सब जानते हैं कि डिंपल यादव यूपी के सीएम अखिलेश यादव की पत्नी, सांसद और उनका प्यार हैं। दोनों में बढ़िया कैमिस्ट्री भी है। लेकिन अखिलेश की सफलता के पीछे डिंपल का हाथ है, तो यह कहना ठीक नहीं होगा। आखिर कौन हैं वो, जिसने अखिलेश को सियासी जमीन पर कामयाबी का सूत्र दिया? अखिलेश और उनकी कामयाबी से जुड़ी पूरी स्पेशल स्टोरी पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
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डिंपल नहीं, तो आखिर अखिलेश की सफलता के पीछे किसका हाथ, जानें
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साल 2012, समाजवादी पार्टी ने यूपी विधानसभा चुनाव में 403 में से 224 सीटें जीतीं। पार्टी को बहुमत मिला। जनता में यही बात चल रही थी कि पार्टी सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव एक बार फिर मुख्यमंत्री की गद्दी संभालेंगे। लेकिन मुलायम सिंह की नजर केंद्र की राजनीति पर थी। उनके सामने 2014 का लोकसभा चुनाव था। उन्होंने दिल्ली का रास्ता चुना और केंद्र में पकड़ मजबूत करने के लिए खुद को झोंक दिया।
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मुलायम और पार्टी के तमाम वरिष्ठ और दिग्गज नेताओं ने अखिलेश को सीएम बना दिया। तब अखिलेश सबसे युवा सीएम कहे गए थे। और लोगों ने भी इस युवा सीएम का दिल खोलकर स्वागत किया था।
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लेकिन सरकार बनते ही, एक के बाद एक अपराध की घटनाओं, दंगों, पार्टी नेताओं की बयानबाजी से अखिलेश की छवि एक नौसिखिया सीएम की बनी। कहा जाने लगा कि यूपी में साढ़ें पांच सीएम सरकार चला रहे हैं, जिनमें अखिलेश साढ़े पांचवां हिस्सा हैं। यह बात कुछ कार्यक्रमों में अखिलेश खुद स्वीकार चुके हैं।
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लचर कानून व्यवस्था, यौन अपराध और तमाम आपराधिक घटनाओं को लेकर आलोचकों के निशाने पर रही अखिलेश की समाजवादी सरकार ने साढ़े चार साल पूरे कर लिए, और पार्टी अपनों के ही विवाद में घिर गई। इसी बीच आमिर खान की फिल्म दंगल रिलीज हुई तो जुमला सपा के हालातों पर भी बना, जिसे कहा गया - 'समाजवादी दंगल'। इस दंगल में कुश्ती बाप-बेटे और चाचा के बीच चली। नौबत यह आई के पार्टी दो धड़ों बंट गई।
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लेकिन अमर उजाला के ऑनलाइन पोल में यह बात सामने आई के सपा के अंदरूनी विवाद के चलते अखिलेश की छवि जनता के बीच चमकी है। अखिलेश को जनता की ज्यादा सहानुभूति मिली। और तो और उनकी पार्टी के 90 फीसदी विधायकों ने अखिलेश का समर्थन किया।
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सरकार के इन दिनों में कुछ बातें अच्छी भी हुईं। अखिलेश ने लैपटॉप बांटे। एंबुलेंस चलाई। गरीबों के लिए पेंशन योजना आई। सड़कें बनीं। लखनऊ में मेट्रो आई वगैरह-वगैरह...।
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इसका नतीजा यह हुआ कि अखिलेश के पास दिखाने के लिए भी काफी कुछ हुआ और उन्होंने अपने काम को 'काम बोलता है' टैंग लाइन देकर खूब प्रचार किया।
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अब जब विधानसभा चुनाव सिर पर हैं तो अखिलेश सरकार के अब तक के कामों का पोस्टमार्टम होना स्वभाविक है। नतीजा उनके पक्ष में ही है। सियासी पंडित भी मानते हैं कि साढ़े पांचवें सीएम मौजूदा वक्त में सब पर हावी हो गए हैं। वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हो गए हैं, उनका फैसला ही पार्टी का अंतिम फैसला हो गया है। मसलन, उत्तर प्रदेश की जनता के सामने एक साफ छवि के नेता के तौर पर एक और विकल्प मिल गया है।
