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Mohd Rafi Birth Centenary: सुर लगाने के साथ अभिनय में आजमाया हाथ, आखिरी दिन भी गायकी के नाम कर गए मोहम्मद रफी

Tue, 24 Dec 2024 09:08 AM IST
साक्षी एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

Mohd Rafi Birth Centenary: आज हिंदी सिनेमा के सुरों के सरताज मोहम्मद रफी की 100वीं जयंती है। चलिए इस खास मौके पर जानते हैं महान गायक से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें...
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मोहम्मद रफी का शताब्दी वर्ष - फोटो : अमर उजाला
मोहम्मदी रफी साहब ने सिनेमा को सदबहार नगमें दिए हैं, जो आज भी लोगों की जुबान पर रहते हैं। उनके गीतों के एक-एक लफ्ज आज भी दिल में उतर जाते हैं। मोहम्मद रफी जैसा फनकार न कोई दूसरा है और न ही होगा। वे आज के जमाने के गायकों और गीतकारों के लिए गुरु और प्रेरणा भी बने। मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को हुआ था। आज उनकी 100वीं जयंती है। मोहम्मद रफी साहब ने केवल अपनी गायकी बल्कि सादगी के लिए भी जाने जाते थे। चलिए आज उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ रोचक बातें जानते हैं।
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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
मोहम्मद रफी की पहली प्रस्तुति
मोहम्मद रफी का उपनाम फीको था। वे मूल रूप से अमृतसर जिले के कोटला सुल्तान सिंह गांव के रहने वाले थे और बाद में अपने परिवार के साथ लाहौर चले गए। 13 साल की उम्र में मोहम्मद रफी ने लाहौर में अपनी पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी, जहां उन्होंने के.एल. सहगल के साथ काम किया।
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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
मोहम्मद रफी का हिंदी फिल्मों में डेब्यू
1944 में मोहम्मद रफी ने लाहौर में जीनत बेगम के साथ युगल गीत 'सोनिये नी, हीरिये नी' गाकर प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत की। उन्हें ऑल इंडिया रेडियो लाहौर द्वारा भी गाने के लिए आमंत्रित किया गया था। मोहम्मद रफी ने 1945 में फिल्म 'गांव की गोरी' से हिंदी फिल्मों में डेब्यू किया था।

