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जगजीत सिंह को पहली बार स्टेज पर देख हंस पड़े थे लोग, और फिर गाना सुनकर...

Sat, 10 Oct 2020 11:28 AM IST
प्रतीक्षा राणावत एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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जगजीत सिंह - फोटो : फाइल फोटो
गजल गायक जगजीत सिंह का निधन 10 अक्तूबर 2011 को हुआ था। आज उनकी नौवीं पुण्यतिथि है। उनके चाहने वालों के बीच वो आज भी जिंदा हैं, अपनी गजलों के रूप में। उनकी रूमानी आवाज के आज भी लाखों दीवाने हैं। लेकिन एक समय ऐसा भी था जब उन्हें बी ग्रेड के सिंगर का दर्जा दिया गया। जब वो पहली बार प्रस्तुति देने के लिए जाने वाले थे तो लोग हंस पड़े। यहां तक कि कॉलेज हॉस्टल में उनके आसपास भी रहना कोई पसंद नहीं किया करता था।
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चित्रा सिंह के साथ जगजीत सिंह - फोटो : चित्रा सिंह
बात जगजीत सिंह के कॉलेज के दिनों की है। जब वो जालंधर के डीएवी कॉलेज में पढ़ा करते थे। जगजीत सिंह यहां हॉस्टल में रहते थे। वो सुबह पांच बजे उठकर दो घंटे रियाज करते थे। जिसकी वजह से हॉस्टल में रहने वाले बाकी लड़के उनके आसपास के कमरों में रहना पसंद नहीं करते थे। उन्हीं दिनों ऑल इंडिया रेडियो के जालंधर स्टेशन ने उन्हें उपशास्त्रीय गायन की शैली में फेल कर दिया गया था। शास्त्रीय शैली में उन्हें बी ग्रेड के गायक का दर्जा दिया गया।
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जगजीत सिंह - फोटो : पीटीआई, फाइल
एक बार मशहूर फिल्म निर्देशक सुभाष घई और जगजीत सिंह अपने अपने विश्वविद्यालयों की तरफ से एक अंतर राज्यीय महाविद्यालय युवा उत्सव में भाग लेने बंगलूरू गए थे। यहां पर रात 11 बजे जगजीत का नंबर आया। माइक पर जब उद्घोषक ने घोषणा की कि पंजाब यूनिवर्सिटी का विद्यार्थी शास्त्रीय संगीत गाएगा तो वहां मौजूद लोग जोर से हंस पड़े। उनकी नजर में पंजाब तो भांगड़ा के लिए जाना जाता था।

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लता मंगेशकर, जगजीत सिंह - फोटो : फाइल फोटो
जैसे ही जगजीत स्टेज पर आए लोग सीटी बजाने लगे। नजारा देखकर तो ऐसा लग रहा था कि वो बुरी तरह से फ्लॉप होने वाले हैं। उन्होंने बहरा कर देने वाले शोर के बीच आंख बंद कर आलाप लेना शुरू किया। तीस सेकेंड के बाद वो गाने लगे। धीरे-धीरे जैसे जादू हुआ। वहां मौजूद श्रोता शास्त्रीय संगीत को अच्छी तरह से समझते थे। जल्द ही वो तालियां बजाने लगे। पहले थम-थम कर और बाद में हर पांच मिनट पर पूरे जोश के साथ।
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सुभाष घई - फोटो : instagram/subhashghai1
जब उन्होंने गाना खत्म किया तो इतनी जोर से तालियां बजीं कि वहां मौजूद सुभाष घई की आंखों में आंसू आ गए। जगजीत सिंह को यहां पहला पुरस्कार भी मिला। ये किस्सा सुभाष घई ने खुद सुनाया। जब जगजीत सिंह के ऊपर एक किताब लिखी जा रही थी उसी दौरान।

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