शार्दुल पंडित
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रेडियो में जॉकी रहे, टीवी पर एंकरिंग की और लगातार चित्रकारी आप करते रहे हैं। तो यह अभिनय का कीड़ा आपके अंदर कैसे आया और वहां तक कैसे पहुंचे?
जब मैंने पहली बार कैमरे का सामना किया उस पल को मैं लिख कर बोल कर या पढ़कर बयां नहीं कर सकता। वह मेरी जिंदगी का ऐसा अनुभव है कि मैं उसे शब्दों में बता नहीं सकता। इसकी शुरुआत कुछ ऐसे हुई थी कि मैं इंदौर में ही था और रेडियो में काम कर रहा था। उसी वक्त जी चैनल का एक शो 'इंडियाज बेस्ट सिनेस्टार्स की खोज' शुरू हुआ। इसमें मैं, दिव्यांका त्रिपाठी और भी कई जाने-माने कलाकार सफल रहे। हम जीत गए थे और हमारी शुरुआत भी हो गई थी। लेकिन, मुझे वापस रेडियो में जाना पड़ा। मैं एक मध्यमवर्गीय परिवार का लड़का हूं और अभिनय को हमारे यहां एक पेशे के रूप में नहीं देखा जाता। मुझे भी इस क्षेत्र में आने से रोका गया इसलिए मैं रुक गया और फिर से रेडियो में काम करने लगा। लेकिन, जब रेडियो मिर्ची के साथ मैं मुंबई आया और यहीं पर रहने लगा तो यहां रेडियो मिर्ची में रहकर मैंने कई फिल्मी कलाकारों के इंटरव्यू लिए। इस दौरान मुझसे कई कलाकारों ने कहा कि जब मेरा सब कुछ इतना अच्छा है तो मैं अभिनय में क्यों नहीं आता। मुझे अच्छे से याद है कि एक बार मैं अब्बास मस्तान का इंटरव्यू करने के लिए गया था। उनका इंटरव्यू खत्म करके मैं वापस आया तो उन्होंने रेडियो मिर्ची में एक पत्र लिखकर भेजा कि इस लड़के को हमें दे दो। हम इसे फिल्म में लॉन्च करना चाहते हैं।