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बाइस्कोप: जूही के मना करने पर माधुरी ने की थी प्रकाश झा की ये फिल्म, गाड़े थे अदाकारी के ऊंचे झंडे

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मृत्युदंड - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
गीत गाता चल और अंखियों के झरोखे से जैसी राजश्री की सुपरहिट हिंदी फिल्में बनाने वाले बांग्ला निर्देशक हिरेन नाग की फिल्म अबोध से अपना डेब्यू करके माधुरी दीक्षित ने गौरी, बरखा, आनंदी, जानकी, चंदा, माया, कविता से लेकर नीला तक सब बनके देख लिया, लेकिन उनकी मोहिनी सूरत का जमाना असल में दीवाना तभी हुआ, जब वह मोहिनी बनीं। साल 1988 में मोहिनी के जादू ने सबको मोहना शुरू किया। राम लखन की राधा शास्त्री ने जब प्रेम प्रतिज्ञा की लक्ष्मी राव बनना स्वीकार किया तभी लोगों ने उन्हें ज्ञान देना शुरू कर दिया था, ‘ऐसे रोल करना ठीक नहीं। तुम कमर्शियल सिनेमा के लिए बनी हो। इस तरह के रोल मत करो।’ चार लोगों से मिलने वाला ये ज्ञान परिंदा और फिर मृत्युंदड तक आते आते तो माधुरी को हर रोज सुनने को मिलने लगा।
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मृत्युदंड - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
माधुरी एक तरफ तो हम आपके हैं कौन, साजन, दिल तो पागल है, बेटा और खलनायक में लोगों के दिल चुराती रहीं वहीं, लज्जा, मृत्युदंड, प्रेम प्रतिज्ञा और अंजाम जैसी फिल्मों में अपनी अदायगी का दूसरा रूप भी अपने चाहने वालों को दिखाती रहीं। माधुरी को जब भी अच्छी कहानी, अच्छे निर्देशक और अच्छा सेटअप मिला, उन्होंने कमाल कर दिखाया। दिल, बेटा, हम आपके हैं कौन और दिल तो पागल है के लिए मिले सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के उन्हें मिले चार फिल्मफेयर पुरस्कार उनकी इसी रणनीति पर मुहर भी लगाते हैं। माधुरी दीक्षित को एक दमदार अभिनेत्री के तौर पर फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित करने वाली फिल्म मृत्युदंड 1997 में 11 जुलाई को रिलीज हुई और यही फिल्म हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
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मृत्युदंड - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म मृत्युदंड में माधुरी के साथ थीं हिंदी सिनेमा में कला फिल्मों की अलमबरदार रहीं शबाना आजमी और अपनी गजगामिनी चाल के लिए चर्चित रहीं अभिनेत्री शिल्पा शिरोड़कर। फिल्म में उनके लिए हीरो भी अयूब खान रखे गए। फिल्म की खलनायक और सहायक अभिनेताओं की मंडली भी विशाल रही। ओम पुरी, मोहन जोशी, मोहन अगाशे, हरीश पटेल के अलावा फिल्म में स्थानीय कलाकारों की भी भरमार रही। प्रकाश झा की फिल्मों का पूरा तामझाम अकेले लेकर चलने वाले उनके असोसिएट डायरेक्टर अनिल अजिताभ ने इस फिल्म की कहानी से लेकर शॉट डिवीजन तक बहुत काम किया।

