खुद ही सोचिए अगर आंसू और सासू मां को सीरियलों से निकाल दिया जाए तो इनमें क्या बचेगा। ऐसी ही कुछ और चीजें हैं जिनके बिना सीरियल अधूरे हैं।
आंसू
रोना हमारी टेलीविजन अभिनेत्रियों का पसंदीदा काम है। बेटी हो या बहू हरदम टसुए बहते मिलेंगे। कभी प्यार में तो कभी तकरार में इनके आंसू नॉन स्टॉप बहते हैं। कभी कभी तो इनके लिए ग्लिसरीन तक कम पड़ जाती है।
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बिंदी-
विलेन तो बिना बड़ी बिंदी के नजर ही नहीं आतीं। बड़ी- बड़ी बिंदियों के बिना हमारा टेलीवुड सूना है। अब जरा कोकिला बेन को ही देख लीजिए या फिर हमारे टेलीवुड की सबसे बड़ी विलेन कोमलिका को देख लीजिए।
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दादी मां-
हमारा टेलीविजन जगत संयुक्त परिवार को दिखाता है, तो भला ये दादी मांओं को कैसे भूल सकता है। साथ निभाना साथिया की 'बा' हों या फिर प्रतिज्ञा की दादी, ये दर्शकों के दिल में अपनी जगह बना चुकी हैं।
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बहनें-
बहनों का प्यार और तकरार भी हमारा टेलीवुड बखूबी दिखाता है। अब आप एक हजारों में मेरी बहना है की जीविका और मानवी का ही प्यार देख लीजिए।
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संस्कारी बाऊजी-
पिताजी के बिना परिवार कहां पूरा होता है। आलोकनाथ जी तो टेलीविजन सिनेमा के प्यारे बाऊजी हैं।
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विलेन-
इनके बिना तो हमारी फिल्में भी पूरी नहीं मानी जाती तो टेलीविजन कहां पीछे रहता। ये तरह-तरह से साजिश करके दर्शकों को बांधे रहते हैं। लेकिन कभी-कभी बोर भी करते हैं।
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नागिन हो या मक्खी
हमारा टेलीविजन जानवरों को भी बखूबी इस्तेमाल करता है। नागिन सीरियल तो पूरे तौर पर एक नागिन की कहानी पर आधारित है। वहीं सिमर मक्खी तक बन चुकी है।
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शादी-
संस्कार है तो शादी होना भी जरुरी है। हमारे सीरियलों में शादी भी खूब होती है। यहां तक की हीरो हीरोइनों का पेट एक शादी से नहीं भरता वो दो-तीन शादियां भी कर डालते हैं।
तुलसी-
'क्योंकि सास भी कभी बहु थी' में हम स्मृति ईरानी के तुलसी के किरदार को कैसे भूल सकते हैं। भारतीय परंपरा के तौर पर हिंदू घरों में तुलसी की पूजा होती है और आप हर भारतीय सीरियल में तुलसी का पौधा जरुर देखेंगे।