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Halahal Eros Now Review: सचिन खेडेकर व बरुन सोबती की कमाल की अदाकारी पर क्लाइमेक्स ने फेर दिया पानी

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फिल्म- हलाहल - फोटो : फोटो ग्राफिक्स- रोहित झा
Movie Review: हलाहल
कलाकार: सचिन खेडेकर, बरुण सोबती, मनु ऋषि चड्ढा, चेतन शर्मा, एनाब किजरा, अनुराधा मुखर्जी, हुरमत अली खान आदि।
निर्देशक: रणदीप झा
ओटीटी: इरॉस नाउ
रेटिंग: **1/2


‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ से लाइमलाइट में आए लेखक, अभिनेता, निर्देशक, निर्माता जीशान कादरी ने अपनी नई फिल्म ‘हलाहल’ में गाजियाबाद को परदे पर चमका दिया है। इंदिरापुरम से निकलने वाली एलीवेटेड रोड के नीचे का सन्नाटा शुरू से पूरा फिल्मी रहा है और इसे किसी फिल्म में देखना वाकई रोचक है। फिल्म में दमदार अभिनय है, बढ़िया कैमरावर्क है, गालियों वाले संवाद हैं और पटकथा? इस पर भी चर्चा करते हैं, थोड़ा आराम से। आखिर जो बात मैंने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के बारे में फिल्म की रिलीज के समय कही थी, उसे मानने में अनुराग कश्यप को भी आठ साल लगे हैं।
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फिल्म- हलाहल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सिनेमा दर्शकों का माध्यम है। स्वांत: सुखाय के लिए भी तमाम निर्माता निर्देशक फिल्में बनाते हैं। उनका अपना एक अलग तरह का आत्मविश्वास (कनविक्शन) ऐसी फिल्मों पर होता है। वह जिन इलाकों से आते हैं, वहां ऐसी बातें खूब होती है। हर दूसरे वाक्य में जब तक गाली न दी जाए, उत्तर प्रदेश क्या देश विदेश की तमाम जगहों पर बात पूरी नहीं हो पाती। कहानियां हकीकत के जितनी ज्यादा करीब हो, उतनी लुभाती हैं। लेकिन ऐसा करते समय वह शेर याद रखना बहुत जरूरी है, ‘हर हसीं मंज़र से यारों फासले कायम रखो, चांद जो धरती पे उतरा देख के डर जाओगे..।’ फिल्म ‘हलाहल’ शुरुआत से ही अपने नाम का मतलब साधने के लिए मंथन करती दिखती है, इस मंथन में हलाहल निकलता भी है, लेकिन...!
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फिल्म- हलाहल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
लेकिन, फिल्म ‘हलाहल’ का मंथन आखिर तक आते आते कमजोर पड़ जाता है। मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले की तर्ज पर उत्तर प्रदेश का एक मेडिकल सीट घोटाला जीशान कादरी ने इसकी कहानी में बुना है। हीरो और विलेन की इस कहानी की दिक्कत ये है कि फिल्म खत्म होते होते कोई हीरो बचता ही नहीं, सबके सब जमाने के रंग में रंग जाते हैं। कहानी है एक डॉक्टर की डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही अपनी बेटी की मौत की असलियत का पता लगाने की। डॉक्टर जितनी ज्यादा कोशिशें करता है, हमारे आसपास घट रही चीजों की असलियत उतनी ही साफ होकर सामने आने लगती है। कहानी शुरू में जो रफ्तार पकड़ती है, उसमें थ्रिलर की बुनावट है। फिर सस्पेंस भी आता है लेकिन क्लाइमेक्स ने कहानी का कचरा कर दिया है।

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फिल्म- हलाहल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘हलाहल’ देखने की सिर्फ और सिर्फ एक वजह हो सकती है और वह है इसके दोनों मुख्य कलाकारों सचिन खेडेकर और बरुन सोबती का अभिनय। सचिन खेडेकर तो खैर हैं ही कमाल के अभिनेता। उन्होंने अपने लंबे करियर में अदाकारी लगातार बोई है, ओटीटी के आने से अब उनके जैसे अभिनेताओं के लिए फसल काटने का समय आया है। एक पिता का दर्द, भूमाफिया से भिड़ने का जज्बा, अपने ही धंधे के लोगों के किरदार पर सवालिया निशान लगाता डॉक्टर और फिर बेटी की असलियत सामने आने पर घुटनों के बल आ गया इंसान, सब कमाल का है। सचिन खेडेकर के समानांतर ही चलता है बरुन सोबती का किरदार। रुआबदार मूंछें, चेहरे से झलकता कमीनापन, हर काम में सिर्फ पैसे का लालच और अपने सीनियर से भिड़ जाने का रोमांच, जीशान कादरी ने ये किरदार भी कमाल का गढ़ा है। बस, उन्हें ये समझना जरूरी है कि एक तो आईपीएस जैसी किसी पढ़ाई में फीस नहीं देनी होती है और दरोगा बनने के लिए आईपीएस पास करना तो कतई जरूरी नहीं है। फिल्म में मनु ऋषि चड्डा का रोल छोटा है पर अभिनय फिर भी उनका चमककर बाहर निकला है।
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फिल्म- हलाहल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘हलाहल’ की कमजोर कड़ियों में सबसे अहम है इसका बैकग्राउंड संगीत। अच्छा है कि फिल्म में कोई गाना नहीं है। ऐसी फिल्मों के लिए बैकग्राउंड म्यूजिक किसी किरदार की तरह काम करता है, इस पर फिल्म के निर्देशक रणदीप झा को ध्यान देने की जरूरत थी। निर्देशन के हिसाब से रणदीप ने काम बहुत अच्छा किया है। फिल्म के दोनों लीड एक्टर्स की अदाकारी के बाद रणदीप के खाते में ही इस फिल्म के नंबर जुड़ने वाले हैं, बस गलती उनसे वही हुई जो कबीर कौशिक ने अपनी फिल्म ‘सहर’ में की थी। इतना ‘आउट ऑफ बॉक्स’ क्लाइमेक्स हिंदी सिनेमा के दर्शकों को समझने में अभी 10-20 साल और लगने वाले हैं। सिनेमैटोग्राफी और फिल्म की एडीटिंग ठीक ठाक है। घर से दफ्तर आते जाते समय या खाली टाइम पास करने के लिए फिल्म देखी जा सकती है, लेकिन स्क्रिप्ट पर अगर थोड़ी मेहनत और की गई होती तो फिल्म का नतीजा कमाल हो सकता था।

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