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किशोर कुमार - फोटो : एक्स: @abhirockstar09
मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के रिश्ते
मोहम्मद रफी और किशोर कुमार को संगीत जगत में हमेशा कट्टर प्रतिद्वंद्वी माना जाता था, लेकिन जो लोग उन्हें जानते थे, वे हमेशा इस बात पर जोर देते थे कि वे बहुत अच्छे दोस्त थे। जिस दिन मोहम्मद रफी की मृत्यु हुई, उस दिन मुंबई में भारी बारिश हो रही थी और जहां लोग अपने पसंदीदा संगीत सितारे को अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे थे, वहीं किशोर कुमार उनके पार्थिव शरीर के पास बैठे रहे और बच्चों की तरह रोते रहे।
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मोहम्मद रफी-किशोर कुमार - फोटो : एक्स
जब आमने-सामने आए मोहम्मद रफी-किशोर कुमार
संगीत निर्देशक आरडी बर्मन ने एक बार मोहम्मद रफी और किशोर कुमार को आधिकारिक तौर पर एक दूसरे के खिलाफ खड़ा करने का फैसला किया। उन्होंने दोनों से एक ही गीत गवाया जो दो नायकों- शशि कपूर और भारत भूषण पर अलग-अलग फिल्माया गया था, इसलिए जब मोहम्मद रफी ने शशि कपूर के लिए गाया तो भारत भूषण के लिए किशोर कुमार ने अपनी आवाज दी। बाद में जब फिल्म रिलीज हुई तो रफी द्वारा गाए गए गीत का संस्करण अधिक लोकप्रिय हो गया।
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मोहम्मद रफी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मु्ंबई
कई भाषाओं में गाए गाने
मोहम्मद रफी के नाम सबसे ज्यादा भारतीय पार्श्व गायक होने का रिकॉर्ड है। उन्होंने 14 भारतीय भाषाओं और चार विदेशी भाषाओं में गाने गाए हैं, जिनमें असमिया, कोंकणी, भोजपुरी, अंग्रेजी, फारसी, डच, स्पेनिश, तेलुगु, मैथिली, उर्दू, गुजराती, पंजाबी, मराठी, बंगाली आदि शामिल हैं।ऐसा माना जाता है कि मोहम्मद रफी ने अपने जीवनकाल में 7000 से अधिक गाने गाए, जिनमें से 162 गाने हिंदी के अलावा अन्य भाषाओं में गाए गए थे।
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आशा भोसले-मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स
आशा भोसले के साथ रफी की जोड़ी
मोहम्मद रफी और आशा भोसले की जोड़ी संगीत जगत में काफी सफल रही और वे हमेशा एक युगल गीत पर एक साथ काम करते थे, जिसमें महिला स्वर की आवश्यकता होती थी, जबकि जब पुरुष युगल गीत गाने की बात आती थी तो मन्ना डे अक्सर उनके साथी होते थे।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स
फिल्मों में भी किया काम
मोहम्मद रफी ने अभिनय में भी हाथ आजमाया। उन्होंने 1976 में आई 'लैला मजनू' और 1947 की 'जुगनू' जैसी फिल्मों में अभिनय किया। दोनों ही फिल्में सफल रहीं।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स
हॉलीवुड फिल्म में रफी का गाना
मोहम्मद रफी ने वर्ष 1965 में फिल्म गुमनाम में जान पहचान हो नामक गीत गाया था। इस गीत को बाद में वर्ष 2001 में हॉलीवुड फिल्म घोस्ट वर्ल्ड में इस्तेमाल किया गया था।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
विधवा महिला के लिए फरिश्ते बने रफी
मोहम्मद रफी के पड़ोस में रहने वाली एक विधवा को हर महीने किसी अज्ञात स्रोत से मनीऑर्डर मिलता था और जब रफी की मृत्यु के बाद यह आना बंद हो गया तो महिला ने डाकघर में इसकी जानकारी ली और उन्हें पता चला कि मशहूर गायक इस दौरान उसकी मदद करते रहे थे।

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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स @FilmHistoryPic
आखिरी दिन भी की गाने की रिकॉर्डिंग
मोहम्मद रफी साहब ने अपनी पूरी जिंदगी गायकी को समर्पित कर दी थी, यहां तक कि अपनी जिंदगी के आखिरी दिन भी वे गाने की रिकॉर्डिंग में व्यस्त थे। रफी साहब के पास कलकत्ता से कुछ लोग मिले आए थे और उनसे मां काली की पूजा के लिए गाना गाने का आग्रह किया था। रफी साहब रिकॉर्डिंग करने लगे। उनके सीने में दर्द की शिकायत थी, लेकिन रफी साहब ने इस बारे में किसी को नहीं बताया और गाने की रिकॉर्डिंग में व्यस्त रहे। इसके बाद दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया।
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मोहम्मद रफी - फोटो : एक्स
अंतिम संस्कार में शामिल हुए थे 10 हजार से अधिक लोग
31 जुलाई 1980 को मोहम्मद रफी ने दुनिया को अलविदा कह दिया था और सिनेमा जगत ने एक अनमोल हीरा खो दिया। मोहम्मद रफी का अंतिम संस्कार भारत में सबसे बड़े अंतिम संस्कारों में से एक था, क्योंकि उनके अंतिम संस्कार में 10000 से अधिक लोग शामिल हुए थे। जुलाई 2011 में उनकी पुण्यतिथि मनाने के लिए 9,000 से अधिक संगीतमय श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किए गए।
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