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Choked Review: 56 इंची फैसले पर अनुराग की बढ़िया सिनेमाई टिप्पणी, पहली फुर्सत मिलते ही देखिए फिल्म

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चोक्ड - फोटो : अमर उजाला
Movie Review: Choked: पैसा बोलता है
कलाकार: सयामी खेर, रोशन मैथ्यू, अमृता सुभाष, राजश्री देशपांडे आदि
निर्देशक: अनुराग कश्यप
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: ****

देश में इमरजेंसी के समय बनी दो फिल्में आज मुझे बहुत याद आ रही हैं। एक थी अमृत नाहटा की फिल्म ‘किस्सा कुर्सी का’ और दूसरी आई एस जौहर की फिल्म ‘नसबंदी’। इंदिरा गांधी जैसी सशक्त प्रधानमंत्री और उनका संजय गांधी जैसा बेटा जो फिल्म वालों को चुन चुन कर निशाने पर ले रहा था, उस दौर में सिनेमा के जरिए समाज को प्रभावित करने वाली राजनीति पर ऐसी फिल्में बनाना 56 इंची सीने का ही काम रहा। वैसा ही काम, अनुराग कश्यप ने किया है नोटबंदी पर ये फिल्म बनाकर। फिल्म हालांकि जब तक आई तब तक नोटबंदी से लोग उबरकर लॉकडाउन में आ फंसे हैं लेकिन ये भी सच है कि अनुराग कश्यप से समाज से सीधे जुड़े ऐसे सिनेमा की उम्मीद थी नहीं जिसमें कि न एक भी गाली हो और न ही एक भी सेक्स सीन।
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चोक्ड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
गैंग्स ऑफ वासेपुर सीरीज की फिल्मों के बाद से अपने ही सिर पर हाथ रखकर नाचते रहे अनुराग कश्यप अब अपने उस खोल से बाहर आने लगे हैं जिसमें खुद उन्होंने अपने आप को कैद कर लिया था। वह मानते भी हैं कि उन्होंने फिल्म की रिलीज के महीनों पहले से अपनी फिल्मों के दबाव में रहकर भी अपना सिनेमा खराब किया। अब वह फैन ब्वॉय जर्नलिज्म के अपने चारों तरफ बने घेरे से भी बाहर निकल रहे हैं। अपने भीतर के उस बचपने को भी वह अब अपने लिए संभाल रहे हैं, जिसके चलते दूसरों को वह आत्मिक कष्ट देते रहे। अनुराग की ये फिल्म उनके जीवन में कल्कि केकलां के बाद आईं शुभ्रा शेट्टी को समर्पित है। जीवन से उनका ये नया अनुराग ही उनके सिनेमा को सपनों से निकालकर हकीकत के करीब ले आया है।
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चोक्ड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
चोक्ड देखते समय मुझे वह अनुराग बार बार याद आता रहा जिससे मैं दिल्ली में महादेव रोड स्थित फिल्म्स डिवीजन ऑडीटोरियम के फुटपाथ पर मिला था। मनोज बाजपेयी की शूल देखकर निकले थे शायद हम लोग। तब अनुराग के भीतर सिनेमा को समाज की आंखों से देखने की जिद थी। ये जिद बाद में विदेशी सिनेमा से हुए उनके अफेयर के चलते कहीं पीछे छूट गई। चोक्ड में अनुराग की आखों की वह चमक फिर दिखती है। उनकी इस फिल्म की कहानी उनकी अपनी लिखी नहीं है, ये भी इस फिल्म का प्लस प्वाइंट ही है। अनुराग की मानें तो निहित भावे ने सात आठ साल पहले ये कहानी लिखी, ये लिखी किसी और मकसद से गई लेकिन इसमें नोटबंदी का छौंका मार अनुराग ने इसे एक सरकारी फैसले के संदर्भ में ऐतिहासिक दस्तावेज बना दिया है।

