इंडिगो के उड़ान रद्द
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सबसे चिंताजनक बात यह रही कि एयरलाइन ने न कोई स्पष्ट प्रेस ब्रीफिंग की, न ही यात्रियों को यह बताया कि स्थिति कब सामान्य होगी। सूचना मॉनिटर लगातार देर और रद्द के बीच बदलते रहे, लेकिन स्थिति की जड़ में क्या समस्या है, यह जानने का बुनियादी अधिकार होने के बावजूद किसी यात्री को स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। यात्रियों विशेषकर बुजुर्गों, महिलाओं और छोटे बच्चों में तनाव और असुरक्षा का भाव लगातार बढ़ता गया। विशेषज्ञों का मानना है कि इंडिगो के तेज विस्तार, सीमित क्रू बफर, अत्यधिक सघन टाइम-टेबल और नियामक ढील ने मिलकर एक ऐसा दबाव तैयार किया, जो अंततः सिस्टम को तोड़ गया।
मौन, भ्रम और जवाबदेही का अभाव
रिपोर्ट के अनुसार इस बड़े पैमाने के संकट का सबसे हैरान करने वाला पहलू था सरकार और नियामक संस्थाओं की बेहद धीमी प्रतिक्रिया। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने दो संक्षिप्त बयान जारी किए, जिनमें केवल इतना कहा गया कि स्थिति की निगरानी की जा रही है और यात्रियों से धैर्य रखने का आग्रह किया गया है। इस संकट का पैमाना और उसके मानवीय प्रभाव इतने विशाल थे कि विशेषज्ञों ने इसे उड्डयन क्षेत्र के लिए नेशनल-लेवल इमरजेंसी मानने की मांग की, लेकिन सरकार ने इसे सामान्य परिचालन अव्यवस्था के दायरे में ही रखा। नियामक संस्था डीजीसीए ने एयरलाइन से रिपोर्ट मांगी, पर रिपोर्ट की समय सीमा और जांच के दायरे को लेकर भी अस्पष्टता रही।