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इबारत 2018 : देश-दुनिया में घटी वो घटनाएं जिन्होंने समाज को झकझोर कर रख दिया

Fri, 28 Dec 2018 05:04 AM IST
Gaurav Pandey न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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साल 2018 अपने अंतिम पड़ाव पर है। लोग नए साल का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। साल 2018 कई ऐसी यादें दे गया है जिनकी छाप आने वाले लंबे समय तक लोगों के स्मृति पटल से धुंधली नहीं होंगीं। इबारत-2018 में हम आपके लिए लाए हैं ऐसी ही घटनाओं का संकलन। पढ़िए ऐसे ही घटनाक्रमों का ब्योरा...
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मॉब लिंचिंग : लोगों से हारता लोकतंत्र

हम दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने पर फख्र महसूस करते हैं। लेकिन जब लोकतंत्र गढ़ने वाले लोग भीड़ की शक्ल में किसी मासूम का घर उजाड़ते हैं, ड्यूटी कर रहे अफसर की हत्या से नहीं हिचकते और रुआब दिखाते हुए वृद्धाओं और बच्चियों को नोच डालते हैं, तो यह गुरूर पल में चूर-चूर हो जाता है। देश का शायद ही कोई कोना होगा जहां से ऐसी खबरें न मिलती हों कि ‘भीड़ का आतंक’ ‘कहर बनी भीड़’, ‘गुस्साई भीड़ ने वाहन फूंके’, ‘भीड़ ने की हत्या’। 

बेशक लोकतंत्र लोगों की ताकत से ही चलता है। लोगों का बेखौफ होना कामयाब लोकतंत्र की निशानी है। लेकिन लोकतंत्र, आजादी और हक के नाम पर कानून हाथ में लेना और अपराध को अधिकार समझ लेना भीड़ का दुस्साहस है। भीड़ जब बेखौफ होकर कानून हाथ में लेने लगे तो यह लोकतंत्र नहीं रह जाता, इसे अराजकता कहा जाता है। यह हमारे लिए बेहद शर्म और अफसोस की बात है कि एक-तरफ हम खुद को तहजीब और जहीनियत का सबसे बड़ा मुकाम बताते हैं, लेकिन ठीक उसी वक्त इस देश में कहीं न कहीं इन मूल्यों और सिद्धांतों की बखिया उधेड़ी जा रही होती है। 

इस वर्ष दो दर्जन से ज्यादा ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिनमें भीड़ ने कानून हाथ में लिया और कई लोगों की हत्या कर दी। यह हमारे उस वर्ग का नकारापन है, जिसे हम अपने प्रतिनिधित्व के लिए चुनते हैं। यह राजनीतिक इच्छाशक्ति का ही अभाव है कि हाथों में हथियार लिए खड़े जवानों पर आतंकी बेखौफ पत्थर बरसाते हैं। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती, यह हिमाकत एक ऑन ड्यूटी पुलिस अधिकारी की हत्या तक पहुंच जाती है। आखिर में सर्वोच्च न्यायालय को सरकार को यह कहना पड़ता है कि मॉब लिंचिग के खिलाफ संसद में कानून बनाया जाए। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्देश हमारे लोकतंत्र की असल हालत और समाज के विद्रूप चेहरे को दिखाता है। हमें यह सबक लेने की जरूरत है कि लोकतंत्र भीड़तंत्र न बने।

मृतकों, अनाथों और बेघरों को इससे क्या फर्क पड़ेगा कि तबाही और पागलपन अधिनायकवाद का नाम है या स्वतंत्रता या लोकतंत्र का पवित्र नाम है?  - महात्मा गांधी
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जहरीली हवा में थमती सांसें

हम जानते हैं, प्रदूषण का दूसरा नाम मौत है। यह भी जानते हैं कि हर वर्ष लाखों मौतें प्रदूषण की वजह से होती हैं। देश में होने वाली आठ मौतों में से एक मौत वायु प्रदूषण की वजह से होती है। देश में इस वर्ष करीब दस लाख लोग वायु प्रदूषण की वजह से बेमौत मारे गए। सबकुछ जानने के बाद भी हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। आखिर हम कब यह सबक लेंगे कि इस देश के लिए सबसे बड़ा खतरा हम ही हैं। आंकड़ों के मुताबिक हर साल दुनिया भर में केवल प्रदूषण की वजह से दस लाख मौतें होती हैं। वहीं, केवल दिल्ली -एनसीआर में हर साल 30 हजार मौतों का कारण प्रदूषण बनता है। 

रोजमर्रा की इंसानी गतिविधियां एक बड़े परमाणु धमाके से ज्यादा खतरनाक और प्रदूषण फैलाने वाली हैं। इंसानों जैसी मूर्खता कोई दूसरी प्रजाति नहीं कर सकती। हम जानबूझकर अपने घर को तबाह कर रहे हैं। यह कैसी तरक्की?

