लालू प्रसाद यादव और मीसा भारती
- फोटो : amar ujala
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव, पीए संगमा और मुफ्ती मुहम्मद सईद ने भी अपनी बेटियों को राजनितिक में आगे बढ़ाया।
कभी बिहार की राजनीति के स्तंभ रहे और राजद की राजनीति के धुरी कहे जाने वाले लालू प्रसाद यादव के बुरे दिन शुरू हुए और वह जेल गए तो पार्टी और परिवार की जिम्मेदारी बेटों पर आई। लेकिन आम चुनाव से पहले दोनों भाइयों को जब साथ खड़े होकर विरोधियों से लड़ने की बारी आई, तो वे आपस में ही लड़ते दिखे। दोनों के बीच मनमुटाव और घर में चल रहे शीतयुद्ध के बीच बेटी मीसा भारती घर की मुखिया की भूमिका में खड़ी हुईं।
मीडिया के सामने भी वह पार्टी पर हो रहे हमलों को लेकर जवाब देती रहीं। यह कोई पहला मौका नहीं था, जब मीसा ने घर, परिवार और पार्टी को संभाला हो। दरअसल, बेटी का कद बढ़ाने में शुरू से ही पिता लालू की भूमिका रही। परिवार हो या राजनीति, बेटी मीसा को लालू ने अपने दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप से आगे रखा।
गोपालगंज से रायसीनाः मेरी राजनीतिक यात्रा’
लालू यादव की आत्मकथा, ‘गोपालगंज से रायसीनाः मेरी राजनीतिक यात्रा’ में उन्होंने बचपन से लेकर मुख्यमंत्री बनने तक के अपने सफर के किस्से लिखे हैं। जब वह देश के रेल मंत्री थे, उस समय की सफलता और असफलता के बारें में भी लिखा है। किताब में लालू यादव ने अपने आप को महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग, नेल्सन मंडेला, राममनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण की राजनीति को आगे बढ़ाने वाला बताया है। इस किताब में उन्होंने मीसा भारती का जिक्र भी किया है। लालू यादव के मुताबिक मीसा सिर्फ उनकी बेटी नहीं है, बल्कि आंदोलन की बेटी हैं।
लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की बड़ी बेटी मीसा भारती है। उनकी अहमियत पार्टी में उस दिन ज्यादा मजबूत हो गई जब 2014 में पाटलिपुत्र से मीसा की उम्मीदवारी तय की गई और इससे नाराज होकर रामकृपाल यादव जैसे पुराने और पारिवारिक नेता पार्टी छोड़कर चले गए।
बेटी का नाम मीसा रखने के पीछे का किस्सा
जब मीसा का जन्म हुआ था तब लालू यादव मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटर्नल सिक्यूरिटी एक्ट) के तहत जेल में थे इसलिए उनका नाम मीसा रखा गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से मीसा भारती के सामने भाजपा की ओर से चुनावी उम्मीदवार रामकृपाल यादव को कड़ी टक्कर दी थी। रामकृपाल यादव ने मीसा को 40322 वोटों से हराया था। मीसा को इस चुनाव में 342940 वोट मिले थे। मीसा हारीं जरूर थी, मगर उनका कद पार्टी में बड़ा हो गया। आज भी जब परिवार या पार्टी पर विरोधी हमला करते हैं तो करारा जवाब देने में मीसा मुखर रहती हैं।