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मटर के अंकुरण को शूट कर फिल्ममेकर बने दादा साहेब फाल्के, आखिरी दिनों में ऐसा हो गया था हाल

Tue, 30 Apr 2019 08:39 AM IST
shrilata biswas मुंबई डेस्क, अमर उजाला
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dada saheb phalke - फोटो : social media
भारत में सिनेमा के जनक माने जाने वाले धुंडीराज गोविंद फाल्के जिन्हें प्यार और सम्मान से दादा साहेब फाल्के के नाम से भी पुकारा जाता है, की आज जयंती है। केंद्र सरकार हर साल सिनेमा का सबसे बड़ा सम्मान उनके नाम पर देती रही है। हाल के बरसों में उनके नाम पर कुछ दूसरे संगठनों ने भी पुरस्कार शुरू किए हैं, लेकिन इन पुरस्कारों पर रोकथाम के लिए केंद्र सरकार के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने अब तक कोई कदम नहीं उठाया है। एक झलक दादा साहेब फाल्के के जीवन पर।
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dadasaheb phalke - फोटो : file photo
कौन थे दादा साहब फाल्के?
दादा साहब फाल्के का असली नाम है धुंडीराज गोविंद फाल्के। उनका जन्म 30 अप्रैल 1870 में महाराष्ट्र के एक त्रयंबक नामक शहर में हुआ। दादा साहेब फाल्के ने जेजे स्कूल ऑफ आर्ट से 1885 में एक साल का ड्रॉइंग का कोर्स खत्म किया। फिर कुछ समय अपने बड़े भाई के साथ काम में हाथ बंटाकर उन्होंने महाराज सयाजीराव यूनिवर्सिटी ऑफ बड़ौदा से ऑयल पेंटिंग और वॉटरकलर पेंटिंग का कोर्स किया। जिसके बाद एक कैमरा खरीदकर उन्होंने फोटोग्राफी के क्षेत्र में ही काम करने का फैसला किया। इस बीच उनकी शादी भी हुई, लेकिन उनकी पत्नी और बेटा दोनों एक गंभीर बीमारी की वजह से चल बसे। 
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Dadasaheb Phalke‬
प्रिंटिंग प्रेस का काम 
दादा साहेब फाल्के का स्टेज से पहला रिश्ता पेंटिंग के जरिए बना। वह थियेटर के लिए पर्दों पर पेंटिंग का काम किया करते थे। साथ-साथ थोड़ा बहुत ड्रामा प्रोडक्शन भी सीख लिया। कम लोग ही जानते होंगे कि फाल्के ने एक जर्मन जादूगर के साथ भी काम किया और खुद उन्होंने भी कई जगहों पर मैजिक शोज किया। गिरिजा करणीकार से दूसरी शादी के कुछ समय बाद उन्हें पुरातत्व विभाग से फोटोग्राफर व ड्राफ्ट्समैन की नौकरी मिली। तीन साल काम की नौकरी को छोड़ उन्होंने आर जी भांजरकर के साथ लोनावाला में प्रिंटिंग प्रेस खोली 'फाल्के एंग्रेविंग एंड प्रिंटिंग वर्क्स' के नाम से। 

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Dadasaheb Phalke
फिल्म कंपनी स्थापना
मुंबई के एक थियेटर में दादा साहेब फाल्के ने अपने परिवार संग एक फ्रेंच फिल्म देखी, द बर्थ ऑफ क्राइस्ट, जिसे देख उनके अंदर का फिल्ममेकर जाग गया। फिर उन्होंने एक साल खुद से तैयारी की, हर तरह के जतन कर उन्होंने एक फिल्म कैमरा और रील्स खरीदे। वह देर रात तक उन तस्वीरों को प्रोजेक्टर और मोमबत्ती के जरिए दीवार पर देखा करते। जिसके कारण उनकी आंखों की रोशनी चली गई। डॉक्टर्स ने उन्हें दो तीन लेंस वाला चश्मा तैयार करके दिया। लंदन जाने की चाह में उन्होंने 10 हजार रुपए उधार लिए और वहां जाकर फिल्म बनाने की तकनीकों की जानकारी हासिल की। मुंबई लौटकर ही उन्होंने फाल्के फिल्म्स एंड कंपनी खोली।
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Dadasaheb Phalke‬ - फोटो : file photo
पहली फिल्म और पहली महिला कलाकार
दादा साहेब फाल्के का फिल्ममेकर बनने का किस्सा भी दिलचस्प है। एक मटर के पौधे को वह हर रोज एक महीने तक शूट करते रहे और इसकी एक फिल्म तैयार की। यह उनकी पहली फिल्म रही, जिसका नाम उन्होंने अंकुराची वध रखा। जल्द ही उन्हें निवेशक भी मिल गए, फिर एक अखबार के जरिए उन्होंने अपनी टीम के लिए एड निकाले और हरिश्चंद्र की कहानी पर एक फिल्म बनाने का फैसला किया।

