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'यदि भगवान छुआछूत को मानता है, तो मैं उसे भगवान नहीं कहूँगा' - बाल गंगाधर तिलक

Mon, 01 Aug 2016 04:00 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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Bal Gangadhar tilak
'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' जैसा कालजयी नारा देने वाला भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दैदीप्यमान नक्षत्र बाल गंगाधर तिलक ने एक अगस्त 1920 को अपनी आंखें मूंद ली थी। तिलक हिंदुस्तान के एक प्रमुख नेता, समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी और लोकप्रिय नेता थे। 'लोकमान्य' के नाम से ख्याति अर्जित करने वाले तिलक ने ही सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई।  

तिलक ने समाज में व्याप्त छुआछूत के खिलाफ भी पुरजोर आवाज उठाई। उन्होंने कहा, 'यदि भगवान छुआछूत को मानता है, तो मैं उसे भगवान नहीं कहूँगा।' मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों में भी तिलक का यह कथन मौजूं है क्योंकि आजादी के छह दशक बाद भी समाज में जातिगत भेदभाव कायम है। 

तिलक का जन्म महाराष्ट्र के कोंकण प्रदेश (अब रत्नागिरी) के चिक्कन गांव में 23 जुलाई 1856 को हुआ था। इनके पिता गंगाधर रामचंद्र तिलक एक धर्मनिष्ठ ब्राह्मण थे। 
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अंग्रेजी के घोर आलोचक थे तिलक

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Bal Gangadhar tilak
अपने परिश्रम के बल पर मेधावी छात्रों में बाल गंगाधर तिलक की गिनती होती थी। वे पढ़ने के साथ-साथ प्रतिदिन नियमित रूप से व्यायाम भी करते थे, अतः उनका शरीर स्वस्थ और पुष्ठ था। सन् 1879 में उन्होंने बी.ए. तथा कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की। घर वाले और उनके मित्र संबंधी यह आशा कर रहे थे कि तिलक वकालत कर धन कमाएंगे और वंश के गौरव को बढ़ाएगे, परंतु तिलक ने प्रारंभ से ही जनता की सेवा का व्रत का धारण कर लिया था। 

परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद तिलक ने कुछ समय तक स्कूल और कॉलेजों में गणित पढ़ाया। अंग्रेजी शिक्षा के ये घोर आलोचक थे और मानते थे कि यह भारतीय सभ्यता के प्रति अनादर सिखाती है। इन्होंने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की ताकि भारत में भारत में शिक्षा का स्तर सुधारा जा सके। 

तिलक ने मराठी भाषा में मराठा दर्पण और केसरी नाम से दो अखबार शुरू किए जो जनता में बहुत लोकप्रिय हुए। तिलक ने अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीय संस्कृति के प्रति हीन भावना की बहुत आलोचना की। तिलक ने मांग की कि ब्रिटिश सरकार तुरंत भारतीयों को पूर्ण स्वराज दे। केसरी में छपने वाले उनके लेखों की वजह से उन्हें कई बार जेल भेजा गया। 
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लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के प्रमुख कथन 

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- स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है, और मैं इसे लेकर रहूँगा!

- प्रगति स्वतंत्रता में निहित है। बिना स्वशासन के न औद्योगिक विकास संभव है, न ही राष्ट्र के लिए शैक्षिक योजनाओं की कोई उपयोगिता है। देश की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न करना सामाजिक सुधारों से अधिक महत्वपूर्ण है।

- यदि भगवान छुआछूत को मानता है, तो मैं उसे भगवान नहीं कहूँगा।

- हो सकता है ये भगवान की मर्जी हो कि मैं जिस वजह का प्रतिनिधित्व करता हूँ उसे मेरे आजाद रहने से ज्यादा मेरे पीड़ा में होने से अधिक लाभ मिले।

- ये सच है कि बारिश की कमी के कारण अकाल पड़ता है, लेकिन ये भी सच है कि भारत के लोगों में इस बुराई से लड़ने की शक्ति नहीं है।

- धर्म और व्यावहारिक जीवन अलग नहीं हैं। संन्यास लेना जीवन का परित्याग करना नहीं है। असली भावना सिर्फ अपने लिए काम करने की बजाए देश को अपना परिवार बना मिलजुल कर काम करना है। इसके बाद का कदम मानवता की सेवा करना है और अगला कदम ईश्वर की सेवा करना है।
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