विष्णु पुराण
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मंथन शुरू होने से पहले दानवों और दैत्यों के बीच समझौता होता है कि समुद्र मंथन से जो भी निकलेगा, वह दोनों पक्षों में बराबर बंटेगा। इस बीच वासुकी नाग के मुख की ओर न रहने के लिए दोनों पक्षों में बहस होती है, कोई भी वासुकी नाग के मुख की तरफ नहीं होना चाहता क्योंकि उनके मुख से निकली अग्नि से भस्म होने का खतरा होता है। इस बीच देवऋषि नारद अपनी चतुराई से दैत्यों को वासुकी नाग के मुख की ओर रहने के लिए मनाते हैं।