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ये हैं प्रणब मुखर्जी के संघ मुख्यालय की वो ऐतिहासिक तस्वीरें जो अब सामने आई हैं

Fri, 08 Jun 2018 05:46 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नागपुर
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- फोटो : PTI
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) मुख्यालय में आयोजित दीक्षांत समारोह में शिरकत करने के फैसले और उनका  भाषण सबकी जुबान पर चढ़ा हुआ है। 7 जून गुरुवार को उन्होंने जो भाषण दिया उसके मायने सब अपने मुताबिक निकाल रहे हैं। 
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हेडगेवार के जन्म स्थल पर प्रणब मुखर्जी, मोहन भागवत - फोटो : PTI
पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गुरुवार को आरएसएस संस्थापक डॉ. हेडगेवार के जन्मस्थल पर पहुंच उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। 
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- फोटो : PTI
प्रणब के नागपुर में संघ मुख्यालय जाने के फैसले को लेकर कांग्रेस असहज थी। कई वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं ने मुखर्जी से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की सलाह दी थी। 

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- फोटो : PTI
मुखर्जी की बेटी और कांग्रेस नेता शर्मिष्ठा मुखर्जी भी अपने पिता के फैसले से सहमत नहीं थी। उन्होंने कहा था कि प्रणब मुखर्जी का भाषण किसी को याद नहीं रहेगा लेकिन उनकी तस्वीर का इस्तेमाल जरूर किया जाएगा। 
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- फोटो : PTI
वहीं कई वरिष्ठ कांग्रेसियों ने मुखर्जी को एक धर्मनिरपेक्ष व्यक्ति बताया और संघ के समारोह में जाने के उनके फैसले का स्वागत किया था। 
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- फोटो : PTI
प्रणब मुखर्जी ने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार को भारत माता का सच्चा सपूत कहा। यह बात उन्होंने विजिटर डायरी में लिखी है।
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- फोटो : PTI
प्रणब मुखर्जी ने नागपुर में आरएसएस मुख्यालय में एमएस गोलवलकर को भी श्रद्धा सुमन अर्पित किए। 'गुरू जी' के नाम से मशहूर माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक थे। 

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- फोटो : PTI
एक मंझे हुए राजनेता रहे प्रणब मुखर्जी किसी के दबाव में नहीं आए और आरएसएस के समारोह में शिरकत की। वहां दिए अपने ऐतिहासक भाषण में संघ को उसी के मंच पर कई नसीहतें भी दी। प्रणब मुखर्जी ने कहा कि भेदभाव और नफरत से भारत की पहचान को खतरा है। नेहरू ने कहा था कि सबका साथ जरूरी है। विचारों में समानता के लिए संवाद बेहद जरूरी है। बातचीत से हर समस्या का समाधान मुमकिन है। शांति की ओर आगे बढ़ने से समृद्धि मिलेगी।

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- फोटो : PTI
मुखर्जी ने कहा कि 'मैं आज यहां राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद पर अपने विचार रखने आया हूं। भारत एक स्वतंत्र समाज है, देशभक्ति में सभी का समर्थन होता है। उन्होंने कहा 'राष्ट्रवाद किसी भी देश की पहचान होती है। भारतीय राष्ट्रवाद में एक राष्ट्रीय भावना रही है। सहिष्णुता और विविधता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। 

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- फोटो : PTI
मुखर्जी ने कहा कि राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता एक दूसरे में गुथे हुए हैं। इन्हें अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता है। हमारा समाज शुरू से ही खुला था और सिल्क रूट से पूरी दुनिया से जुड़ा था। यही नहीं, यूरोप से बहुत पहले ही हम राष्ट्र के रूप में स्थापित हो चुके थे और हमारा राष्ट्रवाद उनकी तरह संकुचित नहीं था। यूरोपीय राष्ट्रवाद साझा दुश्मन की अवधारणा पर आधारित है, लेकिन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की विचारधारा वाले भारत ने पूरी दुनिया को अपना परिवार माना। प्राचीन काल में भारत आने वाले सभी यात्रियों ने इसकी प्रशासनिक दक्षता, ढांचागत सुविधा और व्यवस्थित शहरों की तारीफ की है।