उस समय उन्हें कोई महिला कलाकार नहीं मिली, जिसकी वजह से फिल्म में राजा हरिश्चंद्र की पत्नी का किरदार एक आदमी ने ही निभाया। राजा हरिश्चचंद्र भारत की पहली फुल लेंथ फीचर फिल्म रही, जिसे उन्होंने 1913 में छह महीने 27 दिन में बनाया। इसके बाद फाल्के ने मोहिनी भस्मासुर और सत्यवान सावित्री फिल्में बनाई जो दर्शकों को खूब पसंद भी आई। मोहिनी भस्मासुर पहली फिल्म रही जिसमें महिला कलाकारों ने भारतीय सिनेमा में पहली बार काम किया। 
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Dadasaheb Phalke‬ - फोटो : file photo
लंदन में मिला नौकरी का ऑफर
मुंबई में सिनेमा बनाने के साथ ही उनकी शोहरत दूर-दूर तक होने लगी। थोड़े दिन बाद दादा साहेब फाल्के फिर लंदन गए और अपनी फिल्मों के लिए ग्राहक भी ढूंढने लगे। वॉल्टन स्टूडियोज ने तब उन्हें नौकरी ऑफर की थी लेकिन इसे ठुकरा दिया। ये इसके बावजूद कि उनका स्टूडियो उन दिनों ठीक हालत में नहीं था। वर्ल्ड वॉर वन के चलते निवेशकों ने भी इसी दौरान पैसा वापस करने के लिए दबाव बनाना शुरू क दिया। उन्होंने कुछ समय काफी तंगी के काटे और शॉर्ट फिल्म बनाईं।

कुछ समय बाद उन्होंने भारत में जगह-जगह फिल्में दिखाकर पैसे इकट्ठे किए। इस बीच उनकी पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र की रील खो गई, जिसे उन्होंने दोबारा शूट किया और नाम रखा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र। उसके बाद फाल्के ने लंका दहन बनाई, जिसमें मर्द कलाकार ने ही महिला का किरदार भी निभाया। बाल गंगाधर तिलक व रतनजी टाटा ने उन्हें निवेशकों के रूप में पैसा देने को कहा, पर उनकी यह डील फाल्के ने ठुकरा दी। मुंबई में कुछ कपड़ा व्यपारियों से पैसा लेकर उन्होंने अपनी फिल्म कंपनी का नाम हिंदोस्तान सिनेमा फिल्म्स कंपनी रख दिया। 
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Dadasaheb Phalke - फोटो : file photo
तंगी में गुजरा आखिरी समय
1918 से लेकर 1922 तक दादा साहेब फाल्के ने कई फिल्मों में काम किया जिनमें श्रीकृष्ण जन्म और कालिया मर्दन प्रमुख रही। इसी बीच निवेशकों के साथ दिक्कतों के चलते उन्होंने कंपनी छोड़ रिटायरमेंट ले लिया। कुछ समय काशी में बिताया और वहां कई मराठी प्ले लिखे। फिर उन्होंने फिल्मों में वापसी करने की सोची। जिस कंपनी को वह छोड़कर गए थे उसी कंपनी में फाल्के ने हजार रुपए महीने की नौकरी की।

पैसा उधार लेकर उन्होंने सेतुबंधन नामक फिल्म भी शुरू की लेकिन पैसों की दिक्कतों के चलते इसे पूरा करने में उन्हेें तीन साल लग गए। इसी समय देश में पहली बोलती हुई फिल्म आलम आरा (1931) रिलीज हो गई। अब मूक फिल्मों में लोग दिलचस्पी नहीं ले रहे थे और फिल्म सेतुबंधन नहीं चली। भारतीय सिनेमा के जन्मदाता दादासाहेब ने 73 साल की उम्र में 16 फरवरी, 1944 को दुनिया को अलविदा कह दिया।
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raja harishchandra - फोटो : file photo
फिल्में और मृत्यु के बाद सम्मान 
अपने 19 साल के करियर में दादा साहेब फाल्के ने 95 फिल्में और 27 शॉर्ट मूवीज बनाई। अपने जीते जी तो उन्हें खासा सम्मान नहीं मिला, पर उनकी मृत्यु के बाद उनके नाम पर खास अवॉर्ड बनाए गए। दादासाहेब फाल्के के फिल्मों में महान योगदान के चलते वर्ष 1969 में भारत सरकार ने 'दादासाहेब फाल्के अवार्ड’ की शुरुआत की। अभी तक का आखिरी दादासाहेब फाल्के पुरस्कार एक्टर विनोद खन्ना को दिया गया है।
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