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बाइस्कोप: इरफान की नजरों के खेल का ये था पहला ‘हासिल’, मनोज बाजपेयी ने इसलिए ठुकरा दिया था रोल

Sat, 16 May 2020 09:05 PM IST
shrilata biswas पंकज शुक्ल, मुंबई
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हासिल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हिंदी सिनेमा शुरू से गोलबंदी वाला सिनेमा रहा है। गोल वह लक्ष्य वाला नहीं। वैसी गोलबंदी जैसी गांव, कस्बों के लड़के स्कूल कॉलेज जाते समय करते हैं। जैसी हम लोग कल्याणी नदी किनारे बसे गांव मझेरिया कलां से फतेहपुर चौरासी पढ़ने आते समय किया करते थे। ये गोलबंदी ऐसी है जिसमें दूसरे गोल वालों की एंट्री नहीं है। अनुराग कश्यप जैसे फिल्मकारों ने कोशिश की अपना गोल छोड़ के दूसरे गोलवालों के साथ मेलजोल बढ़ाने की, लेकिन इस चक्कर में वह अपने ट्रेडमार्क सिनेमा की ब्रांडिंग गंवा बैठे। मुंबइया सिनेमा में साउथ बंबई वाला गोल कभी आराम नगर वालों का न हुआ और आरामनगर वालों ने भी कभी साउथ बंबई वालों को भाव नहीं दिया। हां, ये अलग बात है कि इस गोलबंदी के चक्कर में ‘हासिल’ से लेकर अब तक अच्छे सिनेमा की बेकदरी खूब हुई है।
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हासिल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हासिल रिलीज हुई 16 मई 2003 को। तिग्मांशु धूलिया, विशाल भारद्वाज, अनुभव सिन्हा और अनुराग कश्यप ये सब उस गोल के फिल्मकार हैं जिनके सिनेमा को लेकर फिल्म समीक्षकों की भी खूब गोलबंदी होती रही। तरण आदर्श ने इस फिल्म को अपने रिव्यू में दो स्टार दिए। रेडिफ ने लिखा कि ये हर किसी का सिनेमा नहीं है वगैरह वगैरह। हिंदी सिनेमा में तमाम ऐसी फिल्में हुई हैं जो अपनी रिलीज के वक्त तो फ्लॉप हुईं, लेकिन दर्शकों की अगली पीढ़ी ने इन्हीं फिल्मों को सिर आंखों पर रखा। ‘मेरा नाम जोकर’ के समय के दर्शकों को ‘बॉबी’ जैसी फिल्म चाहिए थी। ‘रहना है तेरे दिल में’ के साल में लोगों को ‘गदर एक प्रेम कथा’ में रस मिला और ‘हासिल के समय लोगों को ‘कोई मिल गया’ अच्छी लगी। समय का पहिया घूमता रहता है। इरफान का पहिया भी इसी फिल्म से घूमना शुरू हुआ। किसे पता था कि जिस कलाकार की फिल्म को कभी कोई रिलीज करने को तैयार नहीं होगा, उसके पीछे एक दिन निर्माताओं की लाइन लगी रहेगी।
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हासिल - फोटो : फाइल
फिल्म ‘हासिल’ एक शानदार निर्देशक और एक शानदार अभिनेता दोनों के लिए लिटमस टेस्ट सरीखी फिल्म थी। तिग्मांशु की पढ़ाई लिखाई इलाहाबाद की हुई। वहां की गलियों में सरकती बोली वह अच्छा पकड़ते थे। पिता इलाहाबाद हाईकोर्ट में जज थे। बंबई में वह बैंडिट क्वीन और वॉरियर जैसी फिल्मों की कास्टिंग कर चुके थे। टीवी पर बड़ा नाम था उन दिनों तिगमांशु धूलिया का। तिगमांशु भौकाली फिल्मकार हैं। अपने गोल के बाकी फिल्मकारों जैसे। इन दिनों थोड़ा शंटिंग लाइन पर है नहीं तो उनकी रेलगाड़ी पैसेंजर ट्रेन वाली लाइन पर भी बुलेट ट्रेन सरीखी दौड़ी है। ‘हासिल’ उनकी अपनी लिखी फिल्म है। इलाहाबाद में बिताए दिनों से संजीवनी पाने वाली इस फिल्म की कहानी ऐसी है कि एक बार आप फिल्म देखना शुरू करें तो फिर आखिर तक ब्रेक नहीं लेंगे लेकिन इसे बनाने में तमाम स्पीड ब्रेकर आए।

