नंदिता की फिल्म में मंटो के भीतर की दुनिया, लेखकीय द्वंद्व और संघर्ष स्पष्ट नहीं होते। उनकी वैचारिकता भाषणों में आती है और मंटो द्वारा पेश की जा रही सफाई जैसी लगती है। जो मंटो समाज को कठघरे में खड़ा करते रहे, नंदिता के यहां वह खुद कठघरे में खड़े हैं। फिल्म मंटो की मजबूत शख्सियत से न्याय नहीं करती। मंटो आपको प्रिय हैं तो फिल्म दुख देगी। दस रुपये का नोट, सौ वाट का बल्ब, खोल दो, ठंडा गोश्त और टोबा टेक सिंह जैसी प्रभावशाली कहानियों को नंदिता ने जिस तरह अपनी स्क्रिप्ट में ‘लघु कथाएं’ बना डाला, वह सवाल खड़े करता है कि उन्होंने इन्हें शिद्दत से महसूस भी किया होगा? जो मंटो से अपरिचित हैं, वे फिल्म को देखकर इन कहानियों की धार को जान ही नहीं पाएंगे। जिन पाठकों ने इन कहानियों को जीया है, वे नंदिता के इस बर्ताव से सिहर उठेंगे।