केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में वक्फ संशोधन कानून, 2025 का बचाव करते हुए कहा कि यह कानून स्पष्ट रूप से सांविधानिक आधार पर खड़ा है और किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करता। केंद्र ने कहा, संसद से पारित ऐसा कानून जो सांविधानिक आधार पर खड़ा हो, उसपर पूर्ण रोक नहीं लगा सकते। केंद्र ने कहा, यह कोर्ट सुनवाई के दौरान याचिकाओं में दी गई चुनौतियों की जांच करेगा, लेकिन यदि याचिकाएं खारिज हो जाती हैं तो सामान्य मामलों में (यहां तक कि मुस्लिम समुदाय के सदस्यों पर भी) ऐसे स्थगन आदेश के प्रतिकूल परिणामों (खासकर कानून की वैधता के संदर्भ में) के बारे में जाने बिना, कानून पर पूर्ण या आंशिक स्थगन देना अनुचित होगा। केंद्र ने चीफ जस्टिस संजीव खन्ना की अगुवाई वाली पीठ, जो 5 मई को याचिकाओं पर अंतरिम आदेश देने वाली है, से अनुरोध किया कि कानून के प्रावधानों पर कोई स्थगन न दिया जाए।
केंद्र ने अपने 1,332 पन्नों के हलफनामे में शीर्ष अदालत से कानून की वैधता को चुनौती देने वाली उन याचिकाओं को खारिज करने का आग्रह किया, जिनमें कानून के कुछ प्रावधानों के बारे में शरारतपूर्ण झूठी कहानी गढ़ी गई है। सरकार ने कहा, वक्फ कानून राज्य की विधायी शक्ति का एक वैध और विधिसम्मत उपयोग है, जो वक्फ संस्था को मजबूत करता है। यह कानून वक्फ प्रबंधन को सांविधानिक सिद्धांतों के साथ जोड़ता है और समकालीन समय में वक्फ के समग्र कार्यान्वयन की सुविधा प्रदान करता है।
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अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की ओर से दायर हलफनामे में कहा गया है, कानून में संशोधन केवल संपत्तियों के प्रबंधन के संबंध में धर्मनिरपेक्ष पहलू के विनियमन के लिए हुआ है, इसलिए, संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत मिल धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी का यह कानून कोई उल्लंघन नहीं करता। यह संशोधन अधिनियम पूरी तरह से राज्य को मिली हुई नियामकीय शक्ति के अंतर्गत है। सरकार ने कहा कि कानून में सरकारी भूमि की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधान मनमाने नहीं हैं और सार्वजनिक संपत्ति की अखंडता को बनाए रखने के लिए एक सुविचारित विधायी उपाय हैं।
केंद्र ने कहा, कानून में यह तय स्थिति है कि सांविधानिक अदालतें किसी वैधानिक प्रावधान पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रोक नहीं लगाएंगी और विवाद की स्थिति में मामले पर अंतिम फैसला सुनाया जाएगा। सांविधानिक धारणा है जो संसद द्वारा बनाए गए कानूनों पर लागू होती है।