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Interview: पांच साल पुराने ऑडीशन से मिली फिल्म बम्फाड़, पिता से तुलना के सवाल पर खुलकर बोले आदित्य रावल

Sun, 12 Apr 2020 09:03 AM IST
प्रतीक्षा राणावत पंकज शुक्ल, मुंबई
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बम्फाड़ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा में हर कलाकार की पहली फिल्म पर करोड़ों निगाहें लगी होती हैं। लोग फिल्म देखें या न देखें लेकिन फैसला सुनाने की जल्दी सबको रहती है। इसी फैसला सुनाने वाले दौर में एक डिजिटल फिल्म से अपनी पारी शुरू की है मशहूर अभिनेता परेश रावल के बेटे आदित्य रावल ने। आदित्य ने कैमरे के सामने आने से पहले खुद को कैमरे के पीछे बहुत घिसा है। लिखने की ट्रेनिंग वह अमेरिका से लेकर आए हैं हालांकि सिनेमा सीखना उन्होंने अपनी मां स्वरूप संपत के साथ तब से शुरू कर दिया था, जब वह सिर्फ 19 साल के थे। आदित्य रावल से ये खास बातचीत की पंकज शुक्ल ने।
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बम्फाड़ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप जिस पीढ़ी से हैं उसमें गांधी, नेहरू आदि पर ज्यादा चर्चा होती नहीं है, लेकिन आपने शुरूआत की एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म 'ड्रामा इन एजुकेशन: टेकिंग गांधी आउट ऑफ द टेक्स्टबुक' से, इसके पीछे आपका विचार क्या था?

मेरी मम्मी एक कलाकार के साथ साथ शिक्षक भी हैं। वह बच्चों को ड्रामा सिखाती हैं। एक बार सूरत में कैम्प करने जा रही थीं और कैम्प उन्होंने इतने सारे कर लिए हैं पर इनका कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं है। तो मैं रहा होऊंगा कोई 19 साल का और मुझे फिल्म बनाना सीखना था। मुझे लगा कि मेरे लिए यह सबसे अच्छा तरीका होगा कि मैं उनके कैम्प्स पर डॉक्यूमेंट्री बनाऊं। इस हिसाब से मैं कुछ नया सीख भी लूंगा, मेरी मम्मी को भी काम आ जाएगा और फिल्म बनाने में तो मेरी बहुत मदद हो जाएगी। उस वक्त मैं खुद ही शूटिंग कर रहा था और खुद ही उसे एडिट भी कर रहा था। कांची पंड्या ने तब शूटिंग में मेरी बहुत मदद की और एडिटिंग में लवेश जैन ने। तो यह सिर्फ गांधी जी की बात नहीं थी।
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बम्फाड़ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तो आप थिएटर लंदन में पढ़े, राइटिंग में अमेरिका में कढ़े और अब जाकर अभिनय के पेड़ पर फिल्म बम्फाड़ में चढ़े हैं, काफी तैयारी की है आपने मैदान में उतरने से पहले?

(हंसते हुए) जी बिल्कुल। इंसान जितनी तैयारी के साथ मैदान में उतर सके, उतना बेहतर है। मैंने लंदन में छह महीने की पढ़ाई फिजिकल थिएटर में की। लंदन इंटरनेशनल स्कूल ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स में जो फिजिकल थिएटर होता है, प्रयोगात्मक थिएटर होता है। फिर मैंने एनवाईयू से एमएफए किया ड्रामेटिक राइटिंग में। जो होता है फिल्म राइटिंग, स्क्रीन राइटिंग और टीवी राइटिंग में। आपने जो मैदान में उतरने की बात कही, वह एकदम सही है। हम टीवी के सामने बैठकर बोल देते हैं कि ये खिलाड़ी भी आउट हो गया। या हममें से कोई क्रिकेट में पहुंच गया तो बोल देते हैं कि यार ये कैसे पहुंच गया। लेकिन लोग ये नहीं जानते कि उसने अपने मोहल्ले के मैदान में या रणजी ट्रॉफी में कितने सौ और दो सौ रन बनाए होंगे तब जाकर कहीं इसका नंबर आ रहा है।

