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रामायण से सीख लेकर इंदिरा गांधी ने बनाई थी 'वानर सेना'

सार

मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा। 
तस्वीरों के माध्यम से जानते हैं इंदिरा गाँधी की जिंदगी के सफर को। 
जब रामायण से इंदिरा गांधी ने ली सीख।   
31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा ने ली अंतिम सांस। 
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इंदिरा गांधी - फोटो : Amar Ujala
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" मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा"

इंदिरा गांधी सख्त शख्सियत के लिए जानी जाती थी, हालांकि यह उनके व्यक्तित्व का महज एक पक्ष था। वास्तव में उनका व्यक्तित्व बहुरंगी और बहुआयामी था। प्रशासन से लेकर प्रकृति, परवरिश से लेकर परिवार और पढ़ाई से लेकर पॉलिसी तक- सभी मोर्चे पर एक साथ उनके कई रंग देखने को मिलते हैं। कभी पिता नेहरू और गांधी की गोद में, तो कभी संभावनाएं और सरोकार तलाशती युवती की भूमिका में, तो कभी बीमार मां और पति की तीमारदारी में, तो कभी अबूझ पहेलियों में उलझे उनके दार्शनिकता लिए चेहरे में, तो कभी बच्चों को दुलारती-पुचकारती मां और दादी की भूमिका में- उनका हर किरदार, हर रंग और हर छटा निराली है। हमारी इस फोटो गैलरी में आपको उनके ये सारे रंग और रूप मिल जाएंगे
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इंदिरा गांधी

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इंदिरा गांधी की बचपन की तस्वीर - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
19 नवंबर 1917 को इंदिरा गांधी का जन्म इलाहाबाद के स्वराज भवन में हुआ था। उनके दादा मोतीलाल नेहरू ने उनका नाम रखा इंदिरा और जब पिता जवाहर लाल नेहरू ने उनका चेहरा देखा तो उनको प्रियदर्शिनी नाम दिया।
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जवाहर लाल नेहरू की इंदिरा प्रियदर्शिनी

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इन्दिरा गांधी के 13वें जन्मदिन की तस्वीर - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
जवाहरलाल नेहरू के लिए इंदिरा उम्मीद थी, परिवार में जब इंदिरा का जन्म हुआ तो बहुत लोग बेटी के जन्म पर निराश हुए मगर पिता जवाहरलाल नेहरू के लिए इंदिरा उनका सपना थी। 

 

रामायण से इंदिरा गांधी ने ली सीख 

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इंदिरा गांधी का बचपन - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
रामायण से इंदिरा गांधी ने ली सीख 

स्वतंत्रता आंदोलन का समय चल रहा था उस वक्त इंदिरा 12 साल की थीं, उन्होंने बच्चों की एक वानर सेना बनाई और उसका नेतृत्व किया, वानर सेना बनाने का विचार उनके मन में रामायण से आया जिस तरह रावण के साथ युद्ध करने के लिए प्रभु श्रीराम ने वानर सेना की मदद ली थी, इंदिरा की वानर सेना में बहुत सारे बच्चे शामिल थे।


 
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इंदिरा गांधी हमेशा से ही महात्मा गांधी के करीब रही हैं

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महात्मा गांधी के साथ इंदिरा गांधी - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
इंदिरा गांधी हमेशा से ही महात्मा गांधी के करीब रही हैं, जब फिरोज से शादी को लेकर मुश्किलें आ रही थी तो महात्मा गांधी ने ही रास्ता निकाला था।  
महात्मा गांधी के साथ युवा इंदिरा हमेशा तस्वीरों में मुस्कुराती नजर आईं।  
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1937 में इंदिरा अपनी पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड चली गई

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indira gandhi - फोटो : PTI
1937 में इंदिरा अपनी पढ़ाई के लिए ऑक्सफोर्ड चली गईं और 1941 में अपनी पढ़ाई पूरी करके भारत वापस लौट आईं। पिता जवाहर लाल नेहरू को उम्मीद थी इंदिरा विदेश से लौटकर उनके साथ राजनीति के सफर पर चलेंगी मगर उन्होंने भारत पहुंचते ही फिरोज के साथ अपनी शादी का प्रस्ताव उनके सामने रख दिया जिसको सुनकर जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया। 
 
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इंदिरा ने अपनी पसंद से फिरोज गांधी से इलाहाबाद में शादी कर ली

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फिरोज गांधी के साथ इंदिरा गांधी ( शादी की तस्वीर ) - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
लम्बें संघर्ष के बाद  26 मार्च 1942 को इंदिरा ने अपनी पसंद से फिरोज गांधी से इलाहाबाद में शादी कर ली। 

 

फिरोज गांधी के साथ शादी करने के बाद इंदिरा कश्मीर घूमने गई

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कश्मीर में इंदिरा गांधी - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
फिरोज गांधी के साथ शादी करने के बाद इंदिरा कश्मीर घूमने गई और जब वहां से लौटकर आयीं तो उनको और फिरोज गांधी को अंग्रेज हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया और नैनी जेल में डाल दिया।
 

