फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Spcl: जानें एक कार्टूनिस्ट कैसे बना मराठा राजनीति का नायक 'बाल ठाकरे'

Thu, 17 Nov 2016 08:10 AM IST
टीम डिजिटल / अमर उजाला, नई दिल्ली
विज्ञापन
1 of 12
बाल ठाकरे कभी अपने विवादित बयानों कभी अपनी स्टाइल और कभी अपने लुक को लेकर हमेशा चर्चा में रहे। महाराष्ट्र की राजनीति में शिवसेना प्रमुख का दबदबा कभी कम नहीं हुआ। उनके जीवन की खास बात ये रही कि उन्होंने न कभी चुनाव लड़ा और न ही विधिवत प्रक्रिया के तहत ही वो शिवसेना के अध्यक्ष ही चुने गए। पेशे से कार्टूनिस्ट बाल ठाकरे ने मुंबई में अपना प्रभाव कभी खत्म नहीं होने दिया।

आज उनकी पुण्यतिथि के मौके पर आपको ये जरूर जानना चाहिए कि एक कार्टूनिस्ट कैसे मराठा राजनीति का केंद्र बन गया।
विज्ञापन

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

2 of 12
23 जनवरी 1926 को पुणे में जन्म लेने वाले बाल ठाकरे के तेवर हमेशा तीखे रहे लेकिन उनके दिल में देश के लिए प्यार कम नहीं था। अपनी मृत्यु से पहले 'सामना' के संपादकीय में उन्होंने लिखा था-"आजकल मेरी हालत चिन्ताजनक है किन्तु मेरे देश की हालत मुझसे अधिक चिन्ताजनक है, ऐसे में भला मैं चुप कैसे बैठ सकता हूं ?"
विज्ञापन

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

3 of 12
बाल ठाकरे ने अपने जीवन का सफर एक कार्टूनिस्ट के रूप में शुरू किया था। शुरुआत में वो अंग्रेजी अखबारों के लिये कार्टून बनाते थे। बाद में सन 1960 में उन्होंने 'मार्मिक' नाम से अपना एक अलग साप्ताहिक अखबार निकाला और अपने पिता के राजनीतिक दर्शन को महाराष्ट्र में प्रचारित करना शुरू कर दिया। 

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

4 of 12
हालांकि मराठी भाषा के प्रति उनके दिल में प्रेम ज्यादा था लेकिन उन्होंने हिन्दी भाषा में भी 'दोपहर का सामना' नामक अखबार निकाला। इस प्रकार महाराष्ट्र में हिन्दी व मराठी दो भाषाओं में बाल ठाकरे अखबार निकालने लगे।
विज्ञापन

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

5 of 12
बाल ठाकरे ने मुंबई के मशहूर समाचारपत्र 'फ्री प्रेस जर्नल' में कार्टूनिस्ट के रूप में पहला काम शूरु किया था। इसके बाद उन्होंने ये नौकरी छोड़ दी और 1960 में अपने भाई के साथ एक कार्टून साप्ताहिक 'मार्मिक' की शुरुआत की। 'मार्मिक' के माध्‍यम से बाल ठाकरे ने मुंबई में गुजरातियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीय लोगों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ मुहिम चलाई।
विज्ञापन

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

6 of 12
साल 1966 में उन्होंने महाराष्ट्र में शिवसेना नामक एक कट्टर हिन्दूराष्ट्र वादी संगठन की स्थापना की। हालांकि शुरुआती दौर में बाल ठाकरे को इससे अपेक्षित सफलता नहीं मिली लेकिन अंत तक उन्होंने शिव सेना को सत्ता की सीढ़ियों पर पहुंचा ही दिया। 
विज्ञापन

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

7 of 12
1995 में भाजपा-शिवसेना के गठबंधन ने महाराष्ट्र में अपनी सरकार बनाई। वहीं 2005 में उनके बेटे उद्धव ठाकरे को ज्यादा महत्व दिए जाने से नाराज उनके भतीजे राज ठाकरे ने शिवसेना छोड़ दी और 2006 में अपनी नई पार्टी 'महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना' बना ली। 

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

8 of 12
आपको बता दें कि बाल ठाकरे अपने उत्तेजित करने वाले बयानों के लिए जाने जाते थे और इसी कारण उनके खिलाफ कई मुकदमे दर्ज किए गए थे।

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

9 of 12
बाल ठाकरे के जीवन पर उनके पिता का गहरा प्रभाव था। यही वजह रही कि एक प्रगतिशील सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक के बेटे ने अपने पिता के मराठी भाषा के लोगों के लिए चलाए जा रहे आंदोलन को आगे बढ़ाया।

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

10 of 12
बाल ठाकरे ने एक कलाकार और जनोत्तेजक नेता के रूप में हिटलर की तारीफ करके विवादों के साथ नाता जोड़ा था। 1990 के दशक में श्रीलंका में आतंक का प्रयाय बने लिट्टे को खुला समर्थन देने को लेकर भी उनकी खूब आलोचना हुई थी।

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

11 of 12
अपने खरे लहजे की वजह से अपनी मृत्यु तक बाल ठाकरे अखबारों की सुर्खियां बने रहे। 17 नवंबर सन 2012 को मुंबई स्थित अपने आवास मातोश्री में उन्होंने आखिरी सांस ली।
विज्ञापन

कार्टूनिस्ट से राजनेता बने बाल ठाकरे, हिटलर की तारीफ कर घिरे विवादों में

12 of 12
'बालकडू' 2015 की वो मराठी फिल्म है जो शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे के जीवन और उनके आदर्शो से प्रेरित है। इस फिल्म की निर्माता स्वप्ना पाटकर है और अतुल काले ने इसका निर्देशन किया है। इस फिल्म में बालासाहेब की आवाज को उपयोग किया गया है। इस फिल्म के जरिए उनको श्रद्धांजलि दी गई है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें