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पाकिस्तान की इन 'चुड़ैल्स' अभिनेत्रियों ने मचाया भारत में धमाल, हो रही है खूब चर्चा

Wed, 07 Oct 2020 12:28 PM IST
anand anand बीबीसी हिंदी
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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
"किसे पता था एक कातिल चुड़ैल मेरे लिए रहमत का फरिश्ता बनकर आएगी" ये डायलॉग उस अजनबी शख्स की शान में जुबैदा तब बोलती है जब एक 'चुड़ैल' उसे अपने ही मां-बाप की कैद से छुड़ाने में मदद करती है। जब पर्दे के किरदारों का परिचय कातिल और चुड़ैल जैसे शब्दों से कराया जाए तो आप भी कश्मकश में पड़ जाएंगे कि आखिर ये कौन सी दुनिया के बाशिंदे हैं। ये दुनिया दरअसल बसती है कराची की बड़ी बड़ी कोठियों और छोटी-छोटी गलियों में। पाकिस्तान की इस वेब सीरीज का नाम है -चुड़ैल्स, जो जी-5 पर स्ट्रीम हो रही है और भारत में भी इस पर काफी चर्चा हो रही है। पर इस पाकिस्तानी वेब सीरीज में न कोई जादू टोना है न भूत प्रेत। ये कहानी है उन काल्पनिक औरतों की जिन्हें असल जिंदगी में आप शायद रोज मिलते या देखते होंगे पर उनकी असल कहानी से वाकिफ होकर भी अंजान ही रहते हैं। कहानी में किरदार खुद को कुछ इस अंदाज में इंट्रोड्यूस करते हैं- "एक वकील,एक कातिल, एक वेडिंग प्लानर और एक बॉक्सर मिल बैठे और उन्हें एहसास हुआ कि अब तक वो सिर्फ पुतले बन कर जी रहे थे। पुतले जो आप ही की इज्जत के लिए आप ही की इज्जत में लिपटे रहते हैं।" 
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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
इस कहानी की खास बात ये है कि ये ऐसी औरतों की कहानी है जो अपना हक मांगना जानती हैं, न मिले तो छीन लेना चाहती हैं, बात न बने तो साम-दाम-दंड-भेद कुछ भी अपना सकती हैं और ये सब मर्दाना नजरिए से नहीं, बल्कि एक औरत के नजरिए से ही बताया हुआ लगता है। सीरीज के निर्देशक आसिम अब्बासी ब्रिटिश पाकिस्तानी हैं। जब मैंने ये सवाल उनसे पूछा तो मानो खुद पर ही हंसते हुए उन्होंने जवाब दिया,"मेरे लिए चैलेंज था कि मैं औरतों की कहानी औरत की नजर से ही दिखा सकूं। ये एक तरह से खौफनाक तजुर्बा भी था। क्योंकि हूं तो मैं भी मर्द ही।'' ''दो साल तक मुझे हमेशा ये डर लगता रहता कि कहीं गलती से मेरी पुरुषों वाली मानसिकता हावी न हो जाए। इसलिए मैं जो भी लिखता अपनी एसिसटेंट डायरेक्टर्स को दिखाता था क्योंकि वो ज्यादातर औरतें थीं।" चुड़ैल्स और इसमें जुड़े मुद्दों को समझने के लिए इसके किरदारों की दुनिया को समझना भी जरूरी है। परत दर परत जैसे जैसे चुड़ैल्स के किरदारों की तह खुलती है, आप किरदारों के साथ-साथ अपने ही समाज की नई-नई हकीकतो से रूबरू होते हैं। यहां पहली चुड़ैल है सारा (सरवत गिलानी) जो बेहद अमीर आदमी की पढ़ी लिखी बीवी है और बच्चों और पति की देख-रेख में मसरूफ रहती है।
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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
