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Film Review Simmba:रणवीर सिंह की एनर्जी से रोहित शेट्टी का बेड़ा पार

Fri, 28 Dec 2018 02:07 PM IST
शशांक गौर मनोरंजन डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
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फिल्म रिव्यू- सिम्बा
कलाकार – अजय देवगन, रणवीर सिंह, सारा अली खान, सोनू सूद
निर्देशक – रोहित शेट्टी
रेटिंग - **1/2

अभिनेता के तौर पर देखें तो रिस्क लेने का जितना माद्दा नई पीढ़ी के कलाकारों मे दिख रहा है, वही साल 2018 की सिनेमा की सबसे बड़ी जीत है। एक ही साल में रणवीर सिंह का अलाउद्दीन खिलजी से लेकर संग्राम भालेराव तक का सफर ही बदलते सिनेमा की निशानी है। आयुष्मान खुराना, राजकुमार राव और रणवीर सिंह की कामयाबी ये भी बताती है कि सही कहानी और सही निर्देशन ही भविष्य का सिनेमा है।

 
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रोहित शेट्टी की फिल्म सिम्बा उनके अपने ही रचे सिंघम के संसार को आगे बढ़ाती है। लेकिन, इस संसार में सिंघम को देखकर बड़ी हुई पीढ़ी का नया चेहरा है। ये चेहरा ऐशो आराम की जिंदगी जीना चाहता है। सिंघम के ईमान में इसलिए दम था क्योंकि उसकी जरूरतें कम थीं। सिम्बा काइयां है। वह अपने आसपास की जरायम की दुनिया में हिस्सेदारी चाहता है। हिस्सा उसको मिलता भी है लेकिन बेइज्जती के साथ। फिर हिंदी सिनेमा के टिपिकल फॉर्मूले की फिल्म में एंट्री होती है। सिंघम भी कहानी में आता है। सिम्बा को जिंदगी के सबक मिलते हैं। और, वह विलेन को हराकर हीरो बन जाता है।

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निर्देशन के लिहाज से देखें तो रोहित शेट्टी ने अपने आसपास एक ऐसा आवरण तैयार कर लिया है जो उनके लिए कंफर्ट जोन का काम करता है। फिल्में उनकी इसलिए हिट हो जाती हैं क्योंकि वह अपनी हर फिल्म में हर मसाले का बहुत संतुलित मात्रा में प्रयोग करते हैं। नाममात्र की कहानी में स्टाइल, ऐक्शन और पार्टी डांस नबर्स, साथ में चरित्र अभिनेताओं की एक लंबी फौज। रोहित शेट्टी की हर फिल्म का यही स्टाइल रहा है। बतौर निर्माता रोहित को ये पैसा भी खूब देता है। लेकिन, बतौर निर्देशक वह एक ही जगह जमकर खड़े हैं। आगे बढ़ नहीं रहे या आगे बढ़ना ही नहीं चाहते। अदाकारी के मामले में रणवीर सिंह सब पर भारी हैं। यहां तक कि जब फ्रेम में वह अजय देवगन के साथ होते है तो भी इक्कीस ही नजर आते हैं।

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सारा अली खान के लिए जरूर ये फिल्म उनके करियर को आगे बढ़ाने के लिहाज से कुछ नहीं देती। वह सजावटी गुड़िया से आगे कुछ कर नहीं पातीं और कई बार तो फिल्म में दूसरे महिला किरदार उनके किरदार पर हावी हो जाते हैं। फिल्म का प्लस प्वाइंट है सोनू सूद का किरदार। साउथ की तमाम फिल्मों में सोनू सूद बतौर विलेन अपना जलवा दिखा चुके हैं। छेदी सिंह से दूर्वा रानाडे तक का सफर सोनू सूद ने बहुत ही सलीके से तय किया है। सिद्धार्थ जाधव का काम भी अच्छा है।
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सिम्बा की कमजोर कड़ी है इसका संगीत। आंख मारे जैसा गाना फिल्म को हाइप तो दिला सकता है लेकिन फिल्म की कहानी को ये न आगे बढ़ाता है और न ही इसके किसी किरदार को मजबूती देता है। तनिष्क बागची ये है कि उनके पास मौलिक धुनें बनाने का वक्त नहीं है औऱ रेफरेंस लेकर जब भी वह काम करते हैं, पकड़े जाते हैं। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी के लिए जोमोन टी जॉन को पूरे नंबर मिलते हैं, हालांकि बंटी नागी का संपादन उतना चुस्त नहीं है। इंटरवल के बाद फिल्म की एडिटिंग थोड़ी और चुस्त हो सकती थी। अगर आप रणवीर सिंह के फैन हैं ये आपके लिए अच्छा टाइमपास हो सकती है, लेकिन अगर आपको अंधाधुन, स्त्री या बधाई हो जैसी फिल्में अच्छी लगती है तो ये फिल्म आपको कहीं कहीं बोर कर सकती है। अमर उजाला डॉट कॉम के रिव्यू में सिम्बा को मिलते हैं – ढाई स्टार।
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