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लेकिन यह सब कर पाना अखिलेश के लिए आसान नहीं होता अगर उस शख्स का साथ उन्हें न मिलता।
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अखिलेश को 100 प्रोफेशनल्स की टीम के मुखिया हॉर्वर्ड विश्वविद्यालय में पब्लिक पॉलिसी के प्रोफेसर स्टीव जॉर्डिंग का साथ मिला, या यूं कहें कि गाइडेंस मिला।
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जॉर्डिंग पॉलिटिकल कंसल्टेंट हैं और दुनियाभर के नेताओं को सलाह देते हैं। जॉर्डिंग ने पिछले साल अगस्त में अखिलेश से जुड़े और उनके साथ काम करना शुरू किया।
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जॉर्डिंग की सलाह पर अखिलेश ने सबसे पहले ग्रामीण इलाकों पर फोकस किया और एक लाख पोलिंग बूथों पर इतने ही कार्यकर्ताओं को नियुक्त कर दिया।
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इन एक लाख कार्यकर्ताओं को अखिलेश का ब्रैंड एंबेसडर कहा गया। ये सभी ब्रैंड एंबेसडर सरकार की योजनाओं के प्रचार-प्रसार के मिशन पर लग गए। नतीजा यह हुआ कि जब पिछले दिनों अखिलेश यादव को मुलायम सिंह ने प्रदेश अध्यक्ष के पद से हटाया और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया तो अखिलेश ने अपने इन्हीं एक लाख ब्रैंड एंबेसडर को समाजवादी योजना प्रमुख बना दिया।
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अखिलेश के ये ब्रैंड एंबेसडर उनके लिए का एक बहुत बड़ा संगठन साबित हुए।
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अखिलेश के इस संगठन को समाजवादी पेंशन योजना, कामधेनू डेयरी स्कीम, 2017 में स्मार्टफोन देने की योजना, राशन कार्ड और सिंचाई योजना, कानून व्यवस्था के बारे में फीडबैक देने की जिम्मेदारी दी गई।
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आज अखिलेश के ये ब्रैंड एंबेसडर न सिर्फ सरकारी योजनाओं का फीडबैक उन तक पहुंचाते हैं, बल्कि स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर लोगों की समस्याओं का समाधान भी कराते हैं।
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अखिलेश के करीबी सूत्रों के मुताबिक स्टीव जॉर्डिंग जब भी जब भारत आते हैं तो अखिलेश से मिलते हैं और उन्हें तमाम सलाहें देते हैं, उन्हें दुनिया में कामयाब योजनाओं के बारे में बताते हैं। जो योजना अखिलेश को पसंद आती है, वह उसे अमली जामा पहनाते हैं।
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अखिलेश के साथ अच्छी बात यह भी है कि वह फीडबैक के आधार पर योजनाओं को चलाने का फैसला करते हैं। जैसे कि लैपटॉप की तरह स्मार्टफोन फोन देने की योजना पर काम हुआ।
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अखिलेश अपनी साफगोई वाली छवि का परिचय कई दफा अपने फैसलों के जरिए दे चुके हैं। वह बाहुबलियों और दागियों को पार्टी से दूर रखने पर यकीन करते हैं। मुख्तार अंसारी और डीपी यादव के खिलाफ उनके फैसले और गायत्री प्रसाद को मंत्री पद से हटाने का फैसला इस बात की बानगी हैं।
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अखिलेश अपनी योजनाओं के बारे में अपनी टीम से पूरा फीडबैक लेते हैं और जनता की राय को योजनाओं शामिल करते हैं। यही वजह है कि पहले उन्होंने बुनियादी कामों पर काम किया। जैसे बिजली, सड़क, पानी और लोगों की मदद के लिए एंबुलेंस सेवा जैसी योजनाओं को प्राथमिकता दी ताकि लोगों को विकास के काम दिखाई दें। वह आधुनिकता से इत्तेफाक रखते हैं और उनकी योजनाओं में आधुनिक तकनीकि का पूरा समावेश होता है। युवाओं से जुड़े रहने के लिए वह सोशल प्लेटफार्मों का भी बखूबी इस्तेमाल करते हैं। वर्तमान में अखिलेश किसी भी बड़े नेता से कम नजर नहीं आते हैं।