फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

जोया अख्तर ने खोला राज, 14-15 साल की थी तो...'सलाम बॉम्बे' की वजह से सबकुछ बदल गया

Sun, 18 Nov 2018 04:53 PM IST
एंटरटेनमेंट डेस्क,अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 7
zoya akhtar
1988 में मैंने मीरा नायर द्वारा निर्देशित फिल्म 'सलाम बॉम्बे' देखी थी, मैं 14-15 साल की रहीं होंगी, यकीन मानिए उस फिल्म ने मेरा नजरिया बदल दिया। मैंने उससे पहले ऐसा कुछ देखा नहीं था। जब यह फिल्म देखी तो इसके बाद सत्यजित राय, मृणाल सेन जैसे फिल्ममेकर्स को जानना, उन्हें देखना शुरू किया।मैं जिस स्कूल में थी, वहां ऐसे बच्चे नहीं पढ़ते थे, जिनके माता-पिता फिल्मी दुनिया से ताल्लुक रखते थे। मेरे घर में चूंकि मेरे माता-पिता दोनों ही स्क्रिप्ट राइटर थे और पिता तो कविताएं भी लिखते थे, तो मुझे इन सबकी आदत थी। लेकिन स्कूल के समय में ऐसा नहीं रहा कि मुझे कोई खास ट्रीटमेंट मिला हो। मेरा बचपन ऐसे लोगों के साथ गुजरा, जिनसे मैंने हर क्षेत्र में कुछ न कुछ नया सीखा है। घर में कई शायर, कवियों, फिल्ममेकर्स और कलाकारों का जमावड़ा रहता था। 
विज्ञापन

2 of 7
zoya akhatar - फोटो : instagram
पापा के सभी दोस्तों से मैं घुल-मिल जाया करती थी। लेकिन सबसे ज्यादा करीब रही मैं फारूख शेख जी के साथ। फारूख अंकल और मेरे पापा-मम्मी के बीच गहरा लगाव था। जब भी वह घर आते थे, मेरे साथ वक्त बिताते थे। मेरे और मेरे भाई फरहान को उन्होंने बहुत प्रेरित किया है। वह ऐसे शख्स थे, जो किसी का भी जन्मदिन, सालगिरह या कोई और बड़ा दिन कभी नहीं भूलते थे। उनके अलावा और भी लोग थे, जिनके साथ आज भी वही ट्यूनिंग जमती है। सलीम अंकल भी हमेशा साथ रहे। जहां आप सब देखते हैं, कई जानकार लोगों से मिलते हैं, चीजों को समझने लगते हैं तो ऐसे माहौल से आपको बहुत कुछ सीखने को मिलता है। 
विज्ञापन

3 of 7
zoya akhatar - फोटो : instagram
लेखकों, शायरों, कवियों, फिल्मी दुनिया के सितारों के बीच रहकर मुझमें भी वही सब आया। मैं जब कोई फिल्म देखती थी, तो हर बारीकी पर नजर रखती थी। इस तरह के वातावरण में हमें पता ही नहीं चलता कि हमने क्या-क्या सीख लिया। मैं और फरहान फिल्में बहुत देखते थे, लेकिन 80 के दशक में कुछ फिल्में बहुत अच्छी नहीं थी, इसलिए तब मैंने हिंदी फिल्में देखना कम कर दिया था। जब बड़ी होने लगी, तो करियर को लेकर रोज नए ख्याल मन में आते थे। मैं वेटनरी डॉक्टर बनना चाहती थी, लेकिन फिर सोचा कि अरे बहुत पढ़ना पढ़ेगा, तो वह ख्याल भी छोड़ दिया। फिर मन में लॉ करने का ख्याल भी आया, लेकिन वह भी छूट गया। इस बीच 1988 में मैंने मीरा नायर द्वारा निर्देशित फिल्म 'सलाम बॉम्बे' देखी थी। तब मैं 14-15 साल की थी। 

