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Movie Review: नवाजुद्दीन की दमदार एक्टिंग लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट के तले दब जाती है 'मंटो'

Fri, 21 Sep 2018 10:41 AM IST
रवि बुले
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फिल्म समीक्षा: मंटो
निर्माताः विक्रांत बत्रा/अजित अंधारे
निर्देशकः नंदिता दास
सितारेः नवाजुद्दीन सिद्दिकी, रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन
रेटिंग: *1/2


वही हुआ जिसका मंटो को डर था। उन्होंने लिखा था कि हो सकता है, सआदत हसन मर जाए और मंटो जिंदा रहे। आज मंटो जिंदा है। सआदत हसन मर गया। मंटो अपने अफसानों में अमर है मगर कुछ लोग उन्हें पूरा पढ़ने-समझने के बजाय उन चुनिंदा ‘बदनाम कहानियों’ में ढूंढ रहे हैं, जो अंगुलियों पर गिनी जाती हैं। निर्माता-निर्देशक नंदिता दास ने भी फिल्म मंटो में यही शॉर्टकट अपनाया। आप मंटो से परिचित हैं, उनकी कहानियां पढ़ी हैं तो नंदिता की फिल्म काम की नहीं और मंटो की कहानियां आपने नहीं पढ़ीं तो नंदिता की फिल्म से कुछ हासिल नहीं होगा क्योंकि यह सतही है। बेहतर है कि मंटो को उनके लिखे हुए में देखें, समझें, महसूस करें। अधकचरी फिल्मों में नहीं।
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नंदिता की कमजोर स्क्रिप्ट मंटो की जिंदगी का ऊपरी खाका ही खींचती है कि वह कैसे मुंबई की फिल्मी दुनिया से जुड़े थे। 1940 के दशक के दिग्गज अशोक कुमार, के.आसिफ, नौशाद, नर्गिस की मां जद्दनबाई से लेकर अभिनेता श्याम तक उनके दोस्त-परिचितों के दायरे में थे। नंदिता ने मुंबई में मंटो की गृहस्थी से लेकर इस्मत चुगताई और कृष्ण चंदर के साथ उनकी बहसें-मतभेद दिखाने की कोशिश की परंतु यह हिस्सा अनाकर्षक है। फिल्म का दूसरा हिस्सा वह है जब देश की आजादी के साथ हुए विभाजन पर मंटो पाकिस्तान चले गए। लाहौर में रहने लगे। 
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मंटो की कहानियों पर मुंबई में रहते हुए भी अश्लीलता के मुकदमे चले और पाकिस्तान में लिखी खोल दो और ठंडा गोश्त जैसी कहानियां, वहां के निजाम के बर्दाश्त के बाहर हो गईं। आर्थिक तंगी, साहित्यिक दायरों में आलोचना, अलग-थलग पड़ने और मुकदमेबाजी ने मंटो को तनावग्रस्त करके शराबी बना दिया। नतीजा यह कि वह धीरे-धीरे खत्म होने लगे। नंदिता ने ठंडा गोश्त के मुकदमे को आधार बनाकर मंटो से अश्लीलता के आरोपों के जवाब दिलवाए। मंटो का कहना था कि अगर उनके अफसाने नाकाबिल-ए-बर्दाश्त हैं तो इसका यह मतलब है कि जो समाज में हो रहा है, वह भी बर्दाश्त के काबिल नहीं। इस बात ने उनके हजारों दुश्मन बनाए। 

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नंदिता की फिल्म में मंटो के भीतर की दुनिया, लेखकीय द्वंद्व और संघर्ष स्पष्ट नहीं होते। उनकी वैचारिकता भाषणों में आती है और मंटो द्वारा पेश की जा रही सफाई जैसी लगती है। जो मंटो समाज को कठघरे में खड़ा करते रहे, नंदिता के यहां वह खुद कठघरे में खड़े हैं। फिल्म मंटो की मजबूत शख्सियत से न्याय नहीं करती। मंटो आपको प्रिय हैं तो फिल्म दुख देगी। दस रुपये का नोट, सौ वाट का बल्ब, खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेक सिंह जैसी प्रभावशाली कहानियों को नंदिता ने जिस तरह अपनी स्क्रिप्ट में ‘लघु कथाएं’ बना डाला, वह सवाल खड़े करता है कि उन्होंने इन्हें शिद्दत से महसूस भी किया होगा? जो मंटो से अपरिचित हैं, वे फिल्म को देखकर इन कहानियों की धार को जान ही नहीं पाएंगे। जिन पाठकों ने इन कहानियों को जीया है, वे नंदिता के इस बर्ताव से सिहर उठेंगे। 
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नंदिता कुछेक सेट और कैमरे-कंप्यूटर की मदद से मंटो के दौर को पर्दे पर उतार सकीं परंतु वह उस माहौल की भयावहता को सामने लाने में पूरी तरह से नाकाम हैं, जिसने मंटो को हिला दिया। फिल्म का सकारात्मक पक्ष नवाजुद्दीन सिद्दीकी और रसिका दुग्गल हैं। नवाज मंटो के किरदार में उतर गए। मंटो की आत्मा को उन्होंने कितना जीया, वही बता सकते हैं। परंतु पर्दे पर अपनी तरफ से कोई कसर बाकी नहीं रखी। मंटो की पत्नी के रूप में रसिका दुग्गल भी किरदार में ढली हुई हैं। अच्छे अभिनेताओं के बावजूद नंदिता मंटो की जिंदगी अफसाने से न्याय नहीं कर पातीं। 
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