एक दिन सारा को लगता है कि उसे अपनी वकालत दोबारा शुरू करनी चाहिए पर पति जमील बहुत आसानी से कह देता है - "तुम्हारे काम को जंग लग चुका है। तुम्हे कौन काम देगा। कमी किस बात की वैसे.. मैं हूं ना" सारा कहती है, "हां लेकिन आजकल मैं थोड़ी कम हूं"। इस एक संवाद में आप सारा का ही नहीं उस जैसी तमाम औरतों का खालीपन महसूस कर सकते हैं जिनपर 'नौकरी करने की क्यों जरूरत है जब पति काम रहा है' की दलील पेश की जाती है, बगैर ये समझे कि काम करना हर औरत के लिए केवल पैसे कमाने के लिए लिया गया फैसला नहीं होता। दूसरी चुड़ैल है सारा की दोस्त जुगनू चौधरी (यसरा रिजवी)- वो भी संभ्रात, अमीर परिवार की सिंगल लड़की है जिसे घरवालों ने नकार दिया क्योंकि उसने एक काले शख्स से शादी की और ये रंग का भेद उनकी शादी तोड़कर ही टूटा। बिंदास जुगनू समाज की उन औरतों का प्रतिनिधित्व करती है जो बंधनों को नहीं मानती लेकिन कुछ अनकहे किस्से हैं जीवन के जिनका बोझ लेकर वो जीती हैं।

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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
तीसरी चुड़ैल जुबैदा (मेहर बानो) हैं जिसे मोहम्मद अली बनना है और जो कहती है कि "जब मैंने हाथों में ग्लव्स पहने होते हैं और मैं मुक्के पे मुक्का मार रही होती हूं तो ऐसा लगता है जैसे मेरी जान में जान आ गई हो।" पर उसका घर जहन्नुम से कम नहीं। ऐसा घर जहां लड़की को अपनी मर्जी से कुछ करने की आजादी नहीं। एक लड़के से दोस्ती करने और लड़की होते हुए बॉक्सिंग का शौक पालने की सजा के तौर पर जुबैदा को मां-बाप ने घर में कैद कर लिया है।अपने आस-पास ऐसी जुबैदा शायद देखी ही होगी आपने। चौथी चुड़ैल वो है जिसके बारे में पड़ोसियों की राय है, "हमारी बिल्डिंग में चोर और चरसी काफी नहीं थे जो पड़ोस में कातिल भी आ गई। चुड़ैल कहीं की।" बतूलल का किरदार निभाने वाली पाकिस्तानी अभिनेत्री निमरा बूचा बताती हैं,"आम तौर पर औरतों को टीवी या फिल्मी पर्दे पर इस तरह दिखाया जाता है कि दुनिया के लिए उसे हजम करना आसान हो जाए। मतलब औरत या तो बेचारी है या फिर एक आदमी ही उससे मोहब्बत करके उसको बचा सकता है।"
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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
"या फिर वो एक ऐसी औरत है जो दूसरी औरत की पीठ में छुरी घोंप रही है। वो सास हो, ननद हो या फिर सहेली। बस यही दिखाते हैं कि औरत ही औरत की दुश्मन है। जबकि असल जिंदगी में ऐसा नहीं होता। बस ये एक ट्रेंड है। और आपको डर लगने लगता है कि हम कुछ अलग करेंगे तो लोगों को शायद पसंद न आए। लेकिन चुड़ैल्स के किरदार बहुत रियल और मजेदार थे।" बतूल ऐसी औरत है जो 20 साल जेल में काट कर आई है- जुर्म ये कि पति का कत्ल किया। वजह ये कि पति न सिर्फ उसके साथ ज्यादती करता था बल्कि छोटी सी सात-आठ साल की बेटी के साथ भी शारीरिक दुराचार। चुड़ैल्स के एक पुलिसवाले की जबान में बोलें तो, "उसकी मर्दानगी को इस्तरी से जलाकर उसकी सारी गर्मी निकाल दी थी। फिर उसी इस्तरी से उसका सर भी फाड़ डाला था।" बलात्कार, बच्चियों का यौन शोषण, घरेलू हिंसा ये सारे मुद्दे इस वेब सीरीज में एक-एक कर उभरते हैं। यानी कहानी भले ही कराची की है लेकिन आप चाहें तो कराची को हटाकर वहां मुंबई कर सकते हैं।
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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
नाम जु़बैदा, सारा से हटाकर ज्योति या सीमा कर सकते हैं। उर्दू की जगह वो शायद हिंदी या मराठी या भोजपुरी बोल रही होती। कुछ फर्क नहीं पड़ेगा। औरतों की वो घुटन, वो दर्द वही रहेगा। ये इस सीरीज की खूबसूरती है और ताकत भी। चुड़ैलों की ये दुनिया इस मायने में भी अलग है कि इसमें वो सब औरतें भी शामिल हैं जिन्हें समाज का हिस्सा तक नहीं समझा जाता। दो औरतें ऐसी हैं जो समलैंगिक रिश्ते में है तो एक ट्रांसजेंडर है। पर इनका कोई अलग ड्रामा वाला ट्रैक नहीं है- बस वो हैं... जैसे दूसरी औरते हैं। उनके होने को जस्टिफाई करने की कोशिश नहीं की गई। हालांकि ट्रांसजेंडर और समलैंगिकों को दिखाने के लिए पाकिस्तान में इस सीरीज को कई तबकों से आलोचना भी झेलनी पड़ी। 
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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
निर्देशक आसिम इस आलोचना को कुछ यूं देखते हैं, "आलोचना करने वाले बहुत दिनों तक इसी बात में उलझे रहे कि किस-किस बात की आलोचना करें। इस सीरीज में ट्रांसजेंडर से लेकर लेस्बियन औरते हैं। औरतें गालियां भी देती हैं, वो हर बात में मुखर भी थी। तो आलोचना तो होनी ही थी। पर मैंने उन मर्दों को भी दिखाया है जो सही मायनों में इन औरतों के हमदर्द थे। लोंगों ने ये भी कहा कि ये एलजीबीटी को प्रमोट कर रहा है। मैं प्रमोट नहीं, उन लोगों को नॉर्मलाइज कर रहा हूं। क्योंकि समाज में ऐसी औरतें और मर्द हैं। क्या ये बहुत ही अजीब नहीं होता कि मैं दिखाता कि सारी की सारी औरतें एक जैसी हैं? और हमने एक ट्रांसजेंडर एक्टर को ही ट्रांसजेंडर रोल के लिए लिया। जारा जिन्होंने ये रोल किया, वो असल में एक मेकअप आर्टिस्ट हैं और उन्होंने बहुत मेहनत की।" (यहां मुझे पाताल लोक की ट्रांसजेंडर किरदार चीनी याद आ गई जिसके एक असल मणिपुरी ट्रांसजेंडर ने निभाया था।)

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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
हालांकि ऐसा नहीं है कि चुड़ैल्स की इन औरतों में कोई खोट नहीं या आसिम अब्बासी के शब्दों में कहें कि सब 'सती-सावित्री' हैं। निमरा बूचा कहती हैं कि चुड़ैल्स की इन औरतों में भी कमियां हैं जैसे असल जिंदगी में होती हैं। पर इन महिलाओं को या इनसे जुड़े मुद्दों को सेंसर करके दिखाना या उन पर पर्दा डालना गलत परंपरा है। बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "समाज में जेंडर के नाम पर पावर का अंसुतलन हर कदम पर है। हम टीवी में जो दिखाते हैं, जो लतीफे आप पढ़ते हैं, हमें उसके हर लफ्ज को जिम्मेदार ठहराना होगा। हमारी आजादी की अभिव्यक्ति पर जो ताले पड़े हुए हैं वो भी इस सब के लिए जिम्मेदार है। एक औरत, एक मां होने के नाते मुझे भी डर लगता है। लेकिन एक आर्टिस्ट होने के नाते मैं ये नहीं सोच सकती है कि जमाने में जब सब ठीक ठाक होगा तभी मैं अपनी बात रखूंगी। हालांकि हालात हमारे मुल्कों में ऐसे हैं कि लोग सच्ची बात कहने से डरते है।"

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सीरीज की बात करें तो एक डिटेक्टिव एजेंसी से शुरु हुई चुड़ैल्स की कहानी आपको एक गहरे काले सफर पर ले जाती है जहां बलात्कार, ड्रग्स, कत्ल,फरेब, तस्करी सब कुछ है - एक ऐसी दुनिया जिसका सामना करने की इन चुड़ैलों ने सोची तो नहीं थी लेकिन जब सामना हुआ तो प्यार, तकरार, गोलियां, गालियां सब तरह के हथकंड़ों से सामना किया। कानून से न्याय मांगने के लिए जब ये कानून के दायरे से बाहर जाती हैं तो इन चुड़ैलों का तर्क आप काट नहीं पाते, "चाहते तो यही थे कि सब कुछ कानून के दायरे में हो मगर क्या है कि किताब खोली तो समझ में आया कि कानून भी लिखा तो मर्दों ने ही है। तो हमने सोचा कि हम इसे दोबारा लिखेंगे अपने कायदे और अपने कानून। समझो साला दायरा ही फाड़ दिया।" ये कहानी औरतों के बारे में जरूर है और उन मर्दों के बारे में भी जो औरतों की जिंदगी को नरक बनाते हैं लेकिन ये सीरीज मर्दों को सिर्फ वन-डाइमेंशनल नजरिए से नहीं दिखाती। 'कातिल' बतूल को जो शायद सबसे ज्यादा समझने लगता है और उसका साथ देता है वो है थाने का पुलिस इंस्पेक्टर । जुबैदा के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़ा रहने वाला उसका बॉयफ्रेंड शम्स। ये लोग मर्दानगी का मेडल लिए नहीं घूमते, किसी 'अल्फा मेल' की तरह। वहीं इन चुड़ैलों की जिंदगी में ऐसे मर्द भी हैं जो फेमिनिस्ट होने का नकाब पहने घूमते हैं।

