संग्राम सिंह
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मुझे र्यूमैटिक अर्थराइटिस की बीमारी थी, जो लगभग लाइलाज मानी जाती है
संग्राम सिंह बताते हैं कि उन्हें बचपन में एक गंभीर बीमारी थी। वह कहते हैं, ‘तीन-साढे़ तीन साल की उम्र में मेरे पैरों में ऐसा दर्द शुरू हुआ कि मैं अपने हाथ से मुंह तक नहीं धो पाता था। कच्चा घर था, कमजोर सेहत थी, पेट में कीड़े थे। मां दवाइयां देती थीं, पर असर नहीं होता था। डॉक्टरों ने कहा था कि मैं ज्यादा दिन नहीं जी पाऊंगा और जी भी गया तो चल-फिर नहीं सकूंगा। बीमारी थी र्यूमैटिक अर्थराइटिस, जो लगभग लाइलाज मानी जाती है। लेकिन मेरी मां ने हार नहीं मानी। डॉक्टरों ने मना किया कि इस बच्चे की मालिश मत करो, हड्डियां टूट सकती हैं। लेकिन मां दिन में पंद्रह बार मालिश करती थीं। बिना थके, बिना डिगे। उनका स्पर्श, उनका विश्वास ही मेरी असली दवा बना। मैंने खुद से लड़ाई लड़ी, अपने शरीर से, अपनी किस्मत से और धीरे-धीरे खुद को खड़ा किया।
मां कहती थीं, तू देश का नाम रोशन करेगा
आगे चलकर संग्राम ने कुश्ती में करियर बनाने का सोचा। वह कहते हैं, ‘जब पहली बार अखाड़े में गया, लोग हंसे। बोले, पहले सीधा चलना तो सीख। रिश्तेदारों ने ताने मारे कि ये लड़का किसी काम का नहीं है। लेकिन मां ने कभी भरोसा नहीं खोया। मैंने अकेले ही रेसलिंग की नकल की, गिरा, उठा, बार-बार खुद को साबित किया। मां कहती थीं, तू देश का नाम रोशन करेगा। मैंने अपनी पहली कुश्ती हारी, मां ने तवे से मेरे कंधे की सिकाई की। वही हमारी फिजियोथेरेपी थी। उन्होंने हर रात मुझे दारा सिंह कहा और उस विश्वास ने मुझे कभी टूटने नहीं दिया।’