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मृत्युदंड - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बिहार के बिलासपुर गांव की कहानी कहती मृत्युदंड स्त्रियों के विरुद्ध होने वाले वैयक्तिक, सामाजिक, राजनीतिक और संस्थागत षडयंत्रों की कहानी है। खाकी, खादी और अपराधी का गठजोड़ कैसे पूरी एक पारंपरिक व्यवस्था को देश में तहस नहस कर चुका है, ये फिल्म मृत्युदंड बताती है। विनय और केतकी का हंसता खेलता संसार कैसे इस भ्रष्ट मकड़जाल में फंसकर अपनों का ही दुश्मन बन बैठता है, ये भी फिल्म तिरपत सिंह के किरदार के जरिए दिखाने की पूरी कोशिश करती है। भय को ही प्रीति का पर्याय समझ लेने वाली व्यवस्था के खिलाफ हौसला तानकर खड़ी होती है केतकी। रास्ता किसी अग्निपथ से कम नहीं होता और केतकी भी बताती है कि वह किसी विजय दीननाथ चौहान से कम जिगरे वाली नहीं है।
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मृत्युदंड - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
माधुरी दीक्षित ने मृत्युदंड उस दौर में की जिस दौर में हिंदी सिनेमा मसाला फिल्मों के अतिरेक के अजब ही दौर में था। साल 1997 वैसे तो हिंदी सिनेमा में दिल तो पागल है, बॉर्डर, इश्क, परिंदे, गुप्त, जिद्दी, हीरो नंबर वन, कोयला, जुदाई और दीवाना मस्ताना जैसी हिट फिल्मों के लिए ही याद किया जाता है। लेकिन, इसी साल रिलीज हुई फिल्म मृत्युदंड का जब जब जिक्र होगा, लोगों को याद आएंगे इस फिल्म के कलाकार और इसके मेकर्स। माधुरी पिछली बार मुझे फिल्म टोटल धमाल की रिलीज से पहले मिलीं तो बातों बातों में इस फिल्म का जिक्र निकल आया। माधुरी कहती हैं, “मेरे तो करियर की शुरुआत ही एक ऑफबीट फिल्म से हुई। मैंने इसीलिए अपने करियर में हर तरह की फिल्में की हैं। लोग कहते थे कि ये फिल्म मत करो, वो फिल्म मत करो लेकिन फिल्मों के चयन के मामले में मैं अपने दिल की सुनती हूं। फिल्म मृत्युंदड भी मेरे दिल के बेहद करीब की फिल्म है।”
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मृत्युदंड - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म मृत्युदंड बॉक्स ऑफिस पर बहुत कामयाब फिल्म नहीं मानी जाती है। कुछ लोगों ने तब इस फिल्म की मेरिट पर ही सवाल उठाने की कोशिश की थी। माधुरी कहती हैं, “हां, मृत्युदंड बहुत बड़ी हिट फिल्म भले नहीं रही हो लेकिन लोगों ने मुझे एक अलग सेटअप में पसंद किया। इसका फायदा ये हुआ कि दूसरी अभिनेत्रियों को भी अपने रूटीन वर्क से अलग हटकर कुछ करने का साहस मिला। मेरा तो यही मानना रहा है कि रिस्क लेने में कभी पीछे नहीं हटना चाहिए और कई बार रिस्क हम दूसरों के लिए भी लेते हैं। इसलिए भी लेते हैं कि उन लोगों को एक ठोस जवाब दे सकें, जो हमारी काबिलियत, हमारी मेहनत या हमारी हिम्मत पर प्रश्नचिन्ह लगाने को तैयार बैठे रहते हैं।”
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मृत्युदंड - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म रिलीज हुई तो माधुरी दीक्षित की इस फिल्म के लिए जमकर तारीफें हुईं। फिल्म को लंदन फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर के लिए आमंत्रित किया गया। देश में फिल्म को बंपर ओपनिंग भले न मिली हो परंतु सिनेमाघरों में दर्शकों की भीड़ लगातार कई हफ्तों तक इसे देखने के लिए जुटती रही। महाराष्ट्र सरकार ने फिल्म के विषय और माधुरी दीक्षित के किरदार के सम्मान में इसे टैक्स फ्री कर दिया था। फिल्म को जेनेवा फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट फिल्म का स्पेशल ज्यूरी अवॉर्ड मिला। बैंकॉक फिल्म फेस्टिवल में भी इसने बेस्ट फीचर फिल्म का ऑडियंस अवॉर्ड जीता। स्क्रीन फिल्म पुरस्कारों में फिल्म मृत्युदंड ने तीन पुरस्कार जीते। इन पुरस्कारों में माधुरी दीक्षित को मिला सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री पुरस्कार, शबाना आजमी को मिली सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री का पुरस्कार और मोहन जोशी को मिला नकारात्मक भूमिका में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार शामिल हैं। वही जी सिने पुरस्कारों में प्रकाश झा ने सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ संवाद लेखन के पुरस्कार जीते। जी सिने पुरस्कारों में मृत्युदंड को इसके बेहतरीन ध्वनि संयोजन के लिए भी पुरस्कार मिला।
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मृत्युदंड - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म बनी भी कमाल की थी और पता नहीं जो भी राजनीति रही हो लेकिन कम से कम माधुरी दीक्षित उस साल के फिल्मफेयर बेस्ट एक्टर फीमेल के अवॉर्ड की सौ फीसदी हकदार अगर थीं तो केतकी के इसी रोल के लिए। उन्हें उस साल ये पुरस्कार मिला भी लेकिन फिल्म दिल तो पागल है के लिए। फिल्मफेयर पुरस्कार कैसे तय होते हैं, ये ऋषि कपूर अपनी जीवनी में बहुत पहले बता चुके हैं। लेकिन, फिर भी आम जनता अब भी इस भ्रम मे रहती है कि सबसे पुराना निजी फिल्म पुरस्कार है तो कुछ तो इसकी वैल्यू होगी ही। लेकिन, चौंकाने वाली बात ये रही कि फिल्म मृत्युदंड को एक भी पुरस्कार के लिए उस साल नामित तक नहीं किया गया।

(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)

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