1988 में मैंने मीरा नायर द्वारा निर्देशित फिल्म 'सलाम बॉम्बे' देखी थी, मैं 14-15 साल की रहीं होंगी, यकीन मानिए उस फिल्म ने मेरा नजरिया बदल दिया। मैंने उससे पहले ऐसा कुछ देखा नहीं था। जब यह फिल्म देखी तो इसके बाद सत्यजित राय, मृणाल सेन जैसे फिल्ममेकर्स को जानना, उन्हें देखना शुरू किया।मैं जिस स्कूल में थी, वहां ऐसे बच्चे नहीं पढ़ते थे, जिनके माता-पिता फिल्मी दुनिया से ताल्लुक रखते थे। मेरे घर में चूंकि मेरे माता-पिता दोनों ही स्क्रिप्ट राइटर थे और पिता तो कविताएं भी लिखते थे, तो मुझे इन सबकी आदत थी। लेकिन स्कूल के समय में ऐसा नहीं रहा कि मुझे कोई खास ट्रीटमेंट मिला हो। मेरा बचपन ऐसे लोगों के साथ गुजरा, जिनसे मैंने हर क्षेत्र में कुछ न कुछ नया सीखा है। घर में कई शायर, कवियों, फिल्ममेकर्स और कलाकारों का जमावड़ा रहता था।