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इमरजेंसी के वो 7 काले किस्से, जिन्होंने हिला दिया था पूरा देश

Fri, 30 Jun 2017 09:06 AM IST
amarujala.com- Written by : हरेन्द्र सिंह मोरल
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देश के लोकतंत्र की आत्मा पर जिस एक घटना ने सबसे ज्यादा जख्म दिए वो ‌थी इमरजेंसी। 25 जून 1975 की दरम्यानी रात अचानक देश में आपातकाल लागू हो गया। अचानक रातों रात लोगों के सारे नैतिक अधिकार छीन लिए गए, तमाम संस्‍थाएं और मीडिया बंधक बनकर रह गए। यहां तक की न्यायपालिका भी एक हद तक सरकार के चंगुल में आ गई। घरों से लोगों को उठा उठाकर जबरन उनकी नसबंदी कर दी गई, क्या नेता क्या अभिनेता जिसने भी मुंह खोलने की जुर्रत की उसे पकड़कर जेलों में ठूंस दिया गया। जो झुके वो बख्‍श दिए गए और जिन्होंने सामने खड़े होने की हिमाकत की उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। बीती 25 जून को देश ने इसी आपातकाल की 42वीं वर्षगांठ मनाई। आपातकाल के ऐसे ही सात अनसुने किस्सों से हम आपको रूबरू करा रहे हैं। जानिए उन घटनाओं के बारे में। 
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आधी रात को राष्ट्रपति से कराए थे हस्ताक्षर 

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आधी रात को राष्ट्रपति से कराए थे हस्ताक्षर 
70 साल के बूढ़े जेपी उर्फ जय प्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति के नारे ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। आपातकाल वाले दिन ही दोपहर में जेपी ने दिल्‍ली के रामलीला मैदान में विशाल रैली की थी, जिसमें लाखों की संख्या में लोग जुटे थे। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार से जूझते लोगों के दिलों दिमाग में आक्रोश का ज्वार हिलोरे मार रहा था। इसी पर काबू पाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25 जून 1975 की आधी रात को संविधान के आर्टिकल 352 का प्रयोग करते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी। खास बात ये थी कि इसके लिए आधी रात को राष्ट्रपति फखरुद्दीन के हस्ताक्षर करवाए गए थे। कमाल की बात ये थी कि आपातकाल लागू होने से पहले तक इंदिरा ने अपने मंत्रीमंडल को भी इसकी जानकारी नहीं दी थी।
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रातों रात काटी अखबारों की बिजली
इमरजेंसी के दौरान अखबरों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। यहां तक की जिस रात इमरजेंसी की घोषणा हुई उस दिन कई अखबारों की बिजली काट दी गई, ताकि आपातकाल की खबर लोगों तक न पहुंच सके। सरकार की मंशा धीरे धीरे लोगों को इस बारे में बताने की थी। इसके विरोध में इंडियन एक्सप्रेस अखबार ने अपना पहला पन्ना खाली छोड़कर इसे लोकतंत्र के नाम पर कलंक बताया। 

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रेडियो पर दी गई आपातकाल की जानकारी
चुपचाप आपातकाल लगाने के बाद इंदिरा गांधी ने खुद ही इसकी जानकारी जनता को दी। 26 जून की सुबह आठ बजे इंदिरा गांधी ने आल इंडिया रेडियो पर आपातकाल की घोषणा की। मजबूरी में कुछ अखबारो को दो दिन बाद अपने संस्करण छापने पड़े। यहां तक की आपातकाल पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आलोचनाओं से बचने के लिए लंदन टाइम्स, डेली टेलिग्राफ, वॉशिंग्टन पोस्ट, द लॉस एंजीलिस टाइम्स के ब्यूरो चीफ को देश छोड़ने के लिए कह दिया गया।
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लोगों को घरों से उठाकर की गई नसबंदी
आपातकाल की सबसे काली घटना थी नसबंदी, जिसमें 50 लाख से ज्यादा लोगों को शिकार बनाया गया। ‌इंदिरा गांधी के छोटे बेटे संजय गांधी तेजी से राजनीति में सक्रिय हो रहे थे। इसके लिए उन्हें किसी गर्म मुद्दे की तलाश थी, जो उन्हें आपातकाल में मिला। संजय के वरदहस्त वाले कांग्रेस के युवा संगठन यूथ कांग्रेस और एनएसयूआई के सदस्यों ने लोगों को घरों से उठा उठाकर उनकी जबरन नसबंदी कराई। इसके चलते दो हजार से ज्यादा लोगों को अपनी जान भी गंवानी पड़ी।
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किशोर कुमार पर लगा‌ दिया गया था प्रतिबंध
इमरजेंसी के दौरान किसी भी आम और खास नागरिक पर कोई अधिकार नहीं बचा। सरकार ने अपने हिसाब से लोगों के अधिकारों का निर्धारण किया। इसकी बानगी उस समय दिखी जब गायक किशोर कुमार ने यूथ कांग्रेस के एक कार्यक्रम में जाने से मना किया तो उन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। आकाशवाणी और दूरदर्शन पर उनके कार्यक्रम बैन कर दिए गए। 
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जनता को शॉक ट्रीटमेंट देना चाहती थीं इंदिरा
यूं तो इमरजेंसी के पीछे दो लोगों का दिमाग बताया जाता है, एक थे पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ रे और दूसरे इंदिरा के बेटे संजय गांधी। जो आपातकाल को और लंबे समय तक खींचना चाहते थे। लेकिन ये भी सच है कि इंदिरा खुद आपातकाल जैसे किसी हथियार के जरिए जनता के दिल में दहशत भी पैदा करना चाहती थीं। इसका एहसास उन्होंने इमरजेंसी के एक साल बाद दिए गए इंटरव्यू में भी कराया, उन्होंने कहा कि उन्हें लगता था कि जनता को एक शॉक ट्रीटमेंट की जरूरत है।
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खौफ बन गया था मीसा और डीआईआर कानून
इमरजेंसी में इंदिरा सरकार ने जिस कानून का जमकर दुरुपयोग किया वो थे मीसा और डीआईआर। Misa यानि मेंटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट और Dir यानि डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट। जिसके तहत न व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने पर जमानत पाने का अधिकार था न कहीं अपील करने का। इन दोनों कानूनों का सबसे ज्यादा खामियाजा विरोधी नेताओं को उठाना पड़ा, जिनमें लाल कृष्‍ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जेपी, राजनारायण, जार्ज फर्नांडीस, लालू यादव, नीतीश कुमार, सुशील मोदी प्रमुख थे।  
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