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Aditya Rawal
थोड़ा पीछे जाकर देखें तो हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर समझी जाने वाली फिल्म ओह माई गॉड के मूल नाटक कानजी वर्सेज कानजी या किशन वर्सेज कन्हैया का भी आप हिस्सा रहे हैं, तो कभी ये ख्याल आया कि मैं मेहनत कितनी भी करूं, नापा मुझे हमेशा परेश रावल की अदाकारी के पैमाने पर ही जाएगा?

नाटकों में मैं बैकस्टेज काम करता था। एक दो मिनट का अगर कोई रोल हो गया तो वो भी हम कर लेते थे। रही बात पिताजी की तो वे इतने महान कलाकार हैं, इतने पहुंचे हुए कलाकार हैं कि मुझे कोई फिक्र ही नहीं है। अगर मैं उनकी तरह 25-30 साल तक लगातार काम करूं तब भी यह सवाल रहेगा कि मैं उनके हिसाब से नापे जाने लायक हूं कि नहीं। अभी तो मेरी शुरूआत है और इतनी बड़ी बड़ी चीजें सोचने का कोई मतलब भी नहीं है। दूसरी बात ये कि लोगों में मुझे लेकर उत्सुकता तो जरूर बढ़ी होगी। लेकिन परेश रावल जो हैं वो तो हैं। मेरे काम से तो मैं ही दिखाई दूंगा। अगर मेरे काम में लोगों को उनके जैसा कुछ भी दिखा तो मैं इसका शुक्रगुजार रहूंगा।
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aditya rawal
परेश रावल की अदाकारी का इतना लंबा और इतना विस्तृत ग्राफ रहा है कि इसमें डकैत के विष्णु पांडे से लेकर सरदार के वल्लभ भाई पटेल और हेराफेरी के बाबूराव और उससे भी कहीं आगे बहुत कुछ है, लिखने कहने को। आपको अपने पिता के कौन से किरदार सबसे ज्यादा पसंद आते हैं?

उतना पीछे का तो मुझे याद नहीं हालांकि मैंने उनका काम देखा तो होगा ही। लेकिन उनके अभिनय की जो पहली यादें मेरी हैं, वे हैं तमन्ना और सरदार की। उन दोनों फिल्मों ने ही मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया। वही मेरे लिए यादगार हैं। उनको निर्देशक भी बहुत अच्छे मिले। एक निर्देशक ही होता है जो किसी भी फिल्म को आकार देता है। आप जो भी काम करें लेकिन डायरेक्टर ही होता है जो आपसे काम निकलवाए या आपकी परफॉर्मेंस और आपके किरदार को आकार दे। जैसे हमारी फिल्म बम्फाड़ में भी रंजन चंदेल जो हैं…
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Aditya Rawal
मैं इसी बात पर आना चाहता था। परेश रावल का बेटा अगर चाहता तो करण जौहर या आदित्य चोपड़ा किसी की भी फिल्म से शुरूआत कर सकता था। रंजन चंदेल की फिल्म से ही क्यों?

हमारे घर का माहौल फिल्मी नहीं है। मेरे पिताजी का काम भी वैसा ही रहा है। शिद्दत से काम करो, मेहनत से काम करो, लोगों के साथ अच्छे रहो, प्रोफेशनल रहो। और फिर जो तुम्हें काम मिलेगा वो आपके भाग्य पर भी निर्भर करेगा। मेरा भी ऐसा ही मानना है कि सिर नीचा करके रहो, मेहनत से काम करो। कलाकार तो कोई भी अच्छा बन सकता है। ज्यादा जरूरी है अच्छा इंसान बनना। कास्टिंग डायरेक्टर तरन बजाज के साथ मैंने चार-पांच साल पहले एक ऑडिशन दिया था किसी दूसरी फिल्म के लिए। तब उस किरदार के लिए मैं बहुत छोटा था। मैं उसमें फिट तो नहीं हुआ लेकिन उन्हें मेरा ऑडिशन बहुत पसंद आया। उन्होंने जब बम्फाड़ की स्क्रिप्ट पढ़ी तो उन्हें मैं याद आ गया और उन्होंने मुझे ऑडिशन के लिए बुला लिया। फिर रंजन भाई को भी मेरा ऑडिशन पसंद आया।
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बम्फाड़ - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म को अनुराग कश्यप प्रजेंट कर रहे हैं, डायरेक्ट क्यों नहीं की?

