यश चोपड़ा, विनोद मेहरा, श्रीदेवी
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
धैर्य के सारथी
‘यश जी में धैर्य बहुत था। मैंने कभी उनको परेशान होते या हड़बड़ी में काम करते नहीं देखा। उनकी फिल्मों की चर्चा उनकी दृश्यावली के लिए शुरू से होती रही है। बी आर फिल्म्स की नौकरी छोड़कर जब उन्होंने अपनी खुद की कंपनी यश राज फिल्म्स खोली तो वह अपने साथ अपने सबसे भरोसेमंद लोगों को ले आए। मेरे पापा भी उन्हीं में से एक थे।’ सिनेमैटोग्राफर राजू केजी बताते हैं। राजू केजी के पिता केजी यानी कोरगांवकर ने यश चोपड़ा के साथ उनकी बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘धूल का फूल’ में बतौर कैमरा सहायक काम शुरू किया और आगे चलकर यश चोपड़ा की चर्चित फिल्मों ‘इत्तेफाक’, ‘दाग’, ‘दीवार’, ‘कभी कभी’, ‘त्रिशूल’, ‘काला पत्थर’ और ‘सिलसिला’ के सिनेमैटोग्राफर बने। ‘सिलसिला’ की मेकिंग का जिक्र करते हुए राजू बताते हैं, ‘यश जी तब नया नया कैमरा खरीद कर लाए थे और एक दिन वह खराब हो गया। शूटिंग रुक गई। पूरी यूनिट परेशान कि अब क्या होगा। तो पापा ने कहा कि आप कहो तो राजू को बुला लेते हैं। मैंने देखा तो मुझे समझ आ गया कि दिक्कत कहां है और मैंने कैमरा ठीक भी कर दिया। उस दिन से यश जी ने पापा के साथ साथ मुझे भी वहीं काम पर रख लिया। मैंने तब देखा कि कैसे एक एक सीन वह जमा कर शूट करते थे। किसी कलाकार का मूड ठीक न हो तो वह शूटिंग रद्द कर देते थे।’ राजू केजी से मिलती जुलती बात श्रीदेवी ने भी मुझे काफी पहले बताई थी, जब उनके पिता का देहांत हुआ और वह ‘लम्हे’ की शूटिंग के बीच में से चेन्नई आ गईं थीं। कोई महीने भर श्रीदेवी अपने घर पर रुकीं, लेकिन एक बार भी यश चोपड़ा के किसी स्टाफ ने उनको फोन करके ये नहीं पूछा कि वह वापस शूटिंग पर कब आएंगी।