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संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुखर्जी के भाषण की तारीफ करते हुए कहा है कि उन्होंने देश के गौरवमयी इतिहास से जुड़ी यादें ताजा कर दीं। उन्होंने अपने भाषण में भारत की नींव के रूप में विविधता में एकता, बहुलवाद और सामाजिक एकता को रेखांकित किया है। भागवत ने कहा कि मुखर्जी ने 5 हजार साल पुरानी सभ्यता की याद दिलाई। उन्होंने कहा कि हमारे जीने का तरीका भले ही बदल गया हो लेकिन हमारे मूल्य अभी भी पुराने ही हैं। 

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भारतीय स्वयं सेवक संघ को लेकर तरह-तरह की धारणाओं को खारिज करते हुए मोहन भागवत ने साफ कर दिया और कहा, "हम जैसा करते हैं, वैसा ही दिखते हैं। चुनौती दी, आइए, आप भी परख सकते हैं। यहां आने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। आइए, समझिए और अपना भाव बनाइए। हम जैसे थे वैसे ही रहेंगे। उन्होंने कहा, विचार कुछ भी हो, जाति कुछ भी हो, समाज हितैषी आचरण को बढ़ावा देने वाले लोगों का संगठन है संघ। उन्होंने कहा, तत्व ज्ञान की हमारे पास कभी कमी नहीं रही, हां व्यवहार के मामले में हम निकृष्ट थे, लेकिन अब कुछ सुधार हुआ है। इसके बावजूद अभी भी बहुत कुछ हासिल किया जाना बाकी है।

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प्रणब मुखर्जी को बुलाए जाने पर भागवत ने साफ किया कि संघ की परंपरा रही है कि हम देश के सज्जनों को आमंत्रित करते हैं। इस बार कुछ विशेष चर्चा चली। इसका कोई अर्थ नहीं है। यह वैसे ही हुआ है जैसे हर साल होता है। संघ और प्रणब मुखर्जी वही रहेंगे जो पहले थे। संघ संपूर्ण समाज को संगठित करना चाहता है। इसलिए हमारे लिए कोई पराया नहीं है। भारत की धरती पर जन्मा प्रत्येक व्यक्ति भारत का पुत्र है। देशभक्ति करना उसका काम है। केवल पोषण और आजीविका के लिए प्रकृति ने हमें साधन नहीं दिए हैं। 

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- फोटो : PTI
प्रणब मुखर्जी ने कहा कि काफी समय पहले कौटिल्य ने कहा था कि प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्।। यानी  प्रजा की खुशी में ही राजा की प्रसन्नता निहित रहती है।  प्रजा के हित में ही राजा का हित होता है। उन्होंने कहा कि सहनशीलता ही हमारे समाज का आधार है। हमारी सबकी एक ही पहचान 'भारतीयता' है। हम विविधता में एकता को देखते हैं। उन्होंने कहा कि हर विषय पर चर्चा होनी चाहिए। हम किसी विचार से सहमत हो भी सकते हैं और नहीं भी।

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मुखर्जी ने कहा कि इस देश में इतनी विविधता है कि कई बार हैरानी होती है। यहां 122 भाषाएं हैं, 1600 से ज्यादा बोलियां हैं, सात मुख्य धर्म हैं और तीन जातीय समूह हैं लेकिन यही विविधता ही हमारी असली ताकत है। यह हमें पूरी दुनिया में विशिष्ट बनाता है। हमारी राष्ट्रीयता किसी धर्म या जाति से बंधी हुई नहीं है। हम सहनशीलता, सम्मान और अनेकता के कारण खुद को ताकतवर महसूस करते हैं। हम अपने इस बहुलवाद का उत्सव मनाते हैं।

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मुखर्जी ने कहा कि विजयी होने के बावजूद सम्राट अशोक शांति का पुजारी था। 1800 साल तक भारत दुनिया के ज्ञान का केंद्र रहा है। भारत के द्वार सभी के लिए खुले हैं। उन्होंने कहा कि सबने इस बात को माना है कि हिंदू एक उदार धर्म है। ह्वेनसांग और फाह्यान ने भी हिंदू धर्म की बात की है। राष्ट्रवाद किसी भी देश की पहचान है। देशभक्ति का मतलब देश की प्रगति में आस्था है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रवाद सार्वभौमिक दर्शन 'वसुधैव कुटुम्बकम्, सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः' से निकला है।
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मुखर्जी ने स्पष्ट तौर पर कहा कि घृणा से राष्ट्रवाद कमजोर होता है और असहिष्णुता से राष्ट्र की पहचान क्षीण पड़ जाएगी। उन्होंने कहा, 'सार्वजनिक संवाद में भिन्न मतों को स्वीकार किया जाना चाहिए।'
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