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तिग्मांशु धूलिया, इरफान - फोटो : फाइल
तिग्मांशु का इस फिल्म को लेकर बॉबी बेदी वाला किस्सा इसमें सबसे रोचक किस्सा भी है और सबसे बड़ा स्पीडब्रेकर भी। शेखर कपूर को लेकर ‘बैंडिट क्वीन’, दीपा मेहता को लेकर ‘फायर’, शाद अली को लेकर ‘साथिया’, विशाल भारद्वाज को लेकर ‘मकबूल’ और केतन मेहता को लेकर ‘मंगल पांडे’ बनाने वाले बॉबी बेदी के साथ तिग्मांशु धूलिया उनकी दूसरी फिल्म ‘इलेक्ट्रिक मून’ के समय से रहे। तिग्मांशु ने उनके लिए टीवी पर काफी काम भी किया लेकिन बॉबी बेदी ने वादे के बाद भी ‘हासिल’ में पैसा नहीं लगाया। फिल्म के लिए पैसा जुटाने में तिग्मांशु को जो मेहनत करनी पड़ी, उसकी खटास उनके सिनेमा में बरसों तक झलकती रही। फिल्म में इरफान का जो गुस्सा और जो तेवर है, वही इस फिल्म की असली आंच है और ये आंच है एक ऐसे फिल्मकार की भी जिसमें सिनेमा की भूख दिखती है। तिग्मांशु अब खाए अघाए फिल्मकार हैं। अभिनय में भी तल्लीन हैं। ओटीटी पर भी सक्रिय हैं लेकिन हासिल को अब भी नहीं भूले हैं। फिल्म की सालगिरह पर इरफान को याद करते हुए वह बताते हैं कि कैसे फिल्म का शीर्षक उनको इरफान के किराए वाले फ्लैट पर ही चमका था।
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इरफान, तिग्मांशु - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
चमका तो इरफान खान का नाम भी इसी फिल्म से था। बेस्ट विलेन का अवॉर्ड दिलाने वाली फिल्म हासिल हिंदी सिनेमा में इरफान का असली टेक ऑफ रहा। टेक ऑफ इसलिए क्योंकि इससे पहले वह करीब दो दर्जन बार पर्दे पर तो दिख चुके थे लेकिन उनके करियर का प्लेन उड़ नहीं पा रहा था। अजब सा चेहरा, गजब सी आंखें लिए इरफान को कोई हीरो मटेरियल मानता नहीं था और यहां तक कि फिल्म बन जाने के बाद भी इसे रिलीज करने में तिग्मांशु के तोते उड़ गए थे। ये फिल्म उन गिनी चुनी फिल्मों में शामिल है जिसकी शूटिंग रिवर्स सीक्वेंस में शुरू हुई। यानी पहले क्लाइमेक्स फिर बाकी की फिल्म लेकिन यहां क्लाइमेक्स की शूटिंग पहले करना निर्देशक की मजबूरी थी क्योंकि इलाहाबाद का कुंभ खत्म होने वाला था और प्रोड्यूसर कोई मिल नहीं रहा था। तिग्मांशु ने क्राउड फंडिंग के जरिए थोड़ा बहुत पैसा जुटाया और इसका क्लाइमेक्स शूट कर डाला। इस क्लाइमेक्स को एडिट करके उन्होंने इसे फिल्म की शो रील बनाया और तमाम निर्माताओं को दिखाया। जब सब कुछ हो गया और तिग्मांशु फिल्म शूट करने इलाहाबाद पहुंचे तो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के छात्र नेताओं ने उन्हें वहां फिल्म ही नहीं शूट करने दी। तो जो इलाहाबाद यूनीवर्सिटी आपको फिल्म में दिखती है वह दरअसल पुणे और मुंबई की ऐसी लोकेशंस बताई जाती हैं जिन्हें तिगमांशू ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी जैसा दिखा दिया है।
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मनोज बाजपेयी - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म ‘हासिल’ में इरफान का जो रोल है, वह तमाम अभिनेताओं के लिए ड्रीम रोल हो सकता है लेकिन मनोज बाजपेयी ने ये रोल करने से तब मना कर दिया था। वह डर गए थे कि कहीं वह विलेन के खांचे में ही फंसकर न रह जाएं। ‘सत्या’ के भीखू म्हात्रे ने उन्हें सुपरस्टार बना दिया था और इरादा उनका तब शाहरुख खान को टक्कर देने का हो चला था। तो मनोज जब ‘घात’, ‘दिल पे मत ले यार’ और ‘जुबैदा’ जैसी फिल्मों में मन लगा रहे थे, तिग्मांशु अपनी फिल्म की कास्टिंग पूरी करने में दिन रात एक कर रहे थे। मनोज बाजपेयी की इसके बाद आई ‘अक्स’, ‘जुबैदा’, ‘रोड’, ‘पिंजर’ सब लाइन से फ्लॉप हुईं। इधर तिग्मांशु की फिल्म ‘हासिल’ जब अमिताभ बच्चन, अनिल कपूर, प्रीति जिंटा की फिल्म ‘अरमान’ और रवीना टंडन की फिल्म ‘स्टम्प्ड’ के सामने रिलीज हुई तो वो भी फ्लॉप रही लेकिन इरफान लोगों की आंखों में अटक गए। वह कहते भी हैं इस फिल्म में एक जगह, “नजर का ही तो खेल है साब, वरना साला दिल तो हमारा भी साफ है। भगवान ने हमें ऐसी आखें दे दी हैं, क्या करें?”
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तिम्मांशू धूलिया और दोस्तों के साथ इरफान पठान - फोटो : अमर उजाला
जिन बॉबी बेदी ने इरफान के नाम पर तिग्मांशु की ‘हासिल’ में पैसा लगाने से इंकार कर दिया था, उन्होंने ही विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ प्रोड्यूस की। फिल्म ‘मकबूल’ में पंकज कपूर जैसे दिग्गज कलाकार के रहते हुए इरफान ने पूरी फिल्म अपने नाम करने का करिश्मा कर दिखाया। ये करिश्मा बीते महीने के आखिरी दिनों तक सिनेमा के साथ रहा और फिर फुर्र करके चला गया वहां जहां पूरी दुनिया ही बस एक सिनेमा भर है। शो चलता रहता है। इंसान आता जाता रहता है। तिग्मांशु ने ‘हासिल’ के बाद इरफान के साथ ‘साहब, बीवी और गैंगस्टर रिटर्न्स’ में नाम कमाया। फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ ने नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में बेस्ट फिल्म का खिताब पाया। बतौर निर्देशक उनकी आखिरी फिल्म मिलन टॉकीज पिछले साल रिलीज हुई। निर्देशक की बजाय बतौर अभिनेता वह इन दिनों ज्यादा सक्रिय हैं। पर्दे से उनका नाता भी पहले पहल बतौर अभिनेता ही जुड़ा था।

(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)

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