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1962 The War in the Hills Review: महेश मांजरेकर की साख पर अरे स्टूडियोज का बट्टा, अभय देओल रहे बेअसर

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1962: द वॉर इन द हिल्स - फोटो : अमर उजाला
डिजिटल रिव्यू: 1962 द वॉर इन द हिल्स
लेखक: चारुदत्त आचार्य
निर्देशक: महेश मांजरेकर
कलाकार: अभय देओल, माही गिल, मेयांग चांग, आकाश थोसर, सुमीत व्यास, अनूप सोनी आदि।
निर्माता: अरे स्टूडियोज
रेटिंग: *1/2

अभिनेता अभय देओल से बात करना अपने आप में एक अलग ही अनुभव होता है। वह अक्सर किसी अलग ही ‘जोन’ में होते हैं। अंग्रेजी के सवालों पर वह दर्शन शास्त्र सुनाते हैं और हिंदी में किए गए सवाल आमतौर पर उनकी समझ नहीं आते या फिर वह ऐसा करने का स्वांग करते हैं। ऐसा ही अनुभव होता है उनकी नई वेब सीरीज ‘1962: द वॉर इन द हिल्स’ देखकर। इन दिनों काम की तलाश में लगे निर्देशक महेश मांजरेकर के नाम पर ये सीरीज एक धब्बा है। यूं लगता है कि सीरीज के मेकर्स ने महेश मांजरेकर के नाम पर ही पूरा दांव लगा दिया और न कहानी की रिसर्च की तरफ ध्यान दिया और ना ही इसकी मेकिंग पर।
 
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1962: द वॉर इन द हिल्स - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
ओटीटी के आने से उन सभी लोगों की पांचों अंगुलियां घी में हैं जिनकी किसी न किसी ओटीटी में ऊपर तक सेटिंग है। अच्छा कंटेंट आमतौर पर डिस्कशन, स्टोरी बाइबल, ऑडियो पायलट से आगे नहीं बढ़ पाता और वेब सीरीज ‘1962: द वॉर इन द हिल्स’ जैसा कंटेंट धुआंधार प्रचार के साथ रिलीज भी हो जाता है। सीरीज को देखकर हॉलीवुड के वे फिल्मकार अपना माथा ही पकड़ सकते हैं जिन्होंने खास तरह की भावनाएं जगाने के लिए खास तरह के रंगों को चुना। इसे फिल्म की भाषा में पैलेट (रंग पट्टिका) कहते हैं। पूरी फिल्म को एडिट के दौरान एक खास तरह का कलर टोन दे दिया जाता है। जैसे कि ‘बार्ड ऑफ ब्लड’, ‘बुलबुल’, ‘पाताललोक’ और ‘तांडव’ में भी दर्शक देख चुके हैं। वेब सीरीज ‘1962: द वॉर इन द हिल्स’ का कलर पैलेट इसके काम नहीं आता। युद्ध दृश्यों का रंग दूसरी मानवीय संवेदनाओं का भी रंग कैसे हो सकता है, इसे बनाने वाले ही बता सकते हैं।
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1962: द वॉर इन द हिल्स - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
वेब सीरीज ‘1962: द वॉर इन द हिल्स’ की कमजोर कड़ियां इतनी हैं कि इसमें अच्छा क्या है तलाशना मुश्किल है। अभय देओल कभी समानांतर सिनेमा का पोस्टर ब्वॉय बनने लायक रुतबा बना ले गए थे। अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देव डी’ की हीरोइन फिर उनके साथ हैं, लेकिन सीरीज के मेकर्स ने दोनों के एक साथ काम करने को कभी हाईलाइट नहीं किया, वजह दोनों के किरदार बहुत ही कमजोर हैं। सबसे बड़ी खामी इस सीरीज की कहानी में है। पटकथा किसी भी किरदार को जमने ही नहीं देती। सब ‘से चीज’ जैसी सामूहिक भावना से मुस्कराते हैं और फिर पनीर पर आ गिरते हैं। हाथों से किसी जीव की जान ले लेने वाले फौजी तो नहीं हो सकते। फौजी भी इंसान होता है, फिर चाहे वह भारत का हो या फिर चीन का।

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1962: द वॉर इन द हिल्स - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अभिनय के लिहाज से ये सीरीज हाल के दिनों की सबसे कमजोर सीरीज मानी जा सकती है। ‘परमवीर चक्र’ या ‘फौजी’ जैसे टीवी धारावाहिकों ने हिंदुस्तान में कभी सेनाओं पर बनी सीरीज का एक स्तर तय किया था। अब सब कुछ ‘जीत की जिद’ बन चुका है। लेकिन सियासत में फौज के नाम की कामयाबी देखकर फौजियों पर आधारित सीरीज बना रहे लोगों को ये समझना जरूरी है कि राजनीति ने देश में वोटर को उत्पाद बना दिया है। यहां उत्पाद वह खुद हैं। साउथ मुंबई के लफंगों जैसी चीनी सेना पहली झलक में ही नकली लगती है। अभय देओल के अभिनय सामर्थ्य से कहीं बड़ा किरदार उनको मिला और वह पहले ही एपीसोड में धराशायी हो गए।
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1962: द वॉर इन द हिल्स - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
महेश मांजरेकर जैसे निर्देशक की ये विफलता है कि वह वेब सीरीज ‘1962: द वॉर इन द हिल्स’ में कहीं भी देशभक्ति का ज्वार नहीं जगा पाते। उनकी राइटिंग टीम बेहद कमजोर है। मानवीय भावनाएं जगाने में भी पूरी सीरीज का एक भी एपिसोड काम नहीं कर पाता, ये इसके बावजूद कि सरहद पर भिड़े जवानों की फिल्म ‘बॉर्डर’ जैसी नेपथ्य कथा रचने की कोशिश भरपूर की गई है। करन रावत ने अपने कैमरे से क्या कमाल किए होंगे, इन्हें समझने का स्कोप सीरीज में बचा नहीं है। सब कुछ हरा जो हो गया है। हितेश मोदक के संगीत में रवानी नहीं है। अपना वीकएंड बिना सिरदर्द के बिताना हो तो इस सीरीज को स्किप कर देना ही बेहतर।
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