पिता और पति के बीच इंदिरा की कश्मकश चलती रहती थी

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नेहरू जी के साथ राजीव और संजय - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIV
  • इंदिरा और फिरोज के रिश्तें बहुत सहज कभी नहीं रहे अक्सर पिता और पति के बीच इंदिरा की कश्मकश चलती रहती थी और घर के झगड़ों का असर बाहर भी जीवन में दिखने लगा था, फिरोज जवाहर लाल के साथ उनके घर रहना नहीं चाहते थे और इंदिरा को राजनीति के लिए जवाहर के साथ रहना पड़ता था, संजय और राजीव का ज्यादातर समय अपने नाना के साथ उनके घर पर ही गुजरा। 
  • इंदिरा का जीवन संघर्षशील रहा और हमेशा वो अपने पिता के साथ खड़ी नजर आई, फिरोज से शादी के बाद भी वो ज्यादातर अपने बच्चों के को लेकर अपने पिता के साथ रहा करती थीं।   

27 मई 1964 जवाहर लाल नेहरू की मौत

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इन्दिरा नेहरू जी के साथ - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
27 मई 1964 जवाहर लाल नेहरू की मौत के बाद इंदिरा को बहुत बड़ा धक्का लगा क्योंकि उनके सिर से पिता का साया तो उठ गया साथ ही उनके जीवन का सबसे बड़ा सहारा भी चला गया।  

 

इंदिरा गांधी 1959-60 में कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं

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1959-60 में कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
राजनीति में अपना कदम बढ़ाते हुए इंदिरा गांधी 1959-60 में कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं, और यही से शुरुआत हुई उनके बड़े राजनैतिक सपने की।  

 

तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाते हुए

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तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी ने इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
  • 18 मार्च,1971 इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बनी और को तत्कालीन राष्ट्रपति वीवी गिरी ने उनको प्रधानमंत्री पद की शपथ दिलाई।  
  • इंदिरा को आयरन लेडी भी बोला गया, वो मजबूत इरादों की महिला थी मगर भीतर से बहुत संवेदनशील भी,अपने परिवार को अपने राजनैतिक जीवन के साथ एक सूत्र में बांधकर रखती थी और पूरा प्रयास करती थी अपना वक्त परिवार के साथ गुजारने का।   
  • राहुल और प्रियंका गांधी के साथ इंदिरा गांधी अक्सर अच्छा वक्त गुजारा करती थी।  ऐसी तस्वीरें अक्सर देखने को मिल जाती हैं जिसमें उनके साथ संजय और राजीव गांधी के साथ गुजारे हुए समय की यादें ताजा हो जाती हैं।

 1972 में भारत-पाकिस्तान शिमला शिखर बैठक

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इंदिरा गांधी जुल्फिकार भुट्टो के साथ - फोटो : Social Media

 1972 में भारत-पाकिस्तान शिमला शिखर बैठक हुई और उसमें  पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार भुट्टो अपनी बेटी बेनजीर भुट्टो के साथ शिमला आए थे, बेनजीर उस समय बेनजीर भुट्टो 19 साल की थी। यह तस्वीर उसी अवसर की हैं।

 

31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा ने अंतिम सांस ली

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इंदिरा गांधी की अंतिम यात्रा की तस्वीर - फोटो : SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE
31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी ने ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में हुई एक चुनावी जनसभा में अलग अंदाज में भाषण दिया था। इस भाषण को लिखा था उनके सूचना सलाहकार एचवाई शारदा ने। उस दिन कुछ अलग हुआ था अचानक से इंदिरा गांधी अपना लिखा भाषण बीच में ही छोड़कर खुद से ही बोलने लगीं थी। उस दिन उन्होंने अपने भाषण में कहा था,
'मैं आज यहां हूं। कल शायद यहां न रहूं। मुझे चिंता नहीं मैं रहूं या न रहूं। मेरा लंबा जीवन रहा है और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी आखिरी सांस तक ऐसा करती रहूंगी और जब मैं मरूंगी तो मेरे ख़ून का एक-एक क़तरा भारत को मजबूत करने में लगेगा।'

अगले दिन 31 अक्टूबर को वह सुबह करीब 9 बजे इंदिरा गांधी तेजी में 1 अकबर रोड की ओर बढ़ीं। कुछ दूर चलने पर इंदिरा गेट के पास पहुंची और गेट के पास ही सब इंस्पेक्टर बेअंत सिंह  ड्यूटी में तैनात थे, उसने गोली चला दी और इंदिरा गांधी ने अंतिम सांस ली ।

PICTURE SOURCE:  INDIRA GANDHI MEMORIAL TRUST, ARCHIVE 
SOURCE: Indira Gandhi : Tryst With Power, Nayantara Sahgal
SOURCE:
Feroze Gandhi: The Forgotten, Bertil Falk
 
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