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158 वर्ष की लंबी लड़ाई के बाद समलैंगिको को मान्यता देने वाला 27वां देश बना भारत

Fri, 07 Sep 2018 04:54 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। इसविषय पर कई वर्षों से दुनियाभर में बहस हो रही है। मेसोपोटामिया सहित कई प्राचीन सभ्याताओं ने इसे सदियों पहले ही मान्यता दे दी थी। लेकिन 17वीं और 18वीं सदी में लगभग सभी देशों में इसे पाप माना जाता था। लेकिन इतिहास गवाह है कि भारत में 1861 में ही इसे कानूनी तौर पर मान्यता मिल गई थी तब जब ब्रिटिश साम्राज्य के 42 पूर्व उपनिवेशों में धारा 377 मौजूद है।  

गुरुवार का दिन भारत में रह रहे समलैंगिकों के लिए ऐतिहासिक दिन रहा। जब  सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीस दीपक मिश्रा अपना फैसला सुनाना शुरू किया तब उन्होंने कई विचारकों, लेखकों और नाटककारों के विचार और कथनों से इसकी शुरुआत की। उसी समय उन्होंने शेक्सपीयर के सबसे प्रसिद्ध कथन 'नाम में क्या रखा है' से शुरुआत की और कहा कि गुलाब को किसी भी नाम से पुकारें उससे मिठाई की खुशबू नहीं आएगी। जिंदगी में सिर्फ पहचान महत्वपूर्ण है। वह पहचान ही है जिससे गौरवपूर्ण जीवन की आजादी मिलती है।

इन सबके बीच हम बात कर रहे हैं किन किन देशों में समलैंगिकता है कानूनी और कहां आज भी है गैर कानूनी
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इन देशों में समलैंगिक संबंधों पर मिलती है मौत की सजा

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सारे पश्चिमी देश खुले विचारों वालें नहीं है। दुनिया में कई ऐसे राष्ट्र हैं जहां समलैंगिकों को संबंध बनाने पर मौत की सजा सुनाई जाती है। लेकिन इतिहास के कई दस्तावेजों में 'गे' जोड़ों का वर्णन मिलता है। रोमन शासक हाद्रियान और उनके प्रेमी एंटियोंस के संबंधों को दिखाती हुई 11 हजार साल पुरानी कलाकृति मौजूद है, जो बताती है कि उस दौरान कैसे रिश्तों को मान्यता प्राप्त थी।
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यही नहीं पुनर्जागरण काल में कई ऐसे विचारक और नेता मौजूद थे जो खुद  को 'गे' कहते थे। यूनान के देवताओं, रिहोरेस और सेठ को 'गे' कहा जाता था।

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अपने अधिकारों के लिए दुनियाभर के समलैंगिकों ने लंबी लड़ाई लड़ी है। समलैंगिकों को सबसे पहले मान्यता 2000 में नीदरलैंड में मिली थी और इसके साथ ही समलैंगिक शादी को मान्यता देने वाला पहला देश बना। अभी तक 26 देश दे इसे मान्यता दे चुके हैं।  27 देशों में अब शादी वैध है। 120 देश में समलैंगिकता अपराध नहीं।
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समलैंगिकता 76 देशों में अभी भी अपराध की श्रेणी में है जबकि ईरान, सूडान, सऊदी, यमन, सोमालिया, इराक नाइजीरिया, सीरिया में मौत की सजा का प्रावधान है।
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भारत में 158 साल पहले धारा 377 लागू हुई थी; इसे हटाने के लिए 26 कोर्ट में चली लड़ाई
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देश में धारा 377, 1861 में लागू की गई थी, जिसमें अप्राकृतिक संबंध पर आजीवन कारावास और आर्थिक जुर्माने का प्रावधान रखा गया था।

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 एबीवीए (एड्स भेदभाव विरोधी आंदोलन) ने  1992 में  दिल्ली हाईकोर्ट में धारा 377 को चुनौती दी। पर इसे कोर्ट ने खारिज कर दिया गया।

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नाज फाउंडेशन समलैंगिकता को अधिकार दिलाने के लिए 2001 में हाईकोर्ट में याचिका लगाई, जो 2003 में खारिज हो गई। इसके बाद फाउंडेशन ने 2004 में रिव्यू पिटिशन लगाई। इसे भी हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया।

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2006 में गुजरात के राजसी परिवार के ताल्लुक रखने वाले मानवेंद्र गोहिल ने खुद को 'गे' बताया। वे एलजीबीटी समुदाय के हक की लड़ाई के लिए लक्ष्य ट्रस्ट चलाते हैं। उनके लिए अस्पताल भी बना रहे हैं।

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सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2006 में दोबारा हाईकोर्ट में सुनवाई की गई और 2009 में हाईकोर्ट ने इसे अपराध के दायरे से बाहर कर दिया।

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मामला यहीं ठंडा नहीं पड़ा, हाईकोर्ट के फैसले के बाद 2009 में एकबार फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे फिर अपराध की श्रेणी में रख दिया। सुप्रीम कोर्ट ने रिव्यू पिटिशन 2014 में खारिज किया फिर 2016 में पांच लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई और फिर इस लड़ाई में कई बड़े लोग शामिल होते चले गए।
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मामले में मोड़ तब आया जब 2017 में कोर्ट ने सेक्सुअलिटी को निजता का हक माना। 6 सितंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एतिहासिक फैसले में कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं।
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