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Barry Jenkins Exclusive: ऑस्कर विनर बैरी जेन्किन्स का भारतीय अखबार को दिया इकलौता इंटरव्यू, पढ़िए भी, देखिए भी

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बैरी जेनकिन्स - फोटो : अमर उजाला
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डिज्नी की नई फिल्म ‘मुफासा: द लॉयन किंग’ पूरी दुनिया के साथ भारत में भी इस हफ्ते रिलीज हो रही है। 2019 में रिलीज हुई फिल्म ‘द लॉयन किंग’ की कहानी से पहले की कहानी (प्रीक्वल) कहती इस फिल्म में मुफासा का बचपन है, उसकी किशोरावस्था है और है उसका वह संघर्ष जिससे निकलकर वह जंगल का राजा बना। फिल्म बताती है कि राजा बनने के लिए प्रजा का साथ होना कितना जरूरी है। इस फिल्म को बैरी जेन्किन्स ने निर्देशित किया है और ऑस्कर विजेता निर्देशक बैरी जेन्किन्स ने भारत में सिर्फ एक ही अखबार ‘अमर उजाला’ से अपनी इस नई फिल्म के बारे में ये एक्सक्लूसिव बातचीत की, सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल से।

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बैरी जेन्किन्स और टारेल एल्विन मैकक्रेनी - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने इस फिल्म के शुरू में जेम्स अर्ल जोन्स जो कि 1994 में रिलीज मूल फिल्म ‘द लॉयन किंग’ में मुफासा की आवाज बने थे, को याद किया है। आप व्यक्तिगत तौर पर उन्हें कैसे याद करते हैं?
यह बहुत ही अद्भुत अनुभव है। ‘द लायन किंग’ से हर किसी का बचपन जुड़ा रहा है और अगर आप गहराई से देखें तो यह लगभग ऐसा है जैसे जेम्स अर्ल जोन्स एक पिता जैसी ही हैं। उनकी पितृवत छवि के साथ ही मैं बड़ा हुआ हूं। मेरे अपने जीवन में ऐसी दूसरी कोई छवि रही नहीं। इसलिए मुफासा जैसे किरदार में उनका होना एक अलग ही असर लाता है। उनकी ऊर्जा हरदम हमारे साथ थी और अभी इसी साल वह गुजरे हैं तो हमें उनका सम्मान करना ही था। 

‘मुफासा: द लॉयन किंग’ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने अभी बचपन की बात की और फिल्म ‘मुफासा’ भी एक ऐसी कहानी है जिसमें एक बच्चा बचपन के मासिक आघातों से उबरकर राजा बनता है। आपकी अपनी कहानी के भी करीब है ये कहानी?
आप कह सकते हैं कि ऐसा है। लेकिन मैंने जब ये फिल्म साइन की थी तब मुझे ये पता नहीं था। इसके बारे में मुझे तब महसूस होना शुरू हुआ जब मैंने फिल्म के पटकथा लेखक जेफ नैथनसन के साथ काम करना शुरू किया और शायद मैंने उनमें से कुछ चीजों को महसूस किया। (बैरी ने कभी अपने पिता को नहीं देखा, उनकी मां चार अलग अलग पुरुषों से चार बच्चों की मां बनीं और दोनों ने बहुत कष्टप्रद जीवन देखा है।) मैं बस फिल्म को जानता था, इसे व्यक्तिगत रूप से महसूस करता था और इसीलिए मैंने ये फिल्म निर्देशित करने के लिए हां की। और फिर, जैसे-जैसे कहानी कहने की प्रक्रिया से गुजरते हैं, आपको एहसास होने लगता है कि व्यक्तिगत संबंध एक तरह से जुड़ते चले जाते हैं।

बैरी जेनकिन्स मूनलाइट के सेट पर बाल कलाकार के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, इस फिल्म के दौरान ही आपकी मां भी चल बसीं...
हां, जब मैं ये फिल्म बना रहा था, उसी दौरान मेरी मां का निधन हो गया। ये एक बहुत ही निजी त्रासदी रही लेकिन यह इस फिल्म के किरदारों के साथ मेरे अनुभवों का भी एक नया आयाम खोल गई। ‘द लायन किंग’ हमेशा बच्चों के बारे में रही है। इसकी अंतर्धारा समझेंगे तो ये माता पिता को बचपन में खो देने के शोक के बारे में हैं और मैं भी चूंकि इसी अनुभव से गुजर रहा था तो शायद इस तरह से  इसने मुझे इन पात्रों के करीब ला दिया। 

