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Yash Chopra Birthday: सिनेमा से लेकर सिनेमा को ही सबकुछ सौंप गए यश चोपड़ा, हर कदम निभाए ये धर्म

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यश चोपड़ा - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
बंटवारे से पहले सिनेमा की बजाय अपनी हरकतों से चर्चा में रहने वाले यश राज चोपड़ा ने सिनेमा में धर्म का पूरी तरह पालन किया। लाहौर में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ जुड़े। राष्ट्र धर्म भी उन्होंने सीखा और शासन धर्म भी। धर्म और उपासना पद्धतियों को अलग अलग मानने वाले यश चोपड़ा मानते रहे कि जीवन के किसी भी क्षेत्र में कामयाब तो बहुत लोग होते हैं, लेकिन कई पीढ़ियों तक यादें उन्हीं की रह जाती हैं, जो जीवन में धर्म के दस लक्षण मानकर चलते हैं। श्लोक तो उन्हें पूरा याद नहीं रहता था लेकिन वह धर्म के 10 लक्षणों के बारे में बात जरूर करते थे, जिस श्लोक की तरफ यश चोपड़ा का इशारा होता, वह ये है:

धृति: क्षमा दमोस्तेयं शौचम् इंद्रियनिग्रह।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्म लक्षणम्।।
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यश चोपड़ा - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सिनेमा का युगधर्म
श्लोक वैसे तो मनु स्मृति का है, लेकिन यश चोपड़ा की स्मृति के लिए भी बिल्कुल सटीक है। वह कहते थे कि इनमें से अगर 60 फीसदी भी कोई जीवन में अपना ले, तो उसे लोगों का बेइंतेहा प्यार मिल सकता है। इन लक्षणों का यश चोपड़ा ने भी अपने जीवन में पालन किया, तब भी जब बड़े भाई बल्देव राज चोपड़ा ने लाहौर से बुलाकर बंबई (अब मुंबई) में आई एस जौहर के साथ काम सीखने को लगा दिया और तब भी जब अभिनेता जीवन के कहने पर बड़े भाई ने वापस अपने साथ काम पर लगाया। बी आर फिल्म्स में वह मासिक वेतन पर लंबे अरसे तक काम करते, बड़े भाई ने कभी धंधे में हिस्सेदार नहीं बनाया लेकिन जब भी जहां भी मौका मिला, यश चोपड़ा ने अपनी कामयाबी, अपनी शोहरत और अपने कारोबार के विस्तार का श्रेय अपने बड़े भाई यानी बी आर चोपड़ा को ही दिया।
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यश चोपड़ा, विनोद मेहरा, श्रीदेवी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
धैर्य के सारथी
‘यश जी में धैर्य बहुत था। मैंने कभी उनको परेशान होते या हड़बड़ी में काम करते नहीं देखा। उनकी फिल्मों की चर्चा उनकी दृश्यावली के लिए शुरू से होती रही है। बी आर फिल्म्स की नौकरी छोड़कर जब उन्होंने अपनी खुद की कंपनी यश राज फिल्म्स खोली तो वह अपने साथ अपने सबसे भरोसेमंद लोगों को ले आए। मेरे पापा भी उन्हीं में से एक थे।’ सिनेमैटोग्राफर राजू केजी बताते हैं। राजू केजी के पिता केजी यानी कोरगांवकर ने यश चोपड़ा के साथ उनकी बतौर निर्देशक पहली फिल्म ‘धूल का फूल’ में बतौर कैमरा सहायक काम शुरू किया और आगे चलकर यश चोपड़ा की चर्चित फिल्मों ‘इत्तेफाक’, ‘दाग’, ‘दीवार’, ‘कभी कभी’, ‘त्रिशूल’, ‘काला पत्थर’ और ‘सिलसिला’ के सिनेमैटोग्राफर बने। ‘सिलसिला’ की मेकिंग का जिक्र करते हुए राजू बताते हैं, ‘यश जी तब नया नया कैमरा खरीद कर लाए थे और एक दिन वह खराब हो गया। शूटिंग रुक गई। पूरी यूनिट परेशान कि अब क्या होगा। तो पापा ने कहा कि आप कहो तो राजू को बुला लेते हैं। मैंने देखा तो मुझे समझ आ गया कि दिक्कत कहां है और मैंने कैमरा ठीक भी कर दिया। उस दिन से यश जी ने पापा के साथ साथ मुझे भी वहीं काम पर रख लिया। मैंने तब देखा कि कैसे एक एक सीन वह जमा कर शूट करते थे। किसी कलाकार का मूड ठीक न हो तो वह शूटिंग रद्द कर देते थे।’ राजू केजी से मिलती जुलती बात श्रीदेवी ने भी मुझे काफी पहले बताई थी, जब उनके पिता का देहांत हुआ और वह ‘लम्हे’ की शूटिंग के बीच में से चेन्नई आ गईं थीं। कोई महीने भर श्रीदेवी अपने घर पर रुकीं, लेकिन एक बार भी यश चोपड़ा के किसी स्टाफ ने उनको फोन करके ये नहीं पूछा कि वह वापस शूटिंग पर कब आएंगी।

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यश चोपड़ा, रेखा, अमिताभ बच्चन - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
अमिताभ को किया क्षमा
ये सबको पता है कि अमिताभ बच्चन को फिल्म ‘जंजीर’ में मिली एंग्री यंगमैन की छवि को ठीक से यश चोपड़ा ने ही ‘दीवार’, ‘त्रिशूल’ और ‘काला पत्थर’ में शक्ल दी। लेकिन, ये कम लोगों को ही पता होगा कि फिल्म ‘सिलसिला’ के फ्लॉप होने के बाद बरसों तक अमिताभ बच्चन और यश चोपड़ा के रिश्तों में खटास बनी रही। अमिताभ बच्चन उन दिनों फिल्म निर्देशकों व निर्माताओं के लिए पारस पत्थर बने हुए थे और यश चोपड़ा भी दूसरे सितारों के साथ फिल्में बनाने लगे थे। लेकिन, एक दिन यश चोपड़ा सुबह सुबह तब चौंके जब अमिताभ बच्चन उनके घर आ पहुंचे। पता चला कि अपने बंगले से वह टहलते हुए ही वहां तक आ गए थे। ये बात बीती सदी के आखिरी साल की है। अमिताभ बच्चन की आर्थिक हालत ठीक नहीं थी और वह यश चोपड़ा से काम मांगने चले आए थे। उनको पता था कि यशराज फिल्म्स की एक फिल्म ‘मोहब्बतें’ के नाम से बन रही है और उसमें उनके लायक एक दमदार रोल भी है। अमिताभ बच्चन ने इसका जिक्र भर किया और यश चोपड़ा ने उन्हें ये रोल दे दिया। अमिताभ बच्चन और यश चोपड़ा का पुनर्मिलन कामयाब रहा। बाद में अभिषेक बच्चन को भी यश चोपड़ा ने अपनी कंपनी की फिल्म में मौका दिया। फिल्म ‘बंटी और बबली’ के ट्रायल में जब चोपड़ा और बच्चन परिवार की अगली पीढ़ियां एक साथ जुटीं और यश चोपड़ा ने कहा, ‘बच्चों ने बहुत अच्छा काम किया है।’ तो अभिषेक बच्चन और आदित्य चोपड़ा दोनों ने इसे अपने करियर का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र माना और इसका जिक्र चलने पर दोनों के चेहरों पर मुस्कान अब भी आ जाती है।
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रानी मुखर्जी - फोटो : फाइल फोटो
दम अपने हुनर का
यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा से अनौपचारिक रूप से भले बतिया लें, लेकिन वह औपचारिक रूप से बात करने या इंटरव्यू देने से बचते हैं। इसकी अपनी अलग वजहे हैं। रानी मुखर्जी जरूर अपने ससुर का नाम सुनते ही उत्साहित हो जाती हैं। बतौर अभिनेत्री जितना भी समय उन्होंने यश चोपड़ा के साथ सेट पर गुजारा है, वह उनके लिए यादगार है। घर पर उन्हें बेटी जैसा प्यार मिला, लेकिन सेट पर वह बताती हैं कि यशजी अनुशासन बनाए रखने की पूरी कोशिश करते थे। एक खास बात रानी मुखर्जी जो यश चोपड़ा के बारे में बताती हैं, वह ये कि उनमें अपनी विधा को लेकर संयम बहुत रहा। वह दम भर भी इस पर से अपनी पकड़ ढीली नहीं होने देते थे। सिनेमा उनके लिए साधना था। रानी बताती हैं, ‘यश जी को कलाकारों के भाव खुद देखने होते थे। वह फ्रेम से थोड़ा बाहर रहकर वहीं लोकेशन पर हम लोगों के करीब ही रहते थे। पारखी नजरें उनकी इतनी थीं कि जरा सा भी गड़बड़ होने पर वह तुरंत पकड़ लेते थे। आज के निर्देशक शूटिंग होते समय दूर मॉनीटर पर बैठकर फ्रेम में हो रही हरकतें देखते हैं। लेकिन, यश जी को मॉनीटर पर नहीं खुद पर भरोसा था। वह कमाल के फिल्म निर्देशक रहे और मैंने उनसे तमाम बातें बतौर अभिनेत्री और बतौर इंसान भी सीखी हैं। आमतौर पर वह जिंदादिल और खुशमिजाज इंसान थे, हां जब अति हो जाती तो नाराज भी होते थे। जैसे हम लोगों के साथ ‘वीर जारा’ की शूटिंग के वक्त होता रहता था।’
