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बाइस्कोप: अमिताभ के गुस्से से नहीं बच पाए इस फिल्म के डांस मास्टर, नाचने पर किया कमेंट तो फिर...

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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई

शमा कहे परवाने से, परे चला जा

मेरी तरह जल जाएगा, यहां नहीं आ..

वो नहीं सुनता उसको जल जाना होता है

हर खुशी से, हर ग़म से, बेगाना होता है...


आनंद बख्शी ने ये गाना राजेश खन्ना की साल 1971 के पहले महीने में रिलीज हुई फिल्म कटी पतंग के लिए लिखा था लेकिन अगर आपने अमिताभ बच्चन की इस फिल्म के पांच महीने बाद रिलीज हुई फिल्म परवाना देखी है तो आपको लगेगा कि ये गाना शायद इस फिल्म के लिए बिल्कुल मुफीद होता। गाने फिल्म परवाना के भी जबर्दस्त रहे। कैफी आजमी की कलम और मदन मोहन जैसे संगीतकार की धुनें। दिल से बस एक ही बात निकलती है, वाह! फिल्म परवाना हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है, लेकिन फिल्म के बारे में चर्चा करने से पहले सुन लेते हैं फिल्म का वो गाना, जो मेरा भी बड़ा फेवरिट है, सिमटी सी शरमाई सी, किस दुनिया से तुम आई हो, कैसे जहां में समाएगा....  

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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई
किशोर कुमार के अलावा फिल्म में आशा भोसले और परवीन सुल्ताना ने शानदार गाने गाए। लेकिन फिल्म के सबसे हिट गीत का सेहरा सजा उस दोगाने के नाम, जिसमें आवाज़ें रहीं मोहम्मद रफी और आशा भोसले की। कैफी आजमी ने इस गाने में जैसे दिल निकालकर रख दिया हो और मदन मोहन, उनका संगीत तो खैर बेमिसाल होता ही है। फिल्म का बाइस्कोप दिखाने की बजाय मामला अमीन सयानी की संगीतमाला जैसा होता जा रहा है लेकिन ये गाना आपको सुनाए बिना आगे बढ़ने का दिल नहीं कर रहा तो सुनिए, जिस दिन से मैंने तुमको देखा है...
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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई

फिल्म के इन बेहतरीन गानों के अलावा फिल्म का एक और गाना जिक्र करने लायक है जिसमें अमिताभ बच्चन ने फिल्म की हीरोइन योगिता बाली के साथ हैदराबादी अंदाज अपनाया है। दिलचस्प बात ये है कि अमिताभ बच्चन ने इस फिल्म के बाद सीधे 1982 में आई फिल्म देशप्रेमी के गाने ‘खातून की खिदमत में सलाम अपुन का’ में ही ये हैदराबादी अंदाज अपनाया। लेकिन इन 11 सालों में समय का पहिया पूरा घूम चुका था। जिस अमिताभ बच्चन के साथ एक फ्रेम में खड़े होने को नवीन निश्चल फिल्म परवाना अपनी तौहीन समझते थे, उन्हीं अमिताभ बच्चन की सिफारिश पर मनमोहन देसाई ने फिल्म देशप्रेमी में उनको सेकंड लीड हीरो का काम दिया था। इसीलिए, गुणी लोग समझाते रहते हैं कि तख्त पाकर तख्त नशीं होने का गुरूर किसी को नहीं पालना चाहिए, शायर हबीब जालिब का मशहूर शेर है...

तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहां तख़्त-नशीं था

उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था

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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई
नवीन निश्चल पूना फिल्म इंस्टीट्यूट के गोल्ड मेडलिस्ट थे और उन्हें इसका बहुत गुमान भी था। पहली फिल्म रेखा के साथ थी, सावन भादों। फिल्म सुपरहिट हुई और नवीन निश्चल के पैर जमीन पर नहीं टिक सके। वह खुद को सबसे बड़ा सुपरस्टार समझने लगे। उनकी शोहरत का आलम ये था कि देव आनंद के परिवार में उनका रिश्ता हुआ। फिल्ममेकर शेखर कपूर की बहन नीलू उनकी पहली पत्नी थीं। नवीन निश्चल और योगिता बाली को लेकर बनी फिल्म परवाना के समय अमिताभ बच्चन की हैसियत हिंदी सिनेमा में स्ट्रगलर जैसी तो नहीं थी लेकिन उनके भीतर के अभिनेता को तब तक कम लोग ही पहचान पाए थे। फिल्म परवाना के एक गाने में पियानो पर थिरकती अमिताभ की उंगलियों के बीच उनकी कनपटी की नसों के उठने बैठने पर अगर किसी निर्देशक का ध्यान गया होता तो समझ आया होता कि एंग्री यंगमैन तो इस इंसान के भीतर न जाने कब से कुलबुला रहा था।
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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई
फिल्म परवाना की कहानी इकतरफा प्यार की कहानी है। बस इसको अंजाम तक पहुंचाने में इसकी पटकथा ने अमिताभ का बहुत ज्यादा साथ नहीं दिया। फिल्म में उनका किरदार कुमार सेन एक शिल्पी और कलाकार का है। वह मन ही मन आशा को चाहता तो है लेकिन कह नहीं पाता। जब तक वो अपने दिल की बात कह पाए, आशा उसे अपना सबसे अच्छा दोस्त मानते हुए अपनी मोहब्बत का किस्सा सुना देती है। उसे एक रईसजादे राजेश से प्यार हो चुका होता है। कुमार की तो जैसे दुनिया ही इसके बाद उजड़ जाती है। आशा के जिन चाचा ने कुमार की शादी आशा से कराने का वादा किया होता है, वह एक दिन मरे मिलते हैं। कुमार और राजेश के बीच फंसी आशा का दिल राजेश के पास है, दिमाग उसे कुमार के पास भेजता है। कुमार और आशा की इस मुलाकात में असली मोहब्बत की शमा जलती है और परवाना अपने अंजाम को पहुंच जाता है।

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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई
कहने को तो इस फिल्म के हीरो हैं नवीन निश्चल लेकिन फिल्म में देखने लायक अभिनय है अमिताभ बच्चन का। कुमार कलाप्रेमी है। वह राजेश जैसा पैसे से रईस तो नहीं है लेकिन दिल का मालदार है। बस यही इस किरदार की अच्छाई भी है और यही कमजोरी भी। प्यार में तिरस्कार को अच्छे अच्छे पचा नहीं पाते हैं। वह तिकड़में भिड़ाते हैं। तरकीबें निकालते हैं और जब कुछ नहीं हो पाता तो फिर दिल की भड़ास निकालते हैं। कुमार के इस किरदार में अभिनय के सारे रंग हैं। ‘अरे हंसने वालों’ गाने में उनके चेहरे पर जो भाव आते जाते हैं और योगिता बाली का उन भावों को देखकर जो रिएक्शन है, वह फिल्म में निर्देशक ज्योति स्वरूप का असली कमाल है।
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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई
ज्योति स्वरूप इससे पहले सुनील दत्त और किशोर कुमार के साथ ब्लॉकबस्टर फिल्म पड़ोसन का निर्देशन कर चुके थे, फिल्म में नवीन निश्चस सिर्फ एक फिल्म पुराने स्टार थे। अमिताभ बच्चन को फिल्म आनंद में कुछ ही महीनों पहले खूब तालियां मिल चुकी थीं। एन सी सिप्पी ने इसी को देखकर परवाना में पैसा भी लगाया था। योगिता बाली जो आगे चलकर पहले किशोर कुमार और फिर मिथुन चक्रवर्ती की पत्नी बनीं, की ये डेब्यू फिल्म है। फिल्म परवाना में ओम प्रकाश, असित सेन और ललिता पवार ने तो शानदार अभिनय किया ही। शत्रुघ्न सिन्हा ने भी इस फिल्म में एक खास किरदार निभाया है। फिल्म परवाना के पहले पोस्टर में जहां अमिताभ बच्चन का चेहरा ही नहीं दिखाया गया, वहीं बाद में अमिताभ की फिल्म जंजीर रिलीज होने के बाद जब इसे दोबारा रिलीज किया गया तो पूरे पोस्टर पर अमिताभ बच्चन ही छाए हुए दिखे। उनके करियर की यह पहली फिल्म है जिसमें उन्होंने एक नकारात्मक भूमिका निभाई, सत्ते पे सत्ता, अक्स, आंखें, रामगोपाल वर्मा की आग जैसी फिल्मों में उनका ये रूप लोगों ने बहुत बाद में देखा।

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परवाना - फोटो : सोशल मीडिया

फिल्म जंजीर के बाइस्कोप में मैंने आपको बताया था कि कैसे आर के स्टूडियो में फिल्म की शूटिंग के समय अमिताभ की आवाज सुनकर शो मैन राज कपूर ने फिल्म के निर्माता निर्देशक प्रकाश मेहरा को बुलाकर पूछा था कि ये कौन है और कहा था कि ये लड़का एक दिन बहुत बड़ा स्टार बनेगा। ऐसा ही एक किस्सा फिल्म परवाना का भी है। ओम प्रकाश का किरदार ही फिल्म जंजीर में इंस्पेक्टर विजय को सारी खुफिया जानकारियां देता रहता है। यहां फिल्म परवाना में भी अमिताभ बच्चन औऱ ओम प्रकाश की केमिस्ट्री पहले ही सीन से जम जाती है। लेकिन, फिल्म की शूटिंग के दौरान ओम प्रकाश और अमिताभ बच्चन का जो पहला सीन साथ में फिल्माया गया, उसका किस्सा ओम प्रकाश बाद में बरसों तक सबको सुनाते रहे।