4 of 7
zoya akhatar - फोटो : instagram
यकीन मानिए उस फिल्म ने मेरा नजरिया बदल दिया था। मैंने उससे पहले ऐसा कुछ नहीं देखा था। जब यह फिल्म देखी तो इसके बाद सत्यजित राय, मृणाल सेन जैसे फिल्ममेकर्स को जानना, उन्हें देखना शुरू किया तो लगा कि अरे यह सब अब तक क्यों नहीं देखा? श्याम बेनेगल की फिल्में देखती थी, तो उनसे एक सहज जुड़ाव महसूस होता थी। उन लोगों से मैंने तब बहुत चीजें सीखी। फिल्म कैसी होनी चाहिए, उसका संगीत, पटकथा, छायांकन से लेकर हर छोटी-बड़ी बात समझने लगी। तब मुझे लगा कि यही एक चीज है, जो मुझे करनी है और मैं इसमें अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकती हूं। फिर मैंने न्यूयॉर्क से फिल्म प्रॉडक्शन में कोर्स करने का फैसला किया और इस तरह मैं इस क्षेत्र में कूद पड़ी। मेरे माता-पिता ने मेरे हर दौर में मेरा साथ दिया। 
विज्ञापन

5 of 7
zoya akhatar - फोटो : instagram
उन्होंने मुझे वह सब करने की आजादी दी जो मैं करना चाहती थी। मैंने बेशक कुछ गलतियां भी की। कुछ बहुत अच्छा भी किया, लेकिन वह सब मेरा था। वह मेरे अपने अनुभव हैं।फिल्मों की प्रति भी मेरी यही सोच है कि अगर आप कुछ अलग करना चाहते हैं, तो आप वह दिखाइए जो आप हैं। जब हम दर्शकों के लिए फिल्म बना रहे हैं, तो हमें उसी तरह सोचना चाहिए। कोई भी निर्देशक या निर्माता यह नहीं चाहेगा कि उसकी फिल्में कम लोग देखें। इसलिए दर्शकों को समझकर उनके लिए फिल्म बनाना जरूरी है और मुझे लगता है कि यहां पर मैं थोड़ी तो सफल रही हूं। मैंने काफी यात्राएं की हैं और मैं जिस तरह से दुनिया को देखती हूं या फिर दुनिया और लोग जैसे मुझे नजर आते हैं, मैं उसी तरह की फिल्में बनाने की कोशिश करती हूं। 
विज्ञापन

6 of 7
zoya akhatar - फोटो : instagram
मैं कोई भी यात्रा करती हूं तो यही सोचती हूं कि इसे अपनी अगली फिल्म में किस तरह पेश करूं। जब मैंने फिल्म 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा' बनाई, तो उसमें यात्राओं के साथ एक अलग कहानी थी। फिर जब 'दिल धड़कने दो' बनाने के बारे में सोचा तो ऐसा कुछ करना चाहती थी, जो इस समाज का ही हिस्सा हो। ऐसे डिफरेंसेस, जो आज भी हर एक परिवार में हैं, वह दिखाना चाहती थी। जब 'बॉम्बे टॉकीज' बनाई, तो उसमें एक बच्चे की कहानी थी जो लड़की बनना चाहता है, उसे उसमें ही खुशी मिलती है। मेरी फिल्मों के किरदार मेरे दिल के बहुत करीब होते हैं। मैं जानती हूं कि मेरे जो दर्शक हैं वह क्या चाहते हैं, तो मैं वह बनाऊंगी, जो वह समझते हैं और अब तक यही कोशिश रही है मेरी। 
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
zoya akhatar - फोटो : instagram
लोग समझते हैं कि फिल्में बनाना आसान होता है। एक कहानी उठाई और बन गई फिल्म, लेकिन ऐसा नहीं होता। यह मुश्किल काम है। चाहे कोई छोटी फिल्म हो या बड़ी फिल्म हो। फिल्में आपका जुनून हैं, आपको फिल्मों से प्यार है, तब ही आप कामयाब हो सकते हैं। मैं यह कर पाती हूं, क्योंकि मुझे अपने काम से प्यार है। और मेरे पास ऐसे लोग हैं, जो हर वक्त मेरे साथ खड़े रहते हैं। कई बार हालात बिगड़ते हैं तो मुझे इस बात का भरोसा रहता है कि मेरे साथ जो लोग हैं वे साथ खड़े रहेंगे। एक और चीज है, जो मैं हमेशा याद रखती हूं, वह है बदलाव। यह एक चीज है जो निरंतर मेरे दिमाग में चलती रहती है कि अगर आज ऐसा है, तो कोई नहीं कल यह अच्छा होगा या यह बदलेगा, इसलिए मेरी फिल्मों में भी मैं वही सकारात्मकता दिखाने की कोशिश करती हूं और मुझे लगता है कि अब तक अपनी इस कोशिश में काफी सफल भी हुई हूं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें