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महाभारत की शुरुआत पर राजीव गांधी के अफसरों ने मचा दिया था बवाल, पंडितजी के इस तर्क ने किया निरुत्तर

Fri, 17 Apr 2020 06:48 PM IST
प्रतीक्षा राणावत पंकज शुक्ल, मुंबई
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महाभारत - फोटो : Twitter
ज्यादातर लोग यही समझते रहे हैं कि मशहूर निर्माता निर्देशक बी आर चोपड़ा के बनाए धारावाहिक महाभारत में पूरी लिखा पढ़ी सिर्फ डॉ. राही मासूम रजा की ही है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि वह दरअसल मशहूर कवि और लेखक पंडित नरेंद्र शर्मा के बताए हुए को ही पटकथा और संवादों में बदल देते थे। पंडित नरेंद्र शर्मा की बेटी लावण्या शाह ने अपने पिछले संस्मरण में महाभारत की मेकिंग की तमाम अनसुनी बातें अमर उजाला के पाठकों के लिए पंकज शुक्ल को बताईं। अब आगे...
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Lavanya Shah - फोटो : Lavanya Shah
महाभारत इतना बड़ा काव्य है लेकिन बी आर चोपड़ा ने इसका आरंभ महाराज भरत के उत्तराधिकारी के चयन की दुविधा से किया। लावण्या बताती हैं, “इस शुरूआत को लेकर भी खूब पंगा हो गया। दूरदर्शन के अधिकारी सरकारी अफसर ठहरे उन्हें लगा कि ऐसा न हो कि कल के दिन उनके ऊपर कोई आफत आ जाए। तब राजीव गांधी सरकार केन्द्र में थी और कई मातहतों ने वरिष्ठ अधिकारियों को भड़का दिया कि ये उत्तराधिकारी यानी नेपोटिज्म वाली बात इसमें क्यों है? इसे निकाला जाए और एपीसोड फिर से शूट किया जाए। शायद ये लोग नेहरू परिवार के लिए भी ये बात लागू होने को लेकर भयभीत थे।”
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Pt. Narendra Sharma - फोटो : Lavanya Shah
मामला संगीन था और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। पहले ही एपीसोड में अफसरों के सामने घुटने टेक देने का मतलब था कि हर बार हर एपीसोड में ऐसी ही नुक्ताचीनी की जाएगी और निर्माता निर्देशक से लेकर कलाकार तक सब परेशान हो जाएंगे। पंडित नरेंद्र शर्मा की बेटी बताती हैं, “बी आर अंकल को भरोसा था कि पापाजी इसका हल जरूर निकाल लेंगे। दोनों लोग दिल्ली पहुंचे और दूरदर्शन के कार्यालय में एपीसोड को फिर से देखा गया। पापाजी के सवाल करने पर जब अफसरों ने अपनी आपत्तियां बताईं तो पापाजी इतना ही बोले कि ये सनातन धर्म की बातें हैं और इनमें छेड़छाड़ करने से आपका ही बुरा मंतव्य जनता को दिखेगा। इनके इस तर्क पर दूरदर्शन के अफसरों ने जिद छोड़ दी और इस सीन को धारावाहिक से काटा नहीं गया।”

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Pt. Narendra Sharma - फोटो : Lavanya Shah
और, वह क्या मामला था जब बी आर चोपड़ा सुबह सुबह अतिरिक्त भुगतान का चेक लेकर पंडित जी से मिलने घर पहुंच गए थे? लावण्या बताती हैं, “दरअसल वह शांतनु और मत्स्यगंधा के प्रणय बिम्ब का दृश्य था। शूटिंग हो गई। बी आर चोपड़ा और रवि चोपड़ा ने सीन को एडिट भी करा लिया लेकिन सीन खाली खाली सा लग रहा था। इस पर पापाजी ने कहा, ये गीत दे रहा हूं, इसे इस खाली स्थान पर रखिए। अच्छा लगेगा यहां पर। वह गीत था, दिन पर दिन बीत गए...। गाना रिकॉर्ड हुआ। सीन फिर से एडिट हुआ इस बार पापाजी के लिखे गाने के साथ। लोग भावविह्वल हो उठे।” बी आर चोपड़ा की समस्या दूर हो चुकी थी।
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Pt. Narendra Sharma and Lata - फोटो : Lavanya Shah
लावण्या कहती हैं, “चोपड़ा अंकल दूसरे दिन एक चेक लेकर आए। बोले, इस पर आप धनराशि भर लीजिए। लेकिन, पापाजी परंपरावादी ब्राह्मण रहे जीवन भर। परद्रव्येषु लोष्ठवत् के अनुयायी। चोपड़ा अंकल के आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब पापाजी ने ये कहते हुए चेक लौटा दिया कि आपने मुझे जब अनुबंधित किया है तो मेरा फर्ज बनता है कि इस सीरीज की सफलता के लिए भरसक प्रयास करूं। मैं गीतकार भी हूं आप ये जानते हैं। इसे रहने दीजिए।" वह यह भी बताती हैं कि ये किस्सा चोपड़ा अंकल ने उन सबको पापाजी के निधन के बाद सुनाया था। उन्होंने कहा था, “बीसवीं सदी में भी जीवित ऐसे संत कवि को मैं लौटाए हुए चेक को हाथ में थामे अपलक विस्मय से देखता रह गया था।”
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Lavanya Shah and Roopa Ganguly - फोटो : Mumbai, Amar Ujala
बी आर फिल्म्स और बी आर टीवी की भीतर तक खबर रखने वालों का ये भी कहना रहा है कि महाभारत धारावाहिक में सुनाई देने वाले तमाम दोहे लावण्या शाह के भी लिखे हुए हैं। इसमें कितनी सच्चाई है? वह ये किस्सा भी बताती हैं, “बी आर अंकल का दफ्तर मेरी ससुराल के सामने ही है। एक दिन शाम को मैं अपने पति दीपक के साथ टहल रही थी तो नुक्कड़ पर संगीतकार राजकमल जी मिल गए। वह पापाजी को सजल नयनों से याद करने लगे तो दीपक ने ही कह दिया, अंकल, लावण्या ने भी कई दोहे महाभारत सम्बंधित लिखे हैं। राजकमल जी ने ये सारे दोहे मुझसे ले लिए और महाभारत में जहां तहां इनका प्रयोग भी किया।”

महाभारत में शामिल पंडित नरेंद्र शर्मा की बेटी लावण्या शाह रचित कुछ दोहे इस प्रकार है:
प्रसंग- पदी और सुभद्रा का सर्व प्रथम मिलन
दोहा -
गंगा यमुना सी मिलीं, धाराएं अनमोल
द्रवित हो उठीं द्रौपदी, सुनकर मीठे बोल
प्रसंग- सुभद्रा हरण
दोहा -
बिगड़ी बात संवारना, सांवरिया की रीत,
पार्थ सुभद्रा मिल गए, हुई प्रणय की जीत
प्रसंग- जरासंध वध
अभिमानी के द्वार पर, आए दीन दयाल,
स्वयं अहं ने चुन लिया, अपने हाथों काल
प्रसंग - द्रौपदी चीर हरण
दोहा-
सत असत सर्वत्र हैं, अबला सबला होय
नारायण पूरक बनें, पांचाली जब रोय

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