Movie Review: इंडियाज मोस्ट वांटेड
कलाकार: अर्जुन कपूर, राजेश शर्मा, प्रशांत अलेक्जेंडर, शांतिलाल मुखर्जी आदि।
लेखक, निर्देशक- राजकुमार गुप्ता
निर्माता- फॉक्स स्टार स्टूडियोज
रेटिंग – **
वह घटना तो आपको याद ही होगी जब शाहरुख खान को अमेरिका के एक एयरपोर्ट पर रोक लिया गया और उनसे लंबी पूछताछ हुई। उसी घटना के सिरे को पकड़कर निर्देशक राजकुमार गुप्ता ने 123 मिनट की फिल्म बना डाली है, इंडियाज मोस्ट वांटेड।
उस समय देश में तमाम बम धमाके करने वाले यासीन भटकल ने अपनी पहचान छुपाने के लिए जिन तमाम नामों का इस्तेमाल किया उनमें एक नाम शाहरुख खान भी रहा। और, इसका खामियाजा अभिनेता शाहरुख खान को उठाना पड़ा। इसी यासीन भटकल को पकड़ने के मिशन पर बनी है, इंडियाज मोस्ट वांटेड। इसे फिल्म की बजाय डॉक्यूड्रामा कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि फिल्म बनी उसी स्टाइल में हैं। फिल्म क्यों, कैसे और कहां अपना असर छोड़ने में नाकाम रहती है, पढ़िए आगे।
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arjun kapoor
- फोटो : social media
निर्देशन के नजरिए से देखें तो फिल्म इंडियाज मोस्ट वांटेड देश की एक जरूरी कहानी कहती है। ये उस वक्त की कहानी है जब आतंकियों में मोदी सरकार का खौफ नहीं था। दिल्ली के अफसर लालफीताशाही में उलझे रहते थे और काम कुछ होता नहीं था।
धमाकों की इस कहानी की शुरूआत पुणे बम धमाकों से होती है। राजकुमार गुप्ता ने किस्सा सही उठाया है, पर फिल्म बनाने लायक इसमें तमाम चीजों की कमी है। राजकुमार अब तक पांच फिल्में बना चुके हैं और उनकी पटकथा इतनी महीन रस्सी पर चलती है कि जरा सी गड़बड़ होते ही दर्शक घनचक्कर बन जाते हैं।
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Arjun Kapoor
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
इंडियाज मोस्ट वांटेड कहानी है एक खुफिया अफसर की जिसका नेटवर्क कमाल का है। वह एक आतंकवादी को पकड़ने के गोपनीय मिशन पर निकलता है। ये बात और है कि मिशन गोपनीय है, ये बात वह अपने साथियों को इतनी बार समझाता है कि मिशन के गोपनीय होने पर शक होने लगता है।
दिल्ली इस मिशन की परमीशन देती नहीं है कि लेकिन इस अफसर की काबिलियत समझने वाला एक सीनियर इसकी हरी झंडी दे देता है। फिल्म का प्रचार बार बार बिना हथियारों की सर्जिकल स्ट्राइक के तौर पर किया गया है, लेकिन नेपाल जाकर फिल्म और ढीली हो जाती है।
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arjun kapoor
- फोटो : instagram
फिल्म इंडियाज मोस्ट वांटेड की सबसे कमजोर कड़ियां हैं, इसकी पटकथा और हीरो के तौर पर अर्जुन कपूर का चुनाव। फिल्म में तमाम बातें इतनी बार दोहराई जाती हैं कि दर्शक अपनी कुर्सी पर ही कसमसाने लगता है।
फिल्म का एक ग्राफ होना चाहिए लेकिन यहां मामला इतनी सीधी लकीर पर चलता है कि क्लाइमेक्स भी कब आय़ा और कब फिल्म खत्म हो गई पता ही नहीं चलता। जॉन अब्राहम की फिल्म रोमियो अकबर वॉल्टर वाली गलती यहां भी दोहराई गई है, और वह ये कि हीरो आखिर में ऐसा कोई काम नहीं करता कि उसकी हीरोगिरी परदे पर दिखे। बिटवीन द लाइन्स समझने का समय इस देश में अब किसी के पास है नहीं।
अदाकारी के मामले में पूरी फिल्म अर्जुन कपूर के चौड़े कंधों और लचकती टांगों पर टिका दी गई है। और, अर्जुन कपूर से इतनी जिम्मेदारी वाले काम कभी हुए नहीं हैं। वह क्लोज अप में अटकते हैं और लॉन्ग शॉट्स में भटकते हैं। संवाद अदायगी का उनका सेट पैटर्न है और वह ऐसे संवेदनशील किरदारों में तो बिल्कुल नहीं जमता। फोन पर भी जब वह देशभक्ति की बातें करते हैं, तो अजीब से दिखते हैं। हां, राजेश शर्मा एक बार फिर अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे।
बाकी कलाकारों के करने के लिए राजकुमार गुप्ता ने कुछ खास सोचा ही नहीं है। इंडियाज मोस्ट वांटेड में डडले की सिनेमैटोग्राफी असरदार नहीं है और न ही अमित त्रिवेदी कुछ ऐसा रच पाए है जो सिनेमा हॉल से बाहर निकलने के बाद याद रह पाए। तकनीकी तौर पर भी ये फिल्म औसत से कम ही है। अगर आप खुफिया मिशन वाली फिल्मों के शौकीन है और इंडियाज मोस्ट वांटेड से किसी सस्पेंस थ्रिलर की उम्मीद लगाए हैं, तो फिल्म आपको निराश कर सकती है। अमर उजाला डॉट कॉम के मूवी रिव्यू में इंडियाज मोस्ट वांटेड को मिलते हैं दो स्टार।