिक्षक थे। जब वह केवल डेढ़ वर्ष के थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया था। उनकी मां अपने तीनों बच्चों के साथ अपने पिता के घर जाकर बस गईं। वे कई मील की दूरी नंगे पांव से ही तय कर स्कूल जाते थे। यहां तक कि भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था। उनके पास नदी पार करने के लिए पैसे नहीं होते थे तो वह तैरकर गंगा नदी पार करते और स्कूल जाते थे।
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लाल बहादुर शास्त्री
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बदल ली थी अपनी जाति
कायस्थ परिवार में जन्में लाल बहादुर शास्त्री के बचपन का नाम नन्हे था। बड़े होने पर इन्हें लाल बहादुर शास्त्री के नाम से जाना जाने लगा। इसके बाद काशी विद्यापीठ से उन्होंने 'शास्त्री' की उपाधि हासिल की और अपने उपनाम श्रीवास्तव को हटाकर शास्त्री कर लिया।
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लाल बहादुर शास्त्री
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बचपन से थे देश प्रेमी
बचपन से ही शास्त्री जी के अंदर देश प्रेम की भावना कूट-कूट कर भरी थी। भारत में ब्रिटिश शासन का समर्थन कर रहे भारतीय राजाओं की महात्मा गांधी द्वारा की गई निंदा से वे अत्यंत प्रभावित हुए। जब वह केवल ग्यारह वर्ष के थे तभी से आजादी के आंदोलनों में शामिल होते रहे। गांधी जी के आह्वान पर इन्होंने 1921 के असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इसके बाद 1930 में हुई दांडी यात्रा और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी अग्रिणी भूमिका निभाई। देशभक्ति की भावना से लबरेज शास्त्री जी को इस संघर्ष में कई बार जेल भी जाना पड़ा।
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लाल बहादुर शास्त्री
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गांधी जी के आहवान पर छोड़ दी थी पढ़ाई
गांधी जी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए अपने देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल सोलह वर्ष के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। उनके परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था। उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ थे।
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लाल बहादुर शास्त्री
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दहेज में लिया था चरखा और खादी
1927 में उनकी शादी हो गई। उनकी पत्नी ललिता देवी मिर्जापुर से थीं जो उनके उनके शहर, बनारस के पास ही था। उन्होंने अपनी शादी में दहेज के नाम पर एक चरखा और हाथ से बुनी खादी का कुछ मीटर कपड़ा लिया था। वह दहेज के रूप में इससे ज्यादा कुछ और नहीं चाहते थे।
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रेलवे का तीसरा दर्जा शास्त्री जी की देन
आजाद भारत की पहली सरकार में शास्त्री जी ने विदेश मंत्री, गृहमंत्री और रेल मंत्री के पद भी संभाला। नेहरू जी की बीमारी के दौरान बिना विभाग के मंत्री रहे। उनके रेल मंत्री रहते आम लोगों को रेलवे में थर्ड क्लास में सफर करने का मौका मिला था। इतना ही नहीं उन्होंने रेल यात्रा करने वाले यात्रियों के मन में असमानता न रहें इसलिए प्रथम श्रेणी और तीसरे दर्जे के फासले को खत्म किया था। उन्होंने ही तीसरे दर्जे के डिब्बों में पंखे लगावाए थे।
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लाल बहादुर शास्त्री
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नैतिक आधार पर दिया था रेलमंत्री पद से इस्तीफा
देशवासियों के लिए खुद का जीवन समर्पित करने वाले लाल बहादुर शास्त्री को अपने पदों को लेकर कभी लालच नहीं रहा। वह अपनी कमियों को बखूबी तलाशते थे। उनके रेलमंत्री पद पर रहते हुए तमिलनाडु में एक रेल एक्सीडेंट हो गया। इस हादसे से शास्त्री जी को गहरा दुःख पहुंचा था। रेल हादसे के लिए अपनी मौलिक जिम्मेदारी मानते हुए उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था।