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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
इस पाकिस्तानी सीरीज की खास बात ये भी है कि इसके कलाकार और निर्देशक पाकिस्तान के हैं और इसे प्रोड्यूस भारतीय ओटीटी प्लैटफॉर्म जी-5 ने किया है। ऐसे में जब पिछले कुछ अरसे से भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते अच्छे नहीं है तो कलाकारों पर लगी पाबंदी पर निमरा बूचा का तर्क कुछ यूं है। "हमारे यहां तो हिंदी फिल्में इतनी मशहूर हैं कि लोग सिनेमा जाते ही इसलिए हैं कि वो इंडियन सिनेमा देख सकें। चीजें बैन कर हमने अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारी है। भारत-पाकिस्तान के कलाकारों की जुगलबंदी का हिस्सा होना तो हमारे लिए बहुत फक्र की बात है। मैं कहती हूं कि ये पॉलिटिक्स का नजला सबसे पहले बेचारे आर्टिस्ट पर ही क्यों गिरता है? और किसी पर तो जोर नहीं चलता तो लगता है क्यों न इस गाने वाले का मुंह बंद कर दो, या इस अदाकार को मना कर दो। किसी को चुप कराना तो आसान चीज है। आर्टिस्ट इस नफरत की जिम्मेदारी नहीं ले सकते। आर्टिस्ट तो एक दूसरे के साथ काम करना चाहते हैं। मैं खुद तब्बू और नीना गुप्ता की फैन हूं और बधाई हो मुझे बेहद पसंद आई थी।"
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चुड़ैल्स - फोटो : instagram: sarwatg
जहां तक बात चुड़ैल्स की है तो निमरा कहती हैं कि उन्हें विरोध का तो अंदेशा था लेकिन ये देखकर जरूर हैरानी हुई कि छोटे कस्बों और शहरों के लोगों ने इसे स्वीकार किया है। असल जिंदगी का तो पता नहीं लेकिन इस कल्पना की दुनिया में ये औरतें जिस तरह अपने सफर को अंजाम तक ले जाती हैं, वो 'पोएटिक जस्टिस' जैसा एहसास जरूर देता है- जैसे बॉलीवुड का हीरो जब अन्याय करने वाले विलेन को क्लाइमेक्स में पटक-पटक कर मारता है तो आपको लगता है जैसे समाज का और आपका बदला उसने ले लिया हो। सीरीज का एक सीन है जहां जुबैदा के मां-बाप धोखे से उसका निकाह जबरदस्ती करवा रहे होते हैं और तभी चुड़ैलें आकर जुबैदा को उसके अब्बू से छुड़वा लेती हैं और (नकली) बंदूक की नोक पर बाप को मजबूर करती हैं कि वो बोले- जा जुबैदा जा, जी ले अपनी जिंदगी। ये जिद्दी, अड़ियल, गुस्सैल, जाबाज साधारण औरतें - माफ करिएगा चुड़ैल्स आपको ऐसी ही अलग सी दुनिया में ले जाती हैं। अगर उस दुनिया में ऐसी 'चुड़ैलें' रहती हैं, तो ऐसी दुनिया हम सबको मुबारक हो... शायद। जहां तक रही बात आलोचना करने वालों या ट्रोल करने वालों की तो आसिम बात खत्म करते हुए कहते हैं, "कलाकार को बेखौफ तो होना ही चाहिए, उसकी चमड़ी मोटी भी होनी चाहिए। आप लोगों को जरूर एंटरटेन करना चाहते हैं। लेकिन बतौर आर्टिस्ट आपकी सबसे बड़ी सफलता यही है कि आपका काम समाज में एक नई बहस शुरू कर सके.. शायद आने वाले दिनों में ऐसी कहानियां खुद औरतें ही पर्दे पर लाएंगी। एक मर्द को ऐसा नहीं करना पड़ेगा।"

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