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‘शकुंतला देवी’ के डार्क पहलू पर बोलीं विद्या बालन, 'मां बेटी के बीच प्यार और झगड़े बहुत होते हैं…'

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विद्या बालन से खास बातचीत - फोटो : यूट्यूब
महान गणितज्ञ शकुंतला देवी ने 40 साल पहले तेरह, तेरह अंकों वाली दो संख्याओं का गुणनफल सिर्फ 28 सेकेंड में करके विश्वरिकॉर्ड बना दिया था। शकुंतला देवी पर अब फिल्म बनी है और फिल्म में शकुंतला देवी का किरदार कर रहीं अभिनेत्री विद्या बालन से अमर उजाला के लिए पंकज शुक्ल ने की ये वीडियो मुलाकात। 

पिछले एक दशक या उससे भी कुछ ज्यादा समय से आपकी फिल्म जब भी रिलीज होने को होती है तो दर्शकों में एक अलग उत्सुकता रहती है कि अब कुछ नया देखने को मिलेगा। कहानियों का चुनाव कैसे करती हैं आप?
मैं चीजों से बहुत जल्दी ऊब जाती हूं। अपने आपका मनोरंजन करने के लिए मैं अलग अलग किस्म के किरदार चुनती हूं। अलग अलग किस्म के रोल चुनती हूं क्योंकि मैं एक ही तरह की फिल्में देखना भी पसंद नहीं करती और करना भी पसंद नहीं करती। और, सौभाग्य है मेरा कि मुझे मिलते भी ऐसे अलग अलग किरदार और अलग अलग कहानियां हैं। तो हो जाता है और अच्छा लगता है कि लोगों को ये पसंद आ रहा है।
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शकुंतला देवी - फोटो : सोशल मीडिया
तो अनुपात क्या रहता होगा एक कहानी चुनने से पहले कहानियों का ना करने का?
काफी सारी स्क्रिप्ट्स को मना करना पड़ता है क्योंकि मेरे लिए सिर्फ अच्छी स्क्रिप्ट लिखी हो ये बहुत जरूरी है लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी ये है कि उसे पढ़कर मुझमें एक उत्साह हो। जब भी मैं कुछ पढ़ती हूं या करती हूं तो मुझे लगना चाहिए कि हां ये मुझे करना है तो वो जब मुझे लगता है तभी मैं करती हूं। अगर वो मुझे नहीं लगता है तो बढ़िया से बढ़िया स्क्रिप्ट भी मैं मना कर देती हूं।

शकुंतला देवी का नाम देश की मौजूदा पीढ़ी और उसके पहले ही दो पीढ़ियों के लिए जाना पहचाना नाम रहा है। गणित को मनोरंजन का साधन बनाना कितना चुनौती भरा रहा?
वह कोशिश ही नहीं करनी पड़ी क्योंकि जब मैंने शकुंतला देवी के शोज के वीडियो देखे तो पता चला कि वह मैथ शोज को मैजिक शोज की तरह करती थीं। इन शोज में उनकी ऊर्जा का स्तर ही अलग होता था। पलट के तुरंत जवाब देती थीं। एक स्टाइल था, उनका मुस्कुराते हुए मजाक करते हुए उत्तर देने का। मुझे कुछ उसमें मसाला या तड़का डालने की जरूरत नहीं पड़ी। फिल्म की निर्देशक अनु मेनन ने भी जो रिसर्च किया, उसके हिसाब से उनके शोज के हिसाब से, उन सबमें बहुत कुछ ऐसा था बहुत कुछ वो ऐसा करती थीं।
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विद्या बालन - फोटो : सोशल मीडिया
शकुंतला देवी आपकी सोलो फिल्म है, लेकिन इससे पहले आई आपकी मल्टीस्टारर मिशन मंगल की चर्चा अक्षय कुमार की फिल्म के नाम से ज्यादा हुई, दुख होता है आपको?
नहीं मेरी तो बहुत चर्चा हुई। जहां तक मुझे पता है लोग मिशन मंगल को मेरे खाते में भी जोड़ते हैं। लेकिन अगर कुछ लोग मिशन मंगल को मेरी फिल्मों में नहीं भी गिनते हैं तो मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि मुझे पता है मैं फिल्म मिशन मंगल का बहुत अहम हिस्सा थी और लोग जब फिल्म देखते हैं तो इस बात का एहसास भी देखने वालों को होता ही है। इसको कोई मना भी करे तो फर्क नहीं पड़ता।

देश में बहुभाषी फिल्मों का चलन बढ़ा है। आपकी फिल्म शकुंतला देवी को भी अगर तमिल, तेलुगू, मलयालम या कन्नड़ में डब करके रिलीज करना हो तो आप कितना साथ हैं इसके?
मैं तो बहुत साथ हूं इसके और जिस भाषा में मैं खुद डब कर सकती हूं, वह मैं खुद कर सकती हूं क्योंकि हमने इतनी मेहनत की है और हम यही चाहते हैं कि देश भर में दुनिया भर में ये फिल्म लोग देखें। अगर थिएटर में ये फिल्म रिलीज हो रही होती और अगर अलग अलग भाषाओं में इसे रिलीज कर रहे होते तो जो लोग हिंदी नहीं समझते हैं उनका भी फायदा हो जाता और हमारा तो सबसे ज्यादा फायदा होता।

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विद्या बालन - फोटो : सोशल मीडिया
किसी फिल्म के थिएटर की बजाय ओटीटी पर रिलीज होने से इसके लीड कलाकार को कष्ट होता है क्या?
मेरे दिल में तो ऐसा नहीं है क्योंकि जिस परिस्थिति से हम गुजर रहे हैं तो इससे अच्छा क्या हो सकता है कि हमारी फिल्म रिलीज हो रही है। आपको घर में बैठे बैठ इतना कुछ देखने को मिल रहा है। एक ऐसी फिल्म जो आप परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं। ओटीटी पर काफी ऐसी सामग्री है जो आप फैमिली के साथ नहीं देख सकते पर ये ऐसी फिल्म है जो आप सबके साथ बैठकर देख सकते हैं। हम थिएटर के लिए फिल्में बनाते रहेंगे, ओटीटी के लिए भी कुछ करते रहेंगे लेकिन इस माहौल में यही सबसे अच्छा तरीका है।

हिंदी सिनेमा की नई सदी में आपके तीन किरदारों हल्ला बोल की स्नेहा, पा की विद्या और इश्किया की कृष्णा ने नया चलन शुरू किया। कितनी बड़ी चुनौती रही होगी आज से दशक भर पहले इस तरह के रोल करना?
अगर मैं पा की बात करूं तो मैं थोड़ी सी असमंजस में थी कि मुझे ये फिल्म करनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए। क्योंकि, लोग क्या समझने लगेंगे कि मैंने अमिताभ बच्चन की मां का रोल किया है। लेकिन अंदर जो एक्टर है वो तड़प रहा था ये फिल्म करने के लिए तो मैंने इस एक्टर की सुनी और ये फिल्म की। वो एक ऐसा दौर था 2008, 2009 के आसपास का जब मेरे पास अलग अलग तरह की फिल्में आने लगी थीं। मैंने कहा कि इसीलिए तो मैं एक्टर बनी थी अब अगर मैं अपने एक्टर होने का पायदा नहीं उठाऊंगी तो मेरे एक्टर होने का कोई मतलब नहीं है। बहुत अच्छी बात है कि ये फिल्में चलीं और फिर ये दौर शुरू हुआ। मैं नहीं मानती कि ये महज एक दौर है ये आज की सच्चाई है कि महिला प्रधान फिल्में बहुत चल रही हैं और इनमें पैसा लगा रहे हैं लोग।
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विद्या बालन - फोटो : सोशल मीडिया
शकुंतला देवी में फिल्म का मुख्य किरदार आदर्श किरदार नहीं है। उसके अपनी बेटी से होते झगड़े दिखते हैं, आपके भी कभी झगड़े हुए अपने घर में अपने माता पिता से?
बिल्कुल, मम्मी पापा के साथ मेरे बहुत झगड़े हुए हैं और मम्मी के साथ तो बहुत। मेरे हिसाब से मां बेटी के बीच ऐसा बहुत होता है। प्यार भी बहुत होता है और झगड़े भी बहुत होते हैं। मैंने बहुत देखा है। मैं सिर्फ अपनी बात नहीं कर रही, ये रिश्ता ही ऐसा होता है। इस बायोपिक में खास बात मुझे ये लगी कि आप शकुंतला को सिर्फ एक जीनियस की तरह नहीं देख रहे बल्कि इस इस जीनियस के अंदर छुपा जो इंसान है आप उससे भी रूबरू होने जा रहे हैं।

इसके आगे और क्या हुए विद्या से सवाल और क्या दिए विद्या ने उनके झटपट जवाब, जानने के लिए ये पूरा इंटरव्यू आप इस वीडियो लिंक पर क्लिक कर सीधे अपने मोबाइल, लैपटॉप या टैबलेट पर देख सकते हैं।
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