मूनलाइट - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हां, भावनाएं इसीलिए शायद दुनिया में सब जगह एक सी हैं। सबको मां के जाने का दुख होता है, पिता के साथ न होने की छपटाहट होती है। मुझे आपकी फिल्म ‘मूनलाइट’ भी इसी क्रम में याद आती है, जो दोस्ती के रिश्ते बताती है..
ये सही है कि मनुष्य की मूल भावनाएं हर देश में एक जैसी ही प्रतिबिंबित होती हैं। लेकिन ये कुछ ऐसा है कि ये तमाम दूसरी फिल्मों में भी हो रहा है, मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जो अद्वितीय हो। लेकिन, ये भावनाएं बहुत शक्तिशाली हैं। और, वह इसलिए क्योंकि इस फिल्म में कोई राजा नहीं है। यहां सिर्फ लोग हैं। माताएं है, उनके बेटे हैं, पिता है और ये सब मिलकर अपनी दुनिया चलाने की कोशिश कर रहे हैं। 

मुफासा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, इतनी बड़ी दुनिया में अकेले रह जाने का एहसास भी आपने बहुत खूबसूरती से दिखाया है?
हमें दुनिया को अकेले ही खोजने निकलना होता है। मुफासा भी अपने परिवार से बचपन में ही अलग हो जाता है। उसे पता ही नहीं होता कि दुनिया में उसका कौन अपना है, कौन पराया? फिर उसका एक नया परिवार बनता है। तो ये सारी भावनाएं बहुत दमदार और बहुत भावनात्मक हैं। जैसे कि आपने ‘मूनलाइट’ का जिक्र किया तो यहां भी किरदार की भावनाएं ही दर्शकों से सीधा रिश्ता स्थापित करती हैं।

मुफासा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
एनीमेशन फिल्मों के दृश्यों के शॉट्स काफी छोटे छोटे रखे जाते हैं और आपको आदत है अपनी फिल्मों में लंबे लंबे शॉट्स जमाने की तो कभी डिज्नी ने आपको इस बारे में कोई सलाह या चेतावनी दी?
एनीमेशन के साथ चुनौती यह होती है कि शॉट जितना लंबा होता है, उसे बनाना, उसे कंप्यूटर पर सजाना और फिर उसे रील तक लाना उतना ही मुश्किल होता जाता है। एनीमेशन में हर फ्रेम में चित्रकारी होती है, जानकारी होती है और उसे कुछ एनीमेशन कलाकार मिलकर रचते हैं, जो अलग अलग दृश्यों के लिए अलग अलग होते हैं। तो हां, चुनौती तो होती है लंबे शॉट्स में क्योंकि फिर ये कलाकार हर बार वही होने चाहिए, लेकिन  इस तकनीकी चुनौती के बीच भी मुझे ‘मुफासा’ बनाने में बहुत आनंद आया। और, मैंने डिज्नी को शुरू में ही बता दिया था कि मेरा फिल्म बनाने का ये अंदाज है और हम इसी तरह से ये फिल्म भी बनाएंगे।

शाहरुख खान अपने परिवार के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हिंदी सिनेमा का सबसे बड़ा सितारा शाहरुख खान आपकी फिल्म ‘मुफासा’ को हिंदी में डब कर रहा है, ये पता है आपको?
हां बेशक, मुझे पता है। मुझे ये भी पता है कि उनके बेटे भी इस फिल्म की डबिंग कर रहे हैं। मेरी दिली इच्छा है कि मैं इन लोगों से संपर्क कर सकूं लेकिन मैंने इस फिल्म के हिंदी संस्करण की डबिंग निर्देशक से बात की है और ये बात ही कितनी रोचक है कि इतना बड़ा सितारा अपने परिवार समेत इस फिल्म के एक परिवार को निभाने जा रहा है। 
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बैरी जेन्किन्स - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कोई खास बात जो आप अपने भारतीय दर्शकों से कहना चाहें?
मैं इस फिल्म को लेकर भारत में बने उत्साह को जानकर काफी खुश हूं। दुनिया के उस हिस्से से यहां अमेरिका तक ये अच्छी खबरें आ रही हैं और इससे इस बात की तसल्ली मिलती है कि हम सब अपने परिवार को लेकर एक जैसी भावनाएं रखते हैं। इस कहानी के बारे में मुझे जो चीज सबसे ज्यादा पसंद रही है, वह है प्रकृति बनाम पोषण का विचार,  अपने पूर्वजों से अपने समुदाय से सीखने का विचार और ये विचार कि हमें अपना भाग्य खुद बनाना है। भारत के लोग भी अपना भाग्य खुद बनाना जानते हैं।

इस पूरे वीडियो का इंटरव्यू आप यहां देख सकते हैं: 

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