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'Munna Michael' Review: टाइम पास के लिहाज से भी भारी है फिल्म

Sun, 23 Jul 2017 08:11 AM IST
रवि बुले
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'मुन्ना माइकल' समीक्षा
निर्माताः विक्की राजानी

निर्देशकः सब्बीर खान

सितारेः टाइगर श्रॉफ, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, निधि अग्रवाल, पंकज त्रिपाठी

रेटिंग: **

टाइगर श्रॉफ के लिए कोई भले न कहे कि नाच न जाने आंगन टेढ़ा मगर 'मुन्ना माइकल' लिखने वाले पर आपको पूरा संदेह होगा कि क्या उसे लेखन के गुर पता हैं? अनाथ बच्चे को पाल-पोस कर बड़ा करने वाले अकेले शराबी पिता के सत्तर-अस्सी के दशक वाले फार्मूले से फिल्म 1995 में शुरू होती है। आप हैरान होते है कि 21 की उम्र में किशोर से दिखने वाले मुन्ना माइकल का चेहरा पलक झपकते कैसे युवा टाइगर श्रॉफ में बदल गया?
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'मुन्ना माइकल' समीक्षा
बचपन से युवावस्था तक मुन्ना के रोल वाले ऐक्टरों की बेहद खराब कंटीन्यूटी से फिल्म शुरू होती है और फिर इसमें संतुलन नहीं दिखता। जैसे-जैसे कहानी बढ़ती है, तर्कहीन हो जाती है। मुंबई के किसी बार-रेस्तरां-डांसक्लब में मुन्ना की एंट्री इसलिए बैन हो जाती है कि वह लोगों से डांस की शर्त लगाता और जीतता है। मुंबई से निकल कर वह दिल्ली जाता है तो वहां भी यही करता है। यहीं वह जमीन कब्जाने का धंधा करने वाले महेंदर (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) के भाई (पंकज त्रिपाठी) को एक क्लब में पीट देता है।
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'मुन्ना माइकल' समीक्षा
महेंदर के सामने मुन्ना की पेशी होती है और महेंदर घुटनों पर आ जाता है क्योंकि उसे डांस सीखना है! क्यों...? क्योंकि वह एक क्लब में नाचने वाली मेरठ की डॉली (निधि अग्रवाल) को दिल दे बैठा है। 42 रनिंग महेंदर और 21 की डॉली के मिलन के लिए मुन्ना कोशिशें करता है मगर सब उल्टा हो जाता है। डॉली और मुन्ना प्यार में पड़ जाते हैं। जब देखो तब बीयर पीती रहने वाली डॉली का सपना है मुंबई जाकर टीवी के डांसिंग स्टार शो को जीतना, एक करोड़ रुपये कमाना और पिताजी को बताना कि घर से भाग कर उसने बुरा नहीं किया क्योंकि डांस खराब बात नहीं है। मुन्ना अब डॉली के सपनों को पूरा कराने में जुट जाता है। क्या डॉली के सपना सच होगा, क्या उसे मुन्ना के टैलेंट का राज पता चलेगा, क्या महेंदर को डॉली मिलेगी...? अगर आप ऐसे बेसिर-पैर के सवालों के जवाब जानना चाहें तो फिल्म देख सकते हैं।

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'मुन्ना माइकल' समीक्षा
माइकल जैक्सन को श्रद्धांजलि देने का दावा करने वाली फिल्म एमजे के फैन्स को भी पसंद नहीं आएगी। टाइगर के फैन्स फिल्म को देख कर उनसे दूरी महसूस करेंगे। हर फिल्म में झगड़ा, मारपीट और डांस करने वाले टाइगर को अब कुछ नया करने की जरूरत है। उनकी हर फिल्म एक जैसी दिखती है। एक जैसी फिल्मों के लिए बार-बार टिकट का खर्च और वक्त की बर्बादी कोई क्यों करे? निधि अग्रवाल डेब्यू फिल्म में खूबसूरत दिखी हैं। ऐक्टिंग का टैलेंट शायद आने वाली फिल्मों में दिखे। नवाजुद्दीन सिद्दिकी अपनी अभिनय प्रतिभा के बल पर किरदार को निभा तो ले जाते हैं परंतु महेंदर के रोल में वह पूरी तरह मिसफिट हैं। इसे आप उनके अब तक के करिअर के सबसे हास्यास्पद रोल में गिन सकते हैं।
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'मुन्ना माइकल' समीक्षा
घर चलाने के लिए बड़े बजट की फिल्म में दोयम दर्जे के रोल करने पड़ें तो पंकज त्रिपाठी जैसे ऐक्टर की मजबूरी समझ में आती है कि परंतु सुविधाजनक स्थिति में पहुंच चुके नवाज खूब जानते हैं कि क्या कर रहे हैं। शब्बीर खान का निर्देशन ढीला है और दूसरे हिस्से में कहानी तथा फिल्म समेत वह खुद फिसल गए हैं। 'मुन्ना माइकल' का कैमरा वर्क और दृश्य संयोजन बहुत खराब है। संगीत और गाने आपको कहीं से ऐसी फिल्म के नहीं लगते, जिसमें कहानी डांस के इर्द-गिर्द घूमती है। वक्त काटने के लिहाज से भी फिल्म भारी है। यह ऐसी फिल्म है जिसे टीवी पर चैनल बदल-बदल कर कभी देख लिया तो देख लिया। नहीं देखा तो भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
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