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दुश्मन के छक्के छुड़ाने में माहिर गरुड़ कमांडो हैं भारतीय वायु सेना के 'ब्रह्मास्त्र'

Tue, 09 Oct 2018 12:47 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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तीन दिन पहले भारतीय वायु सेना के पठानकोट स्टेशन पर आतंकी हमला हुआ। इस हमले का मुकाबला करने में और आतंकियों को सबक सिखाने में सबसे अहम भूमिका निभाई वायु सेना की विशेष इकाई गरुड़ कमांडो फोर्स ने। वीरता की नई परिभाषा लिखने वाले गरुड़ कमांडो फोर्स के जवान हर परिस्थिति का मुकाबला करने के लिए प्रशिक्षित होते हैं।

रक्षा सेवाओं की सबसे नई इकाई गरुड़ कमांडो फोर्स की आधार शिला 2003 में रखी गई थी। सेना के पैरा कमांडो और नौसेना के मार्कोज बल की तर्ज पर प्रशिक्षित गरुड़ कमांडो कम समय में परिस्थिति के मुताबिक खुद को ढालने और एक्शन लेने में विशेषता रखते हैं। 

आइए जानते हैं गरुड़ कमांडो फोर्स के बारे में वो बातें जो उसे खास बनाती हैं...
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2003 में हुई स्थापना

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एक विशेष बल के निर्माण की जरूर वायुसेना को तब महसूस हुई जब 2001 में एयर फोर्स के दो हवाई अड्डे आतंकी हमलों की चपेट में आ गए। इस घटना के बाद वायु सेना को एक ऐसे बल की जरूरत महसूस हुई जो आपात स्थितियों का मुकाबला करने में सक्षम हो और ऐसी स्थितियों का मुंहतोड़ जवाब दे सके। इसी के बाद 2003 में गरुड़ कमांडो फोर्स की स्थापना की गई।
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बेहद कठिन प्रशिक्षण से गुजरते हैं कमांडो

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गरुड़ कमांडो की ट्रेनिंग नौसेना के मारकोज और आर्मी के पैरा कमांडो के आधार पर की गई है। इन्हें एयरबोर्न आपरेशन (वायुयान संचालन), एयरफील्ड सीजर) हवाई क्षेत्र पर कब्जा, और आतंकवादियों से मुकाबला करने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। गरुड़ कमांडो ने जम्मू-कश्मीर में विद्रोहियों का मुकाबला भी किया है। शांति के समय गरुड़ कमांडो का प्रमुख कार्य भारतीय वायु सेना के एयर फील्ड की रक्षा करना होता है। 

विशेष फोर्स के लिए होती है सीधी भर्ती

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थल सेना और वायु सेना की तरह गरुड़ कमांडो वॉलंटियर नहीं होते। विशेष फोर्स के लिए ट्रेनिंग हेतु इनकी सीधी भर्ती की जाती है। साथ ही, एक बार गरुड़ फोर्स ज्वाइन करने के बाद कमांडो अपने शेष करियर के दौरान यूनिट के साथ ही रहते हैं। इससे यह पुष्ट होता है कि यूनिट के पास लंबे समय तक बेहतरीन जवान रहें।
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52 सप्ताह तक चलता है शुरुआती प्रशिक्षण

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Garud Commando
हालांकि, गरुड़ कमांडो में भर्ती होना कोई आसान काम नहीं है। सभी रंगरूटों के लिए बेसिक प्रशिक्षण कार्यक्रम 52 सप्ताह तक चलता है, जो भीरतीय विशेष बलों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सबसे लंबा है। शुरुआत के तीन महीने बेहत संघर्षपूर्ण होते हैं। इनमें से सर्वश्रेष्ठ लोग ही ट्रेनिंग के अगले चरण में प्रवेश कर पाते हैं। 
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प्रशिक्षण का दूसरा चरण विशेष फ्रंटियर फोर्स, भारतीय सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड के साथ जुड़ा होता है। इस चरण में सफल होने वाले लोग की प्रशिक्षण के अगले चरण में जगह बना पाते हैं। इस दौरान उन्हें कठिन शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण से गुजरना पड़ता है। इसका उद्देश्य भावी जवानों के हर परिस्थिति का मुकाबला करने के योग्य बनाना होता है।
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इस कठिन परीक्षण में सफल होने वाले लोगों को आगरा स्थित पैराशूट ट्रेनिंग स्कूल में भेजा जाता है। यहां उन्हें आपात स्थिति में चलते हवाई जहाज या हेलीकॉप्टर से प्रभावित क्षेत्र में कार्रवाई को अंजाम देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। उन्हें पैराशूट की सहायता कूदने का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इस दौरान रंगरूट मार्कोज और पैरा कमांडो की तरह ही पैरा बैज पहनते हैं।

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गरुड़ कमांडो को मिजोरम स्थित सेना के जवाबी कार्रवाई और जंगल वारफेयर स्कूल (सीआईजेडब्ल्यूएस) में प्रशिक्षण दिया जाता है। दुनिया भर के अलग-अलग देशों की सेनाओं के सैनिक सीआईजेडब्ल्यूएस आते हैं, जो जवाबी कार्रवाई में भारत के व्यापक अनुभव से सीखते हुए ऐसी कार्रवाइयों को अंजाम देना सीखते हैं।

सेना की कार्रवाइयों के साथ होती है शुरुआत

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Garud Commando
प्रशिक्षण के अंतिम चरण में गरुड़ कमांडो को भारतीय सेना के पैरा कमांडो की सक्रिय इकाइयों के साथ जोड़ा जाता है, ताकि उन्हें कार्य करने का पहला अनुभव मिल सके। इस दौरान वह उन कार्यों को अंजाम देते हैं जिनका प्रशिक्षण उन्हें अब तक मिला होता है। इस दौरान यह परखा जाता है कि जो प्रशिक्षण उन्हें दिया गया है उस पर वह किस स्तर तक खरे उतरे हैं। 

घातक हथियारों से रहते हैं लैस

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गरुण कमांडो दुनिया के सबसे घातक हथियारों से लैस होते हैं। इनमें टेवर टार-21 असॉल्ट रायफल, ग्लॉक 17 और 19 पिस्टल होती हैं। करीबी युद्धों के लिए हेकलर और कोच एमपी5 सब मशीन गन होती हैं। इसके अलावा गरुड़ कमांडो के पास घातक एकेएम असॉल्ट रायफल, एके-47 और एम4 कार्बाइन होती है। ये हथियार दुनिया के सबसे घातक हथियारों में शुमार किए जाते हैं।
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पठानकोट में शहीद हुए गरुड़ कमांडो गुरसेवक सिंह

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पठानकोट वायु सेना स्टेशन पर चल रहे ऑपरेशन में गरुड़ कमांडो गुरसेवक सिंह दुश्मन से देश की रक्षा करने में अद्भुत वीरता का प्रदर्शन करते हुए शहीद हो गए। गुरसेवक सिंह का साहस और जज्बा ही यह प्रदर्शित कर देता है कि गरुड़ कमांडो फोर्स असल में क्या है। गरुड़ कमांडो के आदर्श वाक्य 'प्रहार से सुरक्षा' (डिफेंस बाइ आफेंस) से ही उनकी वीरता और सामर्थ्य स्पष्ट हो जाती है। 
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