वह तो अपनी कहानियों को डायरेक्ट करते हैं। ये रंजन भाई की कहानी है। उन्होंने अनुराग सर के साथ मुक्केबाज की है। वो तो उनके साथ काम करते ही हैं। मेरे लिए तो अनुराग सर के साथ काम करना आशा है कि आगे चलकर मौका मिलेगा। उस दिन का तो मैं बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं। जब मैं उनसे इस पिक्चर के लिए मिलने गया तो उन्होंने कहा था कि जब उनके भी पृथ्वी थिएटर के दिन थे, तभी उन्होंने मुझे देखा था, तब मैं बहुत छोटा था।

अनुराग कश्यप की राजनीतिक विचारधारा और आपके परिवार की राजनीतिक विचारधारा दो अलग अलग ध्रुव हैं, कभी इसे लेकर कोई असहजता महसूस हुई?

नहीं, जरा भी नहीं। हम तो सिर्फ फिल्मों के बारे में मंत्रणा किया करते थे। हम अपने अनुभवों पर बात किया करते थे। अगर आप मेरा पॉलिटिकल नजरिया देखेंगे या उनका देखेंगे तो किसी का राजनीतिक नजरिया एक घंटे के भाषण के बाद या 10 पन्ने का निबंध लिखने के बाद भी समझना मुश्किल है। किसी को ऐसे ही किसी तबके में डाल देने को मैं नाइंसाफी समझता हूं।
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बम्फाड़ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म बम्फाड़ में हीरो के तौर पर आप पहली बार दिखेंगे लेकिन सिनेमा में काम तो आप पहले भी कर चुके हैं, उसके बारे में बताइए?

जी, बिल्कुल! पढ़ाई, काम और सीखना तो साथ साथ चलता ही रहा है। आशा है कि आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा। अगर आदमी काम के साथ पढ़ता और सीखता रहे तो उसका काम आगे भी बेहतर हो जाता है। पहले फरारी की सवारी की बताता हूं। ये मेरे लिए बहुत रुचिकर अनुभव रहा। उसमें पिताजी का जो किरदार था। उनकी जवानी का किरदार मैंने किया। लेकिन फिल्म में सिर्फ मेरे फोटो दिखते हैं। और, बॉम्बे टॉकीज में तो नाटक था। ये मोनोलॉग की एक सीरीज थी। उसमें आठ मोनोलॉग थे जिसमें से एक मेरा था। मैं उसमें एक गुजराती लड़का शोभित पटेल बना था जो वीजा की लाइन में खड़ा है। वो दर्शकों को मोनोलॉग दे रहा है कि यूएस के सपनों के बारे में और अपने प्यार के बारे में जिसे वो यहां छोड़कर जाने वाला है।

क्या मैं जान सकता हूं कि ये फिल्म थिएटर में रिलीज क्यों नहीं हो रही?

ये जो जी5 का प्लेटफॉर्म है वह बहुत बड़ा प्लेटफॉर्म है। अब थिएटर में आकर बड़ी बड़ी फिल्मों के बीच में पता नहीं हम कहां जाकर खो जाते। यहां हमें एक बढ़िया प्लेटफॉर्म मिल रहा था अपनी पिक्चर रिलीज करने का जिससे इसे लोग ज्यादा से ज्यादा देख सकें। ये बहुत बढ़िया मौका था मेरे लिए।

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