सीरियस मेन
- फोटो : screenshot from youtube/Serious Men
‘सीरियस मेन’ जाति विभेद की राजनीति पर बनी फिल्म है। सुधीर मिश्रा तीन दशक बाद फिर से धारावी पहुंचे हैं। सिनेमा में उनका उदय भी ठीक से उनके करियर की बतौर निर्देशक तीसरी फिल्म ‘धारावी’ से ही हुआ। इस बार कहानी अय्यन की है, वह दलित है। उसका नैतिक कंपास उत्तर और दक्षिण दिशा में ही टिका रहे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। साहब उसके धुरंधर हैं। बेटे को वह अपने उनसे बड़ा धुरंधर बनाना चाहता है। पूरी लाइफ गालियां खा खाकर गुजारने वाले अय्यन को लगता है उसका बेटा तकदीर बदल सकता है। इसके बाद ‘तारे जमीन पर’ उतरते हैं। ‘पीपली लाइव’ होता है। और, होता है वह सबकुछ जो दर्शक कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में देख चुके हैं। सुधीर मिश्रा को मैं हिंदुस्तानी सिनेमा का क्वेंटिन टैरेंटिनो मानता रहा हूं। लेकिन, वह रामगोपाल वर्मा बनने की ठान चुके हैं जबकि उनकी फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ का परिवर्धित संस्करण रही ‘सत्या’ ही राम गोपाल वर्मा का हिंदी सिनेमा में असली टेक ऑफ है।