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घर से हटा दी थी बाई
शास्त्री जी अपने शरीर पर खर्च होने वाले रुपये को भी देशवासियों से जोड़कर देखते थे। भारत पाकिस्तान युद्ध के दौरान उन्हें लगता था कि जो खर्च उन पर हो रहा है कि उससे कितने देशवासियों को फायदा होगा। कहा जाता है कि शास्त्री जी की पत्नी ललिता देवी एक बार जब बीमार हो गईं तो शास्त्री जी ने घर में आने वाली बाई को मना कर दिया था। वह उस समय अपनी सैलरी भी नहीं लेते थे।
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लाल बहादुर शास्त्री
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बच्चे का ट्यूशन भी बंद
भारत-पाक युद्ध के समय शास्त्री जी ने घर में बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाने वाले टीचर को भी मना कर दिया। जब उनसे टीचर ने बच्चों के फेल होने की बात कही तो उनका कहना था कि देश में लाखों बच्चे फेल होते हैं। एक उनका बच्चा भी फेल हो जाएगा। इसके साथ ही यह तर्क दिया कि अंग्रेज भी तो हिंदी में कभी पास नहीं होते हैं। यहां तक कि वह धोती फटने पर उसे सिलकर पहनते थे।
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लाल बहादुर शास्त्री
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18 महीने रहे देश के प्रधानमंत्री
जवाहर लाल नेहरू के देहांत के बाद लाल बहादुर शास्त्री को देश का दूसरा प्रधानमंत्री चुना गया। उस वक्त मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बनना चाहते थे लेकिन अंततः कई तरह की राजनीतिक उठापटक के बाद 9 जून 1964 को शास्त्री जी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। वह 11 जनवरी 1966 तक प्रधानमंत्री पद पर आसीन रहे। इस 18 महीने के कार्यकाल में ही भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध भी हुआ था। इस दौरान पाकिस्तान के साथ युद्ध में कुशल नेतृत्व व दूरदर्शी फैसलों से उन्होंने पाकिस्तान को मार भगाया था। भारतीय सेना पाकिस्तान को परास्त करते हुए लाहौर तक पहुंच गई थी। शास्त्री जी कार्यकाल राजनैतिक सरगर्मियों से भरा था।
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लाल बहादुर शास्त्री
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छोड़ दिया था खाना
भारत पाक युद्ध के समय देश भुखमरी के दौर से गुजरने लगा था। यह देश के सामने एक बड़ा संकट था। अमेरिका से जब इस संबंध में मदद मांगी गई तो उसने सुअरों को खिलाया जाने वाला लाल गेंहूं भारत भेज दिया था। देश में अन्न का विकराल संकट था। इस समय लाल बहादुर शास्त्री जी देश के भंडारण में गेंहू व अन्य अनाजों की व्यवस्था कराने में जुटे थे, लेकिन इस दौरान उन्होंने लोगों से अपील की हर देशवासी सप्ताह में एक बार उपवास रखे। इससे एक दिन के उसके बचे खाने से उसके दूसरे भाई का पेट भरेगा। खुद शास्त्री जी ने भी सप्ताह में एक दिन सोमवार को खाना छोड़ दिया था। इसी दौरान उन्होंने 'जय जवान और जय किसान' का नारा दिया था.
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लाल बहादुर शास्त्री
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संदेहास्पद मौत
भारत पाकिस्तान के बीच 1965 की लड़ाई के बाद तत्कालीन सोवियत संघ के ताशकंद में दोनों देशों के बीच 1966 में शांति समझौता हुआ था। इस समझौते के बाद दिल का दौरा पड़ने से 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में ही शास्त्री जी का निधन हो गया था। लेकिन शास्त्री जी की मौत का असली कारण बता पाना आसान नहीं है, क्योंकि उनके शव का न तो सोवियत संघ में पोस्टमार्टम किया गया था और न ही भारत में, लेकिन शक के पर्याप्त कारण थे। इनमें एक था उनके शव का नीला हो जाना और शरीर पर कटने का दाग। इसलिए यह भी सवाल उठा कि क्या शास्त्री जी की मौत खाने में जहर देने से हुई थी? या समझौते को लेकर शास्त्री जी काफी मानसिक दबाव में थे और इसी कारण उन्हें दौरा पड़ा था।