फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Independence Day Iconic Sarees: स्वतंत्रता दिवस पर पहनें ये 8 आइकोनिक साड़ियां, आपके सामने सब नजर आएंगे फीके

Fri, 15 Aug 2025 12:09 AM IST
शिवानी अवस्थी लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला

सार

Independence Day 2025: इस लेख में ऐसी आठ साड़ियों की लिस्ट दे रहे हैं, जो स्वतंत्रता दिवस पर पहनकर आप अपने लुक में विरासत, गौरव और देशप्रेम की भावना ला सकती हैं।
विज्ञापन
1 of 5
साड़ी - फोटो : instagram
Independence Day 2025: स्वतंत्रता दिवस सिर्फ एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, विरासत और गर्व का प्रतीक है। इस दिन को और खास बनाने के लिए, देश की पारंपरिक और आइकोनिक साड़ियों को पहनना देशभक्ति के साथ-साथ भारतीयता को भी सलाम करना है। इन साड़ियों को पहनकर न केवल आपका लुक देशभक्ति से भर जाएगा, बल्कि यह भारत की विविधता और समृद्ध संस्कृति का सम्मान भी होगा।

इसमें खादी काॅटन से लेकर मैसूर सिल्क, बनारसी और कांजीवरम साड़ियां शामिल हैं। खादी कॉटन आजादी के आंदोलन की सादगी और आत्मनिर्भरता का संदेश देती है, वहीं चंदेरी सिल्क हल्केपन और रॉयल लुक के लिए मशहूर है। बनारसी ब्रोकेड अपनी जटिल जरी कढ़ाई से शान और भव्यता दिखाती है। संभलपुरी और Tant साड़ियां हाथ की बुनाई और आरामदायक कपड़े के लिए जानी जाती हैं।

मैसूर सिल्क और कांजीवरम सिल्क रेशमी चमक और लंबे समय तक टिकने वाली गुणवत्ता के लिए खास हैं। मुगा सिल्क असम की अनमोल धरोहर है, जिसकी सुनहरी आभा अद्वितीय है। वहीं, फुल्कारी एम्ब्रॉयडरी पंजाब की रंगीन और खुशी से भरी कढ़ाई का उदाहरण है।ये साड़ियां सिर्फ खूबसूरती नहीं बढ़ातीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और गर्व को भी दुनिया के सामने पेश करती हैं। इस लेख में ऐसी आठ साड़ियों की लिस्ट दे रहे हैं, जो स्वतंत्रता दिवस पर पहनकर आप अपने लुक में विरासत, गौरव और देशप्रेम की भावना ला सकती हैं।
विज्ञापन

2 of 5
चंदेरी सिल्क साड़ी - फोटो : instagram

खादी कॉटन साड़ी


खादी काॅटन की साड़ियां आजादी के आंदोलन की पहचान हैं। यह सादगी में भी स्वाभिमान का प्रतीक दर्शाती हैं। इस तरह की साड़ी स्वतंत्रता दिवस के मौके पर सिंपल और एलिगेंट लुक देंगी।

चंदेरी सिल्क साड़ी


चंदेरी सिल्क साड़ी का नाम मध्यप्रदेश के चंदेरी नगर से लिया गया है, जो प्राचीन काल से बुनाई कला के लिए प्रसिद्ध रहा है। माना जाता है कि चंदेरी बुनाई की शुरुआत 7वीं शताब्दी में हुई और 11वीं शताब्दी में यह शाही घरानों की पसंद बन गई। मुग़ल काल में चंदेरी साड़ियां अपनी नाजुक बनावट और सुनहरी जरी के कारण रानी-महारानियों की अलमारी का अहम हिस्सा थीं। 15 अगस्त पर ये हल्की, एलीगेंट और रॉयल लुक के लिए परफेक्ट है।
विज्ञापन

