कभी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में गिटार बजाकर पैसों का जुगाड़ करने वाले तिग्मांशु धूलिया ने सिनेमा में नाम और दाम दोनों कमाए हैं। सिनेमा में तिग्मांशु चौथाई सदी गुजार चुके हैं। इस यात्रा की कुछ यादें, कुछ बातें, तिग्मांशु ने अमर उजाला के लिए साझा कीं पंकज शुक्ल के साथ।
आपके सिनेमा में दोस्ती के अलग अलग तेवर दिखते हैं। आप बचपन के दोस्तों और मुंबई के दोस्तों में क्या फर्क पाते हैं?
मेरे लिए दोस्ती जिंदगी का एक बहुत अहम हिस्सा है। मेरे सारे दोस्त इलाहाबाद (अब प्रयागराज) के हैं। कंचन घोष, अफजाल, संजय ब्राउन, शैलेंद्र सिंह, राजीव पॉल, शरद श्रीवास्तव, हेनरी सब बचपन के ही दोस्त हैं। हर दूसरे तीसरे दिन बात होती है हम लोगों की। उनका फिल्मों से कोई मतलब नहीं है। वे बस खुश हैं मेरी तरक्की से। मुझे कुछ भला बुरा बोलना होता है बेझिझक बोल देते हैं। बंबई (मुंबई) में तो काम वाले दोस्त हैं। बंबई एक ऑफिस है और हम ऑफिस में रहते हैं। ये शहर थोड़े ही है।