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दिल तो पागल है का पोस्टर - फोटो : फाइल फोटो
कहानियां मौलिक रखने की कोशिश
यश चोपड़ा ने अपनी कंपनी यशराज फिल्म्स बनाते समय ये ध्यान रखा कि इसमें ऐसे लोग लिखने पढ़ने के काम के लिए लगाए जाएं जिनका नाम मौलिक लेखन के लिए पहचाना जाता हो। पंडित मुखराम शर्मा के सानिध्य में पटकथा के शुरूआती सबक सीखने वाले यश चोपड़ा ने इसके बाद अख्तर उल इमान से लेकर गुलशन नंदा और सागर सरहदी से लेकर  सलीम-जावेद के साथ लंबा काम किया है। अपने 50 साल के करियर में 21 फिल्में निर्देशित करने वाले यश चोपड़ा ने गीतकारों में साहिर लुधियानवी को अपनी फिल्मों के साथ रखा। बाद में जावेद अख्तर ने ये जगह हासिल करने की कोशिश की और सलीम खान से अलग होकर वह कामयाब गीतकार बने भी। इसके बाद आनंद बक्षी और आखिर तक आते आते गुलजार ने भी इस टीम में जगह बनाई। संगीत शुरू से यश चोपड़ा की फिल्मों का कमाल का रहा। और, खय्याम से लेकर आर डी बर्मन, रवि से लेकर मदन मोहन और शिव हरि से लेकर उत्तम सिंह और यहां तक कि ए आर रहमान से भी यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों के गीत संगीतबद्ध कराए। सिनेमा के आज की पीढ़ी के छात्र यश चोपड़ा के सिनेमा का ग्राफ सामाजिक संदर्भों में कोर्स की तरह पढ़ते हैं। वह पढ़ते हैं कि कैसे एक निर्देशक जो अमिताभ बच्चन को लेकर ‘दीवार’ जैसी हिंसा से भरपूर फिल्म बनाता है, वही निर्देशक समय के हिसाब से खुद को बदलते हुए अपना सिनेमा बदलकर ‘दिल तो पागल है’ भी बनाता है।
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ये दिल्लगी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
शुचिता वाचन और कर्म की
यश चोपड़ा के साथ लंबा समय बिताने वाले मशहूर फिल्म संपादक और निर्देशक नरेश मल्होत्रा यश चोपड़ा को याद करते हैं तो उनकी तमाम खूबियों में से एक इस खूबी की भी चर्चा करते हैं कि उन्हें कहानियों की अंतर्धारा की बहुत गहरी समझ होती थी। फिल्म ‘डर’ का पूरा ताना बाना नरेश मल्होत्रा ने ही बुना था, लेकिन बाद में ये सेटअप इतना अच्छा बन गया कि यश चोपड़ा ने ये फिल्म खुद निर्देशित की। नरेश मल्होत्रा कहते हैं, ‘यशजी शुचिता और पारदर्शिता को मानने वाले इंसान थे। वह जो भी कहना होता था सामने कहते थे। इससे ये तो होता था कि तमाम लोग उनकी बातों का बुरा मान जाते थे, लेकिन होता ये था कि अक्सर उनकी ये बातें सिनेमा कारोबार के हिसाब से सच के करीब होती थीं और आप तो जानते हैं कि सच कितने लोगों को भाता है।’ नरेश मल्होत्रा को फिल्म निर्देशक भी यश चोपड़ा ने ही बनाया। ‘कभी कभी’ को एडिट करने के इनाम के तौर पर नरेश मल्होत्रा को यश चोपड़ा ने ‘ये दिल्लगी’ दी थी। साथ ही अक्षय कुमार, सैफ अली खान और काजोल जैसे सितारे भी दिए। राजू केजी बताते हैं, ‘यश चोपडा ने ये फिल्म वास देव धीर को समर्पित की है। कितने लोग होंगे फिल्म इंडस्ट्री में जो अपनी कंपनी की फिल्म किसी प्रोडक्शन मैनेजर को समर्पित कर दें। वास देव धीर ने यश चोपड़ा के साथ उनकी बतौर निर्माता पहली फिल्म ‘दाग’ के समय से काम किया था। और, उन पर वह आंख मूंदकर भरोसा भी करते थे, न कभी यश जी ने उनसे पैसों का हिसाब मांगा और न कभी उनकी देखरेख में बनी फिल्मों में एक पैसे के हिसाब का हेर फेर ही हुआ। यश जी जिस पर भरोसा करते थे, आंख मूंदकर करते थे। फिल्म ‘ये दिल्लगी’ यश जी ने वासव धीर की याद को समर्पित की।’

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चांदनी - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जब भंग हो गया सिनेमा का मोह
इतना सब कुछ होने के बाद भी एक समय ऐसा भी आया जब यश चोपड़ा को लगा कि उनका कारोबार समेटने का वक्त आ गया है। ये वह समय था जब पहले उनकी फिल्म ‘सिलसिला’ फ्लॉप हुई। फिर कुछ उनकी बनाई हुई और कुछ उनकी खुद की निर्देशित फिल्में नहीं चलीं। ‘नाखुदा’, ‘सवाल’, ‘मशाल’, ‘फासले’ और ‘विजय’ के बाद यश चोपड़ा ने यशराज फिल्म्स को ताला लगा देने का मन बना लिया था और यहां तक कि टी सीरीज के संस्थापक गुलशन कुमार के साथ साझेदारी में उनके लिए फिल्में बनाने की बात तक हो चुकी थी लेकिन फिर यश चोपड़ा को लगा कि नहीं, एक मौका खुद को और देना चाहिए। ‘प्रेम रोग’ लिख चुकीं कामना चंद्रा की एक कहानी लेकर वह सीधे चेन्नई जा पहुंचे। श्रीदेवी ने कुछ साल पहले एक मुलाकात में कहा था, ‘यशजी चाहते तो मुझे अपने दफ्तर बुला सकते थे, लेकिन वह अपने साथ काम करने वालों को जो सम्मान देते थे, वह गौर करने लायक है। उन्होंने चेन्नई आकर मुझे चांदनी की कहानी सुनाई। यही नहीं मुझे इस फिल्म के दौरान जरा भी दिक्कत होती तो वह हमेशा मेरे पीछे खड़े मिलते। एक दिन मुझे फिल्म की कॉस्ट्यूम का ट्रायल करना था। उनका काम इतना परफेक्ट होता था कि हर सीन के कपड़ों की पूरी लिस्ट शूटिंग शुरू होने से पहले ही बन जाती थी तो जिस दिन मुझे फिल्म में पहनने वाले सारे कपड़ों को पहनकर देखना था, उन्होंने खुद भी कोई काम नहीं किया। वह भी आकर कपड़ों के ढेर के बीच बैठ गए और लगातार मेरा हौसला बढ़ाते रहे।’
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यश चोपड़ा - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सिनेमा का यश
यश चोपड़ा की समावेशी विकास और समेकित तरक्की की ये थाती ही आदित्य चोपड़ा ने अपनाई है। देहरादून से आकर मुंबई में पैर जमाने की कोशिशों में लगे रहे निर्देशक अली अब्बास जफर को यश चोपड़ा ने फिल्म ‘झूम बराबर झूम’ में सहायक निर्देशक का काम दिया था। अली को बाद में यशराज फिल्म्स में ही फिल्म निर्देशक बनने का मौका फिल्म ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ में मिला और इसके बाद यशराज फिल्म्स ने उन्हें ‘टाइगर जिंदा है’, ‘सुल्तान’ और ‘भारत’ जैसी फिल्में निर्देशित करने का मौका दिया। अली कहते हैं, ‘सिनेमा में मेरे जो सपने पूरे हो चुके हैं, उनके लिए मैं यशराज फिल्म्स को ही सबसे बड़ा श्रेय देता हूं। बिना किसी फिल्मी बैकग्राऊंड के अगर मुझे ये मौका मिल सकता है तो मैं समझता हूं कि यहां हर किसी के लिए दरवाजे खुले हैं।’ यश चोपड़ा की बनाई जिस कंपनी यशराज फिल्म्स के 50 साला जश्न की शुरुआत रविवार से मुंबई में होने जा रही है, उसमें इस स्टूडियो के अगले बदलाव की ये झलक भी दिखने वाली है। ये जश्न साल भर चलने वाला है और ये देश दुनिया में यश चोपड़ा के चाहने वालों और उनके स्टूडियो यशराज फिल्म्स की फिल्मों की राह तकने वालों को बहुत कुछ सिखाने वाला है। उनके हर प्रशंसक की यही दुआ है कि सिनेमा का ये यश यूं ही सालों साल बना रहे!

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