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एक परिवार, 11 लाशें और सोता समाज

11 लोगों की मौत होती है और पड़ोसियों को खबर अखबार से मिलती है। यह किसी वीरान जगह की नहीं, देश की राजधानी दिल्ली की घटना है, जहां भीड़ की वजह से खुले में सांस लेना मुमकिन नहीं। 01 जुलाई 2018 को हुआ बुराड़ी कांड खोखले होते समाज को सबक है। इसी तरह जोधपुर के एक अंधविश्वासी पिता ने अल्लाह को खुश करने के नाम पर अपनी बच्ची की बलि दे दी। जिस तरह से हमारे देश में अंधविश्वास से जुड़ी घटनाएं होती हैं, वो काफी चिंताजनक हैं। कब सुधरेंगे हम और बदलेंगे हम?
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नैतिकता के अवशेषों का अवसान

धारा 377 को सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान विरोधी बताते हुए समलैंगिक रिश्तों को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। इसी तरह के दूसरे मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने आईपीसी धारा 497 के तहत जुर्म व्यभिचार को भी अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। इसके अलावा सबरीमाला मंदिर में धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ महिलाओं के प्रवेश की इजाजत दी। इन मामलों में न्यायालय के फैसले जनभावना के खिलाफ लोकतंत्र के बहुलता की स्वीकृति के सिद्धांतों के परे हैं। 

जब नैतिकता की जमीन पर उतरकर इन फैसलों का आकलन करते हैं, तो जो सवाल उठते हैं, उनका जवाब सर्वोच्च न्यायालय के पास भी नहीं है।
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फेसबुक और फेक न्यूज

हमारे बारे में बहुत सी बातें जो हम नहीं जानते और शायद कभी जान भी नहीं पाएंगे, उन बातों को फेसबुक जैसी टेक कंपनियां जानती हैं। क्या यह डरावना नहीं है कि उन्हें हमारी पसंद-नापसंद, चाहत, नफरत, निराशा और उम्मीदों के बारे में पता है। चाहे इस बात पर हम यकीन न कर पाएं, लेकिन सच यही है कि हम तकनीक के लुभावने जाल में इस तरह से फंस चुके हैं, जहां से निकलना मुमकिन नहीं। फेसबुक द्वारा कैंब्रिज एनालिटिका को अपने यूजर्स का डेटा बेचना सीधे तौर पर निजता के भरोसे की नीलामी थी। मेटाडेटा के नाम पर चल रहा यह खेल देशों की सरकारें बनाने-बिगाड़ने की कुव्वत रखता है। कैंब्रिज एनालिटिका के बाद फेसबुक ने अमेजन के साथ भी मेटाडाटा साझा किया है। 

कैंब्रिज एनालिटिका

न्यूयॉर्क टाइम्स ने खबर छापी कि कैंब्रिज एनालिटिका ने 50 मिलियन फेसबुक यूजर्स का डाटा बिना इजाजत इस्तेमाल किया है। डाटा चुराने का आरोप अलेक्जेंडर कोगन पर लगा। लेकिन शुरुआती गलती फेसबुक की थी।

हमारे देश में सुविधाओं के दुरुपयोग की लंबी परंपरा रही है। दशकों से दुनियाभर में चल रहे व्हाट्सएप को भारत में फेक न्यूज के लिए इस्तेमाल के खिलाफ प्रचार अभियान चलाना पड़ा। यह समाज की साझी समझ पर सवालिया निशान खड़ा करता है।
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सरकारें सोती रहीं, बैंक लुटते रहे 

एक तरफ जहां किसान छोटे से कर्ज के बोझ तले आत्महत्या करने को मजबूर हैं वहीं, विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे लोग बैंकों का हजारों करोड़ रुपए लेकर विदेश में ऐशो-आराम की जिंदगी बिता रहे हैं। विजय माल्या ने देश के 17 बैंकों से करीब 9000 करोड़ रुपए कर्ज लिया और जब चुकाने के लिए दबाव पड़ने लगा, तो वह विदेश भाग गया। कुछ ऐसा ही मामला नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का भी है। ये दोनों पंजाब नेशनल बैंक में 13,500 करोड़ रुपये के घोटाले के आरोपी हैं। वित्त वर्ष 2016-17 के अंत तक जानबूझकर कर्ज न चुकाने वालों पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का 92,376 करोड़ रुपये का बकाया था। इससे पिछले वित्त वर्ष 2015-16 के अंत तक यह आंकड़ा 76,685 करोड़ रुपये था। वहीं, मार्च 2017 के अंत तक डिफॉल्टरों की संख्या बढ़कर 8,915 पर पहुंच गई है।

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मुकदमा न पेशी, सीधे गोली मारने वाली पुलिस

न वह अपराधी था, न आतंकी था। वह तो किसी जुर्म का आरोपी भी नहीं था। न कोई मुकदमा हुआ, न आरोप पत्र दाखिल हुए। लेकिन सजा-ए-मौत दे दी गई। आमतौर पर सुस्ती और नाकामी का तमगा लिए घूमने वाली पुलिस बहुत फुर्तीली हो गई और एक बेगुनाह की ड्यूटी के नाम पर हत्या कर दी गई। हमें पुलिस की अहमियत और जरूरत पर कोई शक नहीं है। न ही कोई ऐसा मुगालता है कि बिना पुलिस के समाज बेहतर बनाया जा सकता है। 

