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दादी-नानी के नुस्खे आज भी आएंगे काम, इन पांच महिलाओं से सीखें बिना केमिकल खूबसूरत दिखने के टिप्स

Mon, 02 Mar 2020 12:27 PM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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जिंदगी का कोई भी मोड़, मुद्दा या उलझन हो, हमें सबसे ज्यादा सीख अपने घर के बुजुर्गों से ही मिलती है। रिश्ते निभाने की टिप्स हो या फिर कोई फैमली रेसिपी– यह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलता रहता है। जब बात सुंदर बालों या त्वचा की हो, तो हमारे मन में सबसे पहला चेहरा हमारी दादी-नानी का ही आता है। कभी दादी के घुटने तक लटकते लंबे-घने बालों को देखकर आंखें खुली रह जाती हैं, तो कभी नानी का चमकता, कोमल चेहरा देखकर उनकी ही तरह मुलायम त्वचा पाने की लालसा होती है। तो आगे की स्लाइड में जानें ऐसी ही पांच दादी मांओं से चेहरे को बेदाग खूबसूरत बनाने के नुस्खें।
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पुणे की उषा प्रभाकरराव डोंगरे 77 साल की हैं। उनमें उम्र की झलक तो है, त्वचा पर झुरियां भी दिखाई देती हैं, लेकिन चेहरे की चमक आज भी बरकरार है। बढ़ती उम्र उनके चेहरे की रंगत को छू तक नहीं पाई है। इस उम्र में भी न उनके चेहरे के रंग पर कोई असर पड़ा है और न ही त्वचा की कांति कम हुई है। चेहरे पर किसी भी तरह के दाग का नामो-निशान नहीं है। उषा डोंगरे की त्वचा आज भी किसी फेयरनेस क्रीम के लिए परफेक्ट लगती है। उषा डोंगरे बताती हैं कि साबुन और क्रीम तो काफी बाद में आया और हालांकि अब वह इनका ही इस्तेमाल करती हैं, लेकिन इनके आने से पहले घरेलू और प्राकृतिक सामग्री पर निर्भरता ज्यादा थी। घर पर ही उबटन तैयार किया जाता था। रोजाना चेहरे पर दूध में हल्दी मिलाकर लगाया जाता था, जिससे चेहरे का रंग और नमी दोनों बरकरार रहती थी। गोरे रंग और बेदाग त्वचा के लिए कई महिलाएं मलाई और चंदन भी लगाती थीं। उन दिनों भी एलोवेरा काफी इस्तेमाल में लाया जाता था। एलोवेरा का जूस लगाने से चेहरा साफ और स्वच्छ रहता था। घर पर बनने वाले देसी उबटन की जगह कॉस्मेटिक ने लेनी शुरू कर दी। बाजार में स्नो, क्रीम और पाउडर आने लगे। महिलाएं इन रेडिमेड क्रीम की तरफ आर्किषत हुईं और उनका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया।
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वहीं केरल की पद्मिनी विजयन अपनी सोसाइटी में लंबे बालों वाली आंटी के नाम से मशहूर हैं। वह जब शाम को अपनी सोसाइटी की बिल्डिंग में घूमने निकलती हैं तो ऐसा कोई नहीं, जो उन्हें पलटकर दोबारा न देखे। उनके लंबे और घने बाल सबका ध्यान खींचते हैं। 62 साल की विजयन के ज्यादातर बाल आज भी काले हैं। हालांकि उनकी शिकायत है कि पिछले कुछ सालों में उनके बाल थोड़े सफेद और कम हुए हैं, लेकिन आज भी उनकी चोटी घुटनों के नीचे तक ही लटकती है। बाल इतने घने कि बस, हर कोई उनसे इसका राज जानना चाहता है।