हुआ यूं कि निर्देशक ज्योति स्वरूप ने लाइट्स, रोल साउंड, कैमरा के बाद जब एक्शन बोला, तो प्रेम प्रकाश को पलटकर अमिताभ को देखना था और अपना संवाद बोलना था। लेकिन, ओम प्रकाश पलटे और अमिताभ के चेहरे पर उनकी निगाह गई तो वह विस्मित हो गए। उनको याद ही नहीं रहा कि उनको अब डॉयलॉग बोलना है, ऐसा था अमिताभ के चेहरे का उस सीन में आकर्षण। ओम प्रकाश उस दिन शूटिंग नहीं कर पाए। ज्योति स्वरूप ने पैकअप बोल दिया। उसी दिन अमिताभ के लिए ओम प्रकाश ने भविष्यवाणी की थी कि ये लड़का एक दिन सबको हैरान कर देगा।

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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई
1944 में रिलीज हुई फिल्म दासी में एक साथ छह रूप धरने वाले ओम प्रकाश ने हिंदी सिनेमा की चार पीढ़ियों के सुपरस्टार्स के साथ काम किया और न कभी पहले और न कभी इसके बाद ही किसी कलाकार के लिए ये बात कही। अमिताभ बच्चन को इस फिल्म में ओम प्रकाश जैसे वरिष्ठ कलाकार से इतनी तारीफ मिली। इतनी हौसला अफजाई की जिसकी कद्र अमिताभ बच्चन सारी उम्र करते रहे। ओम प्रकाश ने बाद में अपने करियर के तमाम बेहतरीन किरदार भी अमिताभ बच्चन के साथ ही किए। फिल्म नमक हलाल में उनका दद्दू का किरदार हो या फिल्म शराबी में मुंशीजी का किरदार, उनके किरदारों ने अमिताभ के किरदार को इन फिल्मों में एक मजबूत सहारा दिया।

लेकिन, फिल्म परवाना में एक किस्सा ऐसा भी सुनने को मिलता है जिसे अगर अमिताभ ने दिल से निकाल न फेंका होता तो वह हमेशा के लिए अवसाद में घिर सकते थे। हुआ यूं कि फिल्म के गाने ‘ओ जमीला’ में अमिताभ बच्चन को नाचने और गाने के हिसाब से होंठ चलाने दोनों काम पहली बार करने थे। ऐसा करने में बड़े अभिनेताओं को कई बार दिक्कत होती है लिहाजा बैकग्राउंड गानों की मदद ली जाती है। लेकिन, अमिताभ ने निर्देशक ज्योति स्वरूप को यकीन दिलाया कि वह ऐसा कर लेंगे। आमतौर पर गानों की शूटिंग के वक्त सारी कमान नृत्य निर्देशक के पास ही होती है, उस दिन सेट पर मौजूद नृत्य निर्देशक सुरेश भट्ट का जाने मूड खराब था या कुछ और, दो तीन बार अमिताभ से स्टेप्स गलत हुए तो वह चिल्ला उठे।
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परवाना - फोटो : अमर उजाला मुंबई
बताते हैं सुरेश भट्ट ने तो प्रोड्यूसर तक से कह दिया कि इस लड़के को बदल डालो, इससे हो नहीं पाएगा। लेकिन सिनेमैटोग्राफर रामचंद्र ने मामले को संभाला। बाद में एडिट टेबल पर वामन भोंसले ने भी मेहनत की और गाना सही तरीके से तैयार हो गया। सुरेश भट्ट ने देव आनंद, राजेश खन्ना, मिथुन चक्रवर्ती से लेकर जीतेंद्र, सनी देओल और अजय देवगन तक को नचाया है लेकिन परवाना के बाद फिर किसी फिल्म में अमिताभ बच्चन को वह नहीं नचा पाए। और, इन्हीं अमिताभ बच्चन ने नाचने में इतनी महारत हासिल की कि बाद में उनके नाचने का भी एक अलग स्टाइल बन गया औऱ जिसकी देश के करोड़ो युवाओं ने अलग अलग मौकों पर नकल की। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।


(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)
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