हम उन तमाम बहादुर सिपाहियों का तहे दिल से शुक्रिया अदा करते हैं जिनके भरोसे चैन की नींद सोते हैं। लेकिन, इस भरोसे की तह के ठीक नीचे डर रहता है, जिसकी वजह से समाज को सुरक्षित बनाने वाली पुलिस से सामना करने में आम शहरी को डर लगता है। समाज और पुलिस का रिश्ता बेहद पेचीदा है। एक तरफ पुलिस के करीब आने से डर लगता है, दूसरी तरफ पुलिस न दिखे, तो भी दिल दहलने लगता है। हमें पुलिस चाहिए, लेकिन बेवजह गोली मारने वाली पुलिस नहीं।

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क्रिप्टोकरेंसी : तबाह होते लोग, टूटते मिथक और अपराध का सबब

क्रिप्टोकरेंसी के लिए यह वर्ष एक खौफनाक सपने की तरह बीता है। 15 दिसंबर 2017 को एक बिटकॉइन की कीमत 19650 यूएस डॉलर थी। इस वर्ष 15 दिसंबर को इसकी कीमत 3183 यूएस डॉलर थी। मूल्य में करीब 80 फीसदी की कमी ने दुनियाभर के निवेशकों की खरबों की पूंजी तबाह की है। इसके अलावा यह दुनियाभर में अपराध और आतंक की पूंजी के तौर पर भी पहचानी जाने लगी है। क्रिप्टोकरेंसी को लेकर दुनियाभर में उत्साह की सबसे बड़ी वजह निजता और सुरक्षा थी। निजता अपराध का सबब बन गई और सुरक्षा के दावे खोखले साबित हुए। 

जापान में चोरी : जापान ने आधिकारिक पहचान दी, नियामक संस्था बनाई और दुनिया की सबसे बड़ी और पहली क्रिप्टोकरेंसी चोरी भी जापान में ही हुई। 2018 में जापान में करीब 1 बिलियन डॉलर मूल्य की क्रिप्टोकरेंसी की सेंधमारी हुई है। जबकि दुनियाभर में कई दर्जन ऐसी घटनाएं हुईं। 

रेट पॉइजन है क्रिप्टोकरेंसी : मशहूर निवेशक वॉरेन कहते हैं, 'आप चाहें तो बिटकॉइन खरीद सकते हैं। लेकिन मैं यही कहूंगा कि यह सोना खरीदने से भी बदतर है। आखिर में इसकी हालत बहुत खराब होगी। यह अब-तक का सबसे बड़ा घोटाला है और ट्यूलिप सनक साबित होगा।'
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क्रिश्चियन मिशेल  : 3600 करोड़ रुपये के वीवीआईपी हेलीकॉप्टर घोटाले में बिचौलिए का काम करने वाले क्रिश्चियन मिशेल को यूएई से भारत लाया गया। यह अपराधियों के लिए बड़ा सबक है, जो मानते हैं कि वे कानून की पहुंच से दूर हैं। मिशेल अभी न्यायिक हिरासत में है। 

पाकिस्तान : विदेशों से मिली मदद को आतंकियों में बांटने वाले पाकिस्तान को अब अपनी करतूतों का अंजाम भुगतना पड़ रहा है। पाकिस्तान को फाइनेंशल एक्शन टास्क फोर्स ने ग्रे लिस्ट में शामिल कर लिया, जिसके बाद से पाक की आर्थिक हालत लगातर खराब होती जा रही है। पाक अब भी सबक नहीं लेता है, तो अंजाम और बुरा होगा।

सज्जन कुमार : 1984 में हुए दंगों में सिखों की हत्या के आरोपी सज्जन कुमार को दिल्ली उच्च न्यायालय ने आजीवन कैद की सजा सुनाई है। सज्जन कुमार को तीन दशक बाद सजा मिली है। भले ही सज्जन कुमार को सजा मिलने में बहुत वक्त लगा हो, लेकिन यह फैसला साबित करता है कि न्याय के दर पर देर हो सकती है, अंधेर नहीं। 

जॉनसन एंड जॉनसन  : जॉनसन एंड जॉनसन को 22 महिलाओं को 4.69 अरब डॉलर का हर्जाना चुकाने का आदेश दिया गया। उन महिलाओं ने दावा किया था कि कंपनी के बेबी पाउडर समेत दूसरे टैल्कम प्रोडक्ट्स में एस्बेस्टस था। इस वजह से उन्हें गर्भाशय का कैंसर हो गया।

गूगल पर जुर्माना : इस वर्ष 18 जुलाई को यूरोपीय यूनियन (ईयू) ने इंटरनेट सेवाएं देने वाली कंपनी गूगल पर 4.3 अरब यूरो का जुर्माना लगाया। गूगल ने अपने ब्राउजर और सर्च इंजन के बाजार में विस्तार के लिए एंड्रायड के दबदबे का दुरुपयोग किया था। इससे पहले यूरोपीय संघ ने अमेरिका की दो अन्य बड़ी कंपनियों एप्पल और फेसबुक पर भी भारी जुर्माना लगाया था।  
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