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चोक्ड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
चोक्ड जैसे हालात देश के उन तमाम परिवारों के रहे हैं जिनके घर में एक बेरोजगार पति है। एक स्कूल जाने वाला बच्चा है। एक घर चलाने वाली महिला है जो दिन भर दफ्तर में खटती है और सुबह शाम घर का कचरा साफ करती है। कचरे में पड़े रहने वाले ‘आलू अप्पा’ जैसे लोगों का पेट भी भरती है। फिल्म का सबसे अहम इशारा इस बात की तरफ भी है कि नोटबंदी का असर जैसा सोचा गया था वैसा हुआ नहीं। काले धन की पुड़िया बांधकर गटर में छुपाने वालों के पास नोटबंदी से पहले भी अथाह पैसा था, और नोटबंदी हुई तो वे उसे बदलकर नए नोट भी उतने ही ले आए। बस, दोनों के बीच कुछ हुआ तो वह रहा ऐसे लोगों का लुंगी डांस जो अपने नेता के फैसलों का चरम आनंद (यूफोरिया) लेने के लिए झट सड़क पर थाली लेकर बारात की शक्ल में निकल आते हैं।
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चोक्ड - फोटो : सोशल मीडिया
पता नहीं ये फिल्म सिनेमाघरों मे रिलीज होने के लिए बनती तो प्रसून जोशी वाला सेंसर बोर्ड इसके साथ क्या करता लेकिन ये तो तय है कि ये इसी शक्ल में रिलीज नहीं हो पाती। ये फिल्म अदाकारी का एक नया कैनवास भी खींचती है। अनुराग के सिनेमा में महिला चरित्रों को अपने आसपास के समाज को रौंदकर अपना सशक्तिकरण जताने की आदत रही है। सरिता (सयामी खेर) भी वही करती है लेकिन उनके तेवर अलग हैं। काउंटर पर खड़ा ग्राहक उसे छेड़ता है तो वह उसकी बोलती बंद करती है और पति को उधार देने वाला उस पर रुआब जमाना चाहता है तो वह उसके तोते भी उड़ाती है। पति से उसे प्यार है पर बिस्तर पर उसकी अपनी ही चलती है।
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चोक्ड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अदाकारी के लिहाज से ये फिल्म सयामी खेर के लिए एक ऐसा शो पीस है जिसे वह पूरी जिंदगी सबके सामने सजाकर रखना चाहेंगी। मिडिल क्लास लोगों के ऐसे किरदार कम लिखे जाते हैं हिंदी सिनेमा में और उन्हें उतनी ही शिद्दत से निभाना कलाकारों की अब प्राथमिकता तो है, लेकिन गटर में हाथ डालने से वे भी बचती हैं। अमृता सुभाष यहां नवाजुद्दीन सिद्दीकी के फीमेल वर्जन के तौर पर हैं। और, नवाजुद्दीन से बेहतर अभिनय करने में कामयाब रहती हैं। रोशन मैथ्यू समेत बाकी कलाकारों ने भी फिल्म को अच्छा सपोर्ट किया है।
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चोक्ड - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म की तकनीकी टीम में दो लोगों का उल्लेख यहां जरूरी है। पहला तो फिल्म के सिनेमैटोग्राफर सिल्वेस्टर फोनसेका, जिन्होंने कैमरे के ऐसे ऐसे कोण इजाद किए हैं कि दर्शक कहानी शुरू होते ही खुद को कहानी का हिस्सा बना लेता है। फिल्म मुंबई के एक मिडिल क्लास घर में भले शूट हुई हो लेकिन चूंकि घर का एक सेट बनाकर इसे शूट किया गया है सो सिल्वेस्टर को सहूलियत रही फ्रिज के प्वाइंट ऑफ व्यू से भी सरिता का चेहरा दिखाने की! कर्ष काले का संगीत फिल्म का मूड सेट करने में अनुराग की सौ फीसदी मदद करता है। उत्कर्ष से सिर्फ कर्ष रह गए ब्रिटिश बॉर्न काले ने फिल्म की संवेदनाओं को समझा और उसके हिसाब से ही तबला दौड़ाया है। पहली फुर्सत मिलते ही ये फिल्म देख डालिए। मेरी तरफ से इस फिल्म को मिलते हैं चार स्टार।
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