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International Women's Day: बेटे का इंतजार करने से बिटिया की दोस्त बनने तक, समय के साथ कितनी बदलीं सिनेमाई मां?

Sat, 08 Mar 2025 12:04 AM IST
ज्योति राघव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला

सार

International Women's Day 2025: 08 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जा रहा है। इस मौके पर जानते हैं कि हिंदी सिनेमा में मां के किरदारों में कितना बदलाव आया?
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बॉलीवुड अभिनेत्री - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कहा जाता है कि सिनेमा समाज का दर्पण होता है। समाज में जैसे-जैसे बदलाव आता है, तो सिनेमा में भी उसकी झलक नजर आने लगती है। हिंदी सिनेमा में मां के किरदारों को उदाहरण के रूप में देखा जा सकता है। हिंदी सिनेमा में आज से चार-पांच दशक पुरानी फिल्में देखी जाएं तो उनमें मां की तस्वीर अलग दिखेगी। शायद तब की सामाजिक परिस्थितियों के हिसाब से। एक सफेद साड़ी लपेटे, सफेद बाल, थका-मांदा शरीर और बेटे के लौटने का इंतजार करती हुई, जो बेटे को खाना खिलाने के बाद ही सोने जाती है। मगर, अब समय बदला है तो सिनेमा की दुनिया में माएं भी बदली हैं। आइए जानते हैं...

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घरेलू से अपनी पहचान बनाने वाली मां
हिंदी सिनेमा देखने वाली एक पूरी पीढ़ी की स्मृति में एक ऐसी मां की छवि बनी हुई है, जो बिल्कुल घरेलू है। निरूपा रॉय से लेकर राखी तक, तमाम अदाकाराओं ने आदर्श मां की ये भूमिकाएं निभाईं। अब समय बदला है तो आज के दौर में मां के किरदार में भी बदलाव आया है और रंग-रूप और मेकअप में भी। अपने बच्चों की परवरिश करने, उन्हें प्यार करने के साथ-साथ वह अपनी स्वतंत्र पहचान भी बनाए रखती है। अपने बच्चों को शादी के बंधन में बंधने से पहले बाकायदा सेक्स एजुकेशन देती है।

'हम तुम' की साहसी मांएं
सिनेमा में अब माएं अपने बच्चों की जिंदगी से इतर अपनी पहचान भी लेकर चलती हैं। वे आम महिलाओं की चिंताओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनके पास नौकरी, बिजनेस होता है। अपना विजन होता है। सैफ अली खान और रानी मुखर्जी अभिनीत फिल्म 'हम तुम' में दोनों ही माएं सिंगल हैं। एक, अपने पति से अलग हो चुकी है और दूसरी विधवा है। लेकिन नायक की मां के रूप में रति अग्निहोत्री और नायिका की मां के रूप में किरण खेर दोनों ही साहसी, स्मार्ट और जीवन से भरपूर हैं। साल 2004 में आई यह फिल्म हिट रही थी। 

2000 के दशक में बदलाव की शुरुआत
साल 2000 के दशक में मां की भूमिका में धीरे-धीरे बदलाव हुआ। किरण खेर ने ऐसे कई किरदार अदा किए। 'दोस्ताना', 'मैं हूं ना', 'वीर जारा' और 'देवदास' जैसी फिल्में आईं। 2014 में आई फिल्म 'खूबसूरत' में किरण खेर ने सोनम कपूर की मां की भूमिका निभाई और रत्ना पाठक शाह ने नायक फवाद खान की सख्त मातृसत्तात्मक मां की भूमिका निभाई। उससे दो साल पहले, डिंपल कपाड़िया ने सैफ अली खान-दीपिका पादुकोण अभिनीत फिल्म 'कॉकटेल' में एक शरारती बेटे की एकल मां की भूमिका अदा की।

छोटी-छोटी भूमिकाओं में सशक्त छवि
छोटी-छोटी भूमिकाओं में भी मां की यह सशक्त छवि नजर आने लगी है। अभिनेत्री सीमा पाहवा ने 'बरेली की बर्फी' और 'शुभ मंगल सावधान' जैसी फिल्मों में मध्यमवर्गीय मां की भूमिकाएं निभाई हैं। 'बरेली की बर्फी' में वे सुशीला की भूमिका में हैं, जो अपनी बेटी के लिए दूल्हे की तलाश कर रही एक परेशान मां है। वहीं, 'शुभ मंगल सावधान' में वह एक पढ़ी-लिखी महिला के रोल में हैं, जो अपनी जल्द ही शादी करने वाली बेटी को सेक्स के बारे में बताने के लिए बच्चों की क्लासिक कहानी का इस्तेमाल करती हैं।
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अपनी महत्वाकांक्षाओं का ख्याल रखने वाली मां
हाल के वर्षों में सबसे यादगार भूमिकाओं में शूजित सरकार की फिल्म 'विक्की डोनर' में आयुष्मान खुराना की विधवा मां की भूमिका निभाने वाली डॉली आहलूवालिया हैं। मां एक सैलून की मालकिन है, जिसका अपनी सास के साथ बहुत अच्छा रिश्ता है। दोनों हर शाम काम के बाद एक-दो ड्रिंक्स लेती हैं और एंजॉय करती हैं। इसी तरह फिल्म 'थप्पड़' में दीया मिर्जा एकल मां की भूमिका में दिखीं। वह अपनी टीनएज बिटिया को बताती हैं कि दोबारा शादी करने में उनकी दिलचस्पी क्यों नहीं है। इसी फिल्म में रत्ना पाठक शाह ऐसी मां की भूमिका में नजर आईं, जो अपने पति को अहसास कराती हैं कि उन्होंने अपनी शादीशुदा जिंदगी में उनकी महत्वाकांक्षाओं को नजरअंदाज किया। इसी तरह फिल्म 'लापता लेडीज'और 'मुंजा' जैसी फिल्में भी उदाहरण हैं।
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