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बंगलूरू की रहने वाली उमा वासुदेव की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। उम्र की बात करें तो वासुदेव हैं तो 69 साल की, लेकिन उनके चमकते चेहरे और काले बालों को देखकर उनकी उम्र पर विश्वास करना थोड़ा मुश्किल लगता है। साफ और कसा हुआ चेहरा। हाथ-पैर में कहीं कोई बाल या रोएं नजर नहीं आते, मानो अभी पार्लर से वैक्सिंग कराकर लौटी हों। हालांकि उनके शब्दों में, वह कभी ब्यूटी पार्लर के दरवाजे तक भी नहीं गईं। तो फिर क्या है इन दादी-नानी का ब्यूटी सीक्रेट? सवाल के जवाब में उमा वासुदेव थोड़ा मुस्कुराते हुए अपने राज खोलती हैं। वह बताती हैं कि उनके जमाने में न तो ब्यूटी पार्लर थे और न ही इतने सारे कॉस्मेटिक के विकल्प मौजूद थे। उनके परिवार में शुक्रवार का दिन तय था, जब घर की सारी महिलाएं खुद पर थोड़ा ध्यान देती थीं। घर पर चना और मूंग की दाल का पाउडर बनाया जाता था। फिर उसमें पिसी हुई हल्दी मिलाई जाती थी और बाद में ताजे दही में इनको घोलकर पेस्ट तैयार किया जाता था। नहाते वक्त महिलाएं इसे शरीर पर लगाकर करीब 20 मिनट रखती थीं और फिर नहाकर धूप में बैठती थीं। इस उबटन के नियमित इस्तेमाल से उनके हाथ और पैरों के बाल तो चले ही गए, साथ ही उनके चेहरे की चमक अब तक बरकरार है।
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- फोटो : pixa
आज से 50 साल पहले हालात निश्चित तौर पर कम जटिल थे, लेकिन उस समय भी महिलाओं को सुंदरता के संबंध में खूब जानकारी थी। दरअसल, आज के बहुत सारे आधुनिक कॉस्मेटिक प्रोडक्ट प्राचीन ज्ञान पर ही आधारित हैं। चूंकि प्राचीन काल में कोई कॉस्मेटिक प्रयोगशालाएं नहीं थीं, इसलिए महिलाएं प्रकृति पर निर्भर थीं। जड़ी-बूटी, दूध, यहां तक कि मोती, प्राचीन सौंदर्य नियम का हिस्सा थे। इन सबके जरिए उनके चेहरे पर जो निखार आता था, वह आज भी बरकरार है।
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पुराने समय की महिलाएं चेहरे की देखरेख के साथ-साथ आंखों की सुंदरता का भी काफी ध्यान रखती थीं। तब आंखों के लिए तरह-तरह के रंग वाले काजल और आई लाइनर उपलब्ध नहीं थे। काजल भी घर में ही बनाया जाता था। दीये में घी और कपड़े की बत्ती डालकर जलाया जाता था। फिर पीतल का एक छोटा बर्तन उसके थोड़ा ऊपर रखकर रात भर छोड़ा जाता था। इसी काजल को घी के साथ मिलाकर महिलाएं आंखों में लगाती थीं। इससे उनकी खूबसूरती तो बढ़ती ही थी, साथ में यह भी मान्यता थी कि इससे आंखों की रोशनी अच्छी होती है। चेहरे के अलावा बालों को सौंदर्य का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। आजकल बालों को सुंदर दिखाने के लिए विभिन्न तरह के शैंपू, कंडीश्नर और पैक्स इस्तेमाल किए जाते हैं, लेकिन पुराने जमाने में बालों के लिए ज्यादातर नारियल तेल या कहीं-कहीं सरसों और आंवले के तेल का भी इस्तेमाल किया जाता था। हफ्ते में कम से कम तीन बार। नारियल के तेल में कभी मेथी के दाने, तो कभी एलोवेरा मिलाकर सिर की मालिश की जाती थी और फिर बालों को रीठा-शिकाकाई या मुल्तानी मिट्टी से साफ किया जाता था। विजयन बताती हैं कि बालों के लिए गुड़हल का फूल काफी लाभदायक माना जाता था। उनकी मां गुड़हल के फूल को पीसकर पेस्ट तैयार करती थीं। उसे घर की सारी महिलाओं के सिर पर लगाया जाता था और फिर ठंडे पानी से धोया जाता था। इससे उनके बाल तेजी से बढ़ते भी थे और मजबूत भी रहते थे। कई महिलाएं बालों के लिए आंवले का इस्तेमाल भी करती थीं। माना जाता था कि आंवले से बालों का रंग काला रहता है।
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gajra
सजने-संवरने के लिए बालों को तरह-तरह से सजाया जाता था। ताजे फूल और रिबन का इस्तेमाल काफी लोकप्रिय था। रिबन से रोजाना चोटी बांधी जाती थी, जबकि त्योहार या किसी खास मौके पर बालों में फूल लगाना आम था। हालांकि यहां भी समय के साथ बदलाव आया और ताजे फूलों की जगह बाजार में बिकने वाले आर्टिफिशियल फूलों ने ले ली। जूड़े के लिए चांदी से लेकर मेटल और मोती तक के पिन और क्लिप महिलाओं के केशों में शोभा बढ़ाने लगे।

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- फोटो : social media
 दिल्ली की 64 वर्षीय निर्मला तिवारी कहती हैं कि बालों के साथ तब भी काफी प्रयोग किए जाते थे। बालों की स्टाइलिंग के लिए भी घर में ही तरह-तरह के प्रयोग किए जाते थे। कई लड़कियां स्वेटर बुनने वाले कांटों को गरम कर रात भर बालों में लपेटकर रखती थीं और सुबह उनके बाल घुंघराले दिखते थे।

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बिंदी शुरुआत से ही भारतीय महिलाओं के शृंगार का अहम हिस्सा रही है। अन्य सौंदर्य सामग्रियों की तरह पुराने जमाने में डिजाइनर बिंदी का चलन नहीं था। पहले महिलाएं कुमकुम का इस्तेमाल करती थीं। धीरे-धीरे कुमकुम की जगह स्टिकर बिंदी ने ले ली और फिर बाजार में कई तरह की डिजाइनर बिंदियां आ गईं।
हालांकि पुराने जमाने की महिलाओं के पास विकल्पों की कमी थी। कम ही क्रीम, पाउडर बाजार में आते थे। इसलिए वे एक ही प्रोडक्ट के प्रति वफादार रहती थीं। आजकल की औरतें आए दिन नए-नए प्रोडक्ट इस्तेमाल करती हैं। इसलिए जब तक उनकी स्किन एक प्रोडक्ट की आदी होती है, वे दूसरा शुरू कर देती हैं, जिसका नुकसान होता है, फायदा नहीं।
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- फोटो : pixa
उत्तराखंड की 61 वर्षीय कमला रावत बताती हैं कि पुराने समय में महिलाओं की खूबसूरती बरकरार रखने में खान-पान की एक महत्वपूर्ण भूमिका थी। खाना शुद्ध था और स्वास्थ्य से भरपूर था। मौसमी सब्जियां और फल खाए जाते थे, जो शरीर और स्वास्थ्य के लिए लाभदायक थे। सबसे बड़ी बात यह कि खाने का समय निर्धारित था। समय पर खाना और समय पर सोना तथा पूरी नींद लेना निश्चित तौर पर हमारे स्वास्थ्य और लुक के साथ जुड़ा हुआ है। आज भी जो लोग इस नियम का अनुसरण करते हैं, उनके चेहरे की चमक अलग नजर आती है।
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