3 of 5
बनारसी साड़ी - फोटो : instagram

बनारसी ब्रोकेड साड़ी

पारंपरिक कारीगरी और शान का अनोखा संगम बनारसी ब्रोकेड साड़ियां हैं। बनारसी ब्रोकेड साड़ी उत्तर प्रदेश के वाराणसी (बनारस) शहर की शाही बुनाई कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका इतिहास हजारों साल पुराना है, लेकिन इसे असली पहचान मुग़ल काल में मिली, जब फ़ारसी कला और भारतीय डिज़ाइनों का अनोखा संगम हुआ। मुग़ल शासकों के संरक्षण में ब्रोकेड बुनाई में रेशम, सोने और चांदी के धागों का इस्तेमाल शुरू हुआ, जिससे बनारसी साड़ी शाही दरबार की पहचान बन गई। पहले यह सिर्फ रानी-महारानियों और अमीर घरानों के लिए बनाई जाती थी, लेकिन आज यह हर वर्ग में लोकप्रिय है।


संभलपुरी साड़ी

संभलपुरी साड़ी, ओडिशा राज्य की एक प्रसिद्ध हैंडलूम साड़ी है, जो अपनी इकत बुनाई तकनीक के लिए जानी जाती है। इसका इतिहास लगभग 500 साल पुराना माना जाता है। यह कला ओडिशा के संबलपुर, बरगढ़, बोलांगीर और सोनेपुर जिलों में विकसित हुई।

4 of 5
saree - फोटो : instagram

तांत साड़ी

तांत की साड़ी पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश की पारंपरिक कॉटन हैंडलूम साड़ी है, जिसका इतिहास लगभग 200 साल पुराना माना जाता है। इसका जन्म बंगाल के ग्रामीण इलाकों में हुआ, जहाँ बुनकर समुदाय और एक विशेष जाति के लोगों ने इसे रोज़मर्रा के आरामदायक पहनावे के रूप में विकसित किया।

मैसूर सिल्क साड़ी

मैसूर सिल्क साड़ी, कर्नाटक के मैसूर शहर की पहचान और भारत की सबसे शाही रेशमी साड़ियों में से एक है। इसका इतिहास 20वीं शताब्दी की शुरुआत से जुड़ा है, जब मैसूर के महाराजा कृष्णराज वाडियार चतुर्थ ने जापान से सिल्क के बीज मंगवाकर राज्य में रेशम उत्पादन की शुरुआत करवाई। 1905 में मैसूर सिल्क फैक्ट्री की स्थापना हुई, जिसका उद्देश्य शाही परिवार और विशेष मौकों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली रेशमी साड़ियां बनाना था।

विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
Kanjivaram Saree - फोटो : instagram

कांजीवरम सिल्क साड़ी

कांजीवरम सिल्क साड़ी, तमिलनाडु के कांचीपुरम शहर की पहचान है और इसे "साड़ियों की रानी" कहा जाता है। इसका इतिहास लगभग 400 साल पुराना है, जब आंध्र प्रदेश के बुनकर कांचीपुरम आकर बस गए। कांजीवरम बुनाई की प्रेरणा कांचीपुरम मंदिरों की वास्तुकला, मूर्तियां और पौराणिक कथाओं से मिली। इन साड़ियों की खासियत है शुद्ध मुलबेरी सिल्क और असली सोने-चांदी की परत चढ़ी ज़री का इस्तेमाल। एक कांजीवरम साड़ी का बॉर्डर, पल्लू और बॉडी अलग-अलग बुने जाते हैं और फिर बेहद मजबूत जॉइनिंग तकनीक से जोड़े जाते हैं, जिसे कोरा पक्कावम कहते हैं।


पोचमपल्ली इकत साड़ी

पोचमपल्ली इकत साड़ी तेलंगाना के यादाद्री भुवनगिरी जिले के पोचमपल्ली गांव से आती है, और इसे "भारत की सिल्क सिटी" भी कहा जाता है। इसका इतिहास करीब 200 साल पुराना है। इस साड़ी की खासियत है इकत बुनाई तकनीक है,जिसमें कपड़े पर अनोखे ज्यामितीय और पारंपरिक पैटर्न बनते हैं।

माना जाता है कि यह तकनीक इंडोनेशिया, जापान और मध्य एशिया से भारत आई, लेकिन पोचमपल्ली के बुनकरों ने इसे अपनी अनूठी पहचान दी। शुरू में ये साड़ियां सिर्फ कॉटन में बनती थीं, लेकिन बाद में इसमें रेशम और कॉटन का मिश्रण (सिल्क-कॉटन